मासूम यार की हैं क़ातिल हुईं अदाएँ
मक़्तूल हम हुए हैं कैसे उन्हें बताएँ
चेहरे पे उन की ज़ुल्फ़ें ऐसे उलझ रही हैं
मानो लिपट रही हों महताब से घटाएँ
दरिया की तिश्नगी फिर बढ़ती चली है जाती
साहिल पे मुस्कुरा कर जब भी कभी वो आएँ
ख़ुश्बू भरी फ़ज़ा में सरशार करने वाली
छू कर सनम को मानो हैं चल रहीं हवाएँ
रंग-ए-शफ़क़ उभरता है नीले आसमाँ पर
जानिब उफ़क़ के यारों जब वो क़दम बढ़ाएँ
सहरा सुलग रहा है वादी पिघल रही है
हैं बर्क़-ए-हुस्न-ए-दिलबर में जल रहीं फ़ज़ाएँ
चाहत बताओ क्यूँकर जन्नत की दिल करे जब
आगे सनम के मेरे शर्माएँ अप्सराएँ
#अमित_अब्र