धड़कन है, साँस है, रूह-ओ-जान है मुहब्बत
पाकीज़गी दिलों की, ईमान है मुहब्बत
है ख़ूब ये फ़साना, किरदार गुल से कोमल
मासूम है मुहब्बत, नादान है मुहब्बत
दुनिया की मुफ़्लिसी से क्या लेना इश्क़ को है
दुनियावी मुफ़्लिसी से अंजान है मुहब्बत
रौशन है फिर मुहब्बत रौशन अगर वफ़ा है
मजबूर गर वफ़ा तो बे-जान है मुहब्बत
अहल-ए-वफ़ा बँधे अब जंजीर-ए-रस्म में हैं
अहल-ए-वफ़ा बिना अब वीरान है मुहब्बत
कितनी भी नफ़रतें हों अहल-ए-जहाँ में लेकिन
ऐ काएनात ! तेरी पहचान है मुहब्बत
दिल में न बे-क़रारी, ग़ाफ़िल हो सो अलग से
अंदाज़ से तुम्हारे हैरान है मुहब्बत
क़तरा-ए-इश्क़ से भी रौशन हुआ है इन्साँ
नेमत ख़ुदा की, दुनिया की शान है मुहब्बत
#अमित_अब्र