Sunday, 29 September 2019

धड़कन है, साँस है, रूह-ओ-जान है मुहब्बत

धड़कन है, साँस है, रूह-ओ-जान है मुहब्बत
पाकीज़गी दिलों की, ईमान है मुहब्बत

है ख़ूब ये फ़साना, किरदार गुल से कोमल
मासूम है मुहब्बत, नादान है मुहब्बत

दुनिया की मुफ़्लिसी से क्या लेना इश्क़ को है
दुनियावी मुफ़्लिसी से अंजान है मुहब्बत

रौशन है फिर मुहब्बत रौशन अगर वफ़ा है
मजबूर गर वफ़ा तो बे-जान है मुहब्बत

अहल-ए-वफ़ा बँधे अब जंजीर-ए-रस्म में हैं
अहल-ए-वफ़ा बिना अब वीरान है मुहब्बत

कितनी भी नफ़रतें हों अहल-ए-जहाँ में लेकिन 
ऐ काएनात ! तेरी पहचान है मुहब्बत

दिल में न बे-क़रारी, ग़ाफ़िल हो सो अलग से
अंदाज़ से तुम्हारे हैरान है मुहब्बत

क़तरा-ए-इश्क़ से भी रौशन हुआ है इन्साँ
नेमत ख़ुदा की, दुनिया की शान है मुहब्बत

#अमित_अब्र

Sunday, 22 September 2019

ज़ेहन में तिरी याद के क़ाफ़िले थे

ज़ेहन में तिरी याद के क़ाफ़िले थे
तक़ाज़ा-ए-उल्फ़त में तुझ से मिले थे

नज़र से नज़र कर रही गुफ़्तुगू थी
थी मिज़्गाँ खुली लब हमारे सिले थे

हक़ीक़त की दुनिया तो कांटों भरी थी
मगर ख़्वाब में फूल फिर भी खिले थे

विसाल-ए-सनम थी वजह हिज्र की, सो
किसी से न शिकवे न कोई गिले थे

कभी था मिलन तो कभी थी जुदाई
रह-ए-इश्क़ में याँ यही सिलसिले थे

#अमित_अब्र

Wednesday, 18 September 2019

आग़ाज़ है नया तो अंजाम भी नया हो

आग़ाज़ है नया तो अंजाम भी नया हो
उल्फ़त अगर नई तो पैग़ाम भी नया हो

परवाज़-ए-इश्क़ ख़ातिर शाहीन अब नये हों
हो आस्माँ नया और आयाम भी नया हो

मंज़िल अगर नई है, रस्ता अगर नया है
तो हासिल-ए-सफ़र को फिर गाम भी नया हो

बे-बस को गर बचाना शामिल है फैसले में
तदबीर फिर नई हो, इबराम भी नया हो

तब्दील मौत में की क्यूँ क़ैद-ए-बा-मशक़्कत
बदली गई सज़ा तो इल्ज़ाम भी नया हो

कीमत नई लगाओ कि शान बिक रही है
सामान हो नया तो फिर दाम भी नया हो

आये नये शहर हो, कुछ लो नया शहर से
मयखाना गर नया हो तो जाम भी नया हो

मज़दूर ख़ुश रहा सो बस्ती हुई शहर सी
था काम ये नया सो ईनाम भी नया हो

मैं तो हिमायती याँ कल के रिवाज का था
गर बद नई रिवायत, बदनाम भी नया हो

#अमित_अब्र

Sunday, 1 September 2019

हाल पे बस्ती के शहर कब है परेशान हुआ

हाल पे बस्ती के शहर कब है परेशान हुआ
देख के वीरान यहाँ कौन है वीरान हुआ

था आग़ोश में पानी पर रहने दिया जलने
सहरा पे समंदर याँ कब है मेहरबान हुआ

मुंसिफ़ बदल गये पर सुलझा नहीं मुक़दमा
सच हर बार आग में झूट की है श्मशान हुआ

बे-ख़ौफ़ हवाएँ हैं आज ज़मींदोज़ हुईं
जब्र में तूफ़ान-ए-तहरीक बयाबान हुआ

ये कौन है जो हम को तक़्सीम कर गया है
क्या है जो फ़ासला हमारे दरमियान हुआ

ज़ज्ब किया सूरज मिरा ऊँची इमारतों ने
ज़ुल्मत मेरे घर का साज-ओ-सामान हुआ

मिज़ाज यूँ है बदला इंसानी फ़ितरतों ने
ग़म ही किसी का अब किसी का इत्मीनान हुआ

कर सकते थे जहाँ क़ैद मुट्ठी में रौशनी को
जंग अँधेरे से वहीं आज घमासान हुआ

#अमित_अब्र