Tuesday, 9 June 2020

कैसी हुई ख़ता किस नाराज़गी के मारे

कैसी हुई ख़ता किस नाराज़गी के मारे 
आते नहीं हैं क्यूँ वो आग़ोश में हमारे 

बेकार फिर हैं लगते दुनिया के सब सहारे
ऐ यार बा'द तेरे किस को ये दिल पुकारे

इक मौज-ए-वस्ल उठती दरिया-ए-दिल में मेरे
देखूँ कभी जो उन को दरिया के उस किनारे

हँसते हुए हमारे दर आते कभी थे जब तुम
हँसता जहान मेरा खिलते थे चाँद तारे

होते हो दूर तुम तो होती है बे-क़रारी
तुम ही बताओ कैसे दिल अपना दिन गुज़ारे

कहने को जी रहा हूँ इक ज़िन्दगी मुकम्मल 
पर है सफ़र अधूरा ऐ यार बिन तुम्हारे 

मैं चल रहा हूँ तन्हा रस्तों पे ज़िन्दगी के
बीते नहीं है शब दिन गुज़रे नहीं गुज़ारे

तुम ने किया अकेला तो सोचे दिल हमारा 
किस के लिए हम अपनी दुनिया जहान हारे

#अमित_अब्र