आग़ाज़ है नया तो अंजाम भी नया हो
उल्फ़त अगर नई तो पैग़ाम भी नया हो
परवाज़-ए-इश्क़ ख़ातिर शाहीन अब नये हों
हो आस्माँ नया और आयाम भी नया हो
मंज़िल अगर नई है, रस्ता अगर नया है
तो हासिल-ए-सफ़र को फिर गाम भी नया हो
बे-बस को गर बचाना शामिल है फैसले में
तदबीर फिर नई हो, इबराम भी नया हो
तब्दील मौत में की क्यूँ क़ैद-ए-बा-मशक़्कत
बदली गई सज़ा तो इल्ज़ाम भी नया हो
कीमत नई लगाओ कि शान बिक रही है
सामान हो नया तो फिर दाम भी नया हो
आये नये शहर हो, कुछ लो नया शहर से
मयखाना गर नया हो तो जाम भी नया हो
मज़दूर ख़ुश रहा सो बस्ती हुई शहर सी
था काम ये नया सो ईनाम भी नया हो
मैं तो हिमायती याँ कल के रिवाज का था
गर बद नई रिवायत, बदनाम भी नया हो
#अमित_अब्र
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