"सब्र से सैलाब"
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टूट रहा है बाँध सब्र का,अब सैलाब भयंकर आयेगा।
जड़ से उखड़ेंगे पत्थर तल के,साथ किनारा बह जायेगा।।
बर्बरता की हद्द हुई है, क़त्ल मेरा ही यार हुआ है।
चीख रही खामोशी मेरी, दर्द भी दिल के पार हुआ है।
मैं भी मर जाऊँ लड़कर देश की ख़ातिर वर्ना,
मेरे अंदर बैठा कोई मुझको धीरे धीरे खा जायेगा।
टूट रहा है बाँध सब्र का,अब सैलाब भयंकर आयेगा।
जड़ से उखड़ेंगे पत्थर तल के,साथ किनारा बह जायेगा।।
बेकल है नदियों का पानी, पथराया हुआ हिमालय है।
मस्जिद की मीनारें टूटीं, टूटा हुआ शिवालय है।
रण के रथ का अब घरघर नाद ज़रूरी है वर्ना,
सरहद से दुश्मन घर के आँगन तक आ जायेगा।
टूट रहा है बाँध सब्र का,अब सैलाब भयंकर आयेगा।
जड़ से उखड़ेंगे पत्थर तल के,साथ किनारा बह जायेगा।।
श्वेत हरे की बात न मानी, अब केसरिया की बारी है।
बहुत जला है मेरा तिरंगा, अब तेरे जलने की बारी है।
सुलग रहा है सीना मेरा, अब तुझको सुलगाया जायेगा,
ख़ाक हुई होगी जब धरती तेरी तब दिल मेरा ठंडक पायेगा।
टूट रहा है बाँध सब्र का,अब सैलाब भयंकर आयेगा।
जड़ से उखड़ेंगे पत्थर तल के,साथ किनारा बह जायेगा।।
डा.अमित कुमार सिंह 'अब्र'
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12-08-2015
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