पानी बदल रहा है पत्थर पिघल रहे हैं
दीये नही यहाँ अब इन्सान जल रहे हैं
रानाइयां दिलों की अब आग हो चली हैं
बारूद पर हमारे अब ख़्वाब पल रहे हैं
निस्तब्धता भरी है जिस राह मे यहाँ पर
उस राह पर हमारे क्यूँ जिस्म चल रहे हैं
नाराज़ क्यूँ हुए हम इस ख़ूब ज़िन्दगी से
हो मौत की गली क्यूँ अरमाँ निकल रहे हैं
आसान ज़िन्दगी को मुश्किल बना रहे हम
पल पल यहाँ हमारे अब पल बदल रहे हैं
जिस ओर बस मिलेगा साया ए दर्द हम को
उस ओर के लिये क्यूँ हम तुम मचल रहे हैं
अब धुंध मे धँसी कुछ इस तौर ये ज़मीं है
सूरज यहाँ क्षितिज पे बे-वक़्त ढल रहे हैं
फरियाद कर रहे हैं अब तो हमें बताओ
भगवान! क्यूँ नही हम गिरकर सँभल रहे हैं
#अमित_अब्र
221 2122 221 2122