Friday, 23 July 2021
बहार आई, हुए वीराँ दरख़्तों पे मेहरबाँ गुल
मुझे मेरा भारत अखण्ड चाहिए
मुझे मेरा भारत अखण्ड चाहिए
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खण्ड खण्ड हो रहा है भारत
मुझे मेरा भारत अखण्ड चाहिए
करता है भस्म अरि को जो अग्निकुण्ड
उस अग्निकुण्ड में प्रज्वलित अनल और प्रचण्ड चाहिए
बहुत दिनो रह गया अशोक महान
अब कुछ काल के लिए पुराना अशोक चण्ड चाहिए
लंका जले ज्वाला में जिसके क्रोध की
फिर से ऐसा एक वानर उद्दंड चाहिए
हो गगनभेदी डमरू निनाद फिर
फिर से रिपुदमन को रुद्र का उग्र एक ताण्डव चाहिए
आहूत है हर कोई , आहुति दे हर कोई
अब हर हाल में हर भाल अरि का खण्ड खण्ड चाहिए
खण्ड खण्ड हो रहा है भारत
मुझे मेरा भारत अखण्ड चाहिए
-डा.अमित कुमार सिंह ‘अब्र’
महासमर
महासमर
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क़त्ल हो रहे हैं कब से कपोत् श्वेत
सुनाई अब हमें उनकी चीख पुकार चाहिए
गंगा ही नही नीलकंठ की भी है ये धरती
दुश्मन पर होना एक रौद्र प्रहार चाहिए
रक्तबीज बहुत गहरा हो चला है
काली के हाथों में खप्पर और कटार चाहिए
फिर हँस रहा है अधर्म धर्म पे पार्थ
फिर से झंकृत गांडीव की टंकार चाहिए
हो तैयार महाप्रयाण को, कर महासमर
अब अरि के हर रूप का संपूर्ण संहार चाहिए
#अमित_अब्र
सब्र से सैलाब
"सब्र से सैलाब"
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टूट रहा है बाँध सब्र का,अब सैलाब भयंकर आयेगा।
जड़ से उखड़ेंगे पत्थर तल के,साथ किनारा बह जायेगा।।
बर्बरता की हद्द हुई है, क़त्ल मेरा ही यार हुआ है।
चीख रही खामोशी मेरी, दर्द भी दिल के पार हुआ है।
मैं भी मर जाऊँ लड़कर देश की ख़ातिर वर्ना,
मेरे अंदर बैठा कोई मुझको धीरे धीरे खा जायेगा।
टूट रहा है बाँध सब्र का,अब सैलाब भयंकर आयेगा।
जड़ से उखड़ेंगे पत्थर तल के,साथ किनारा बह जायेगा।।
बेकल है नदियों का पानी, पथराया हुआ हिमालय है।
मस्जिद की मीनारें टूटीं, टूटा हुआ शिवालय है।
रण के रथ का अब घरघर नाद ज़रूरी है वर्ना,
सरहद से दुश्मन घर के आँगन तक आ जायेगा।
टूट रहा है बाँध सब्र का,अब सैलाब भयंकर आयेगा।
जड़ से उखड़ेंगे पत्थर तल के,साथ किनारा बह जायेगा।।
श्वेत हरे की बात न मानी, अब केसरिया की बारी है।
बहुत जला है मेरा तिरंगा, अब तेरे जलने की बारी है।
सुलग रहा है सीना मेरा, अब तुझको सुलगाया जायेगा,
ख़ाक हुई होगी जब धरती तेरी तब दिल मेरा ठंडक पायेगा।
टूट रहा है बाँध सब्र का,अब सैलाब भयंकर आयेगा।
जड़ से उखड़ेंगे पत्थर तल के,साथ किनारा बह जायेगा।।
डा.अमित कुमार सिंह 'अब्र'
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12-08-2015