Friday, 23 July 2021

बहार आई, हुए वीराँ दरख़्तों पे मेहरबाँ गुल

बहार आई, हुए वीराँ दरख़्तों पे मेहरबाँ गुल  
हुए हैं मुद्दतों के बाद फिर शान-ए-बयाबाँ गुल

ख़बर जो बागबाँ की मुद्दतों आई नहीं तो फिर 
बिना माली शजर बेचैन हैं तो हैं परेशाँ गुल

कराया राब्ता रब से, हुआ साथी इबादत में  
ख़ुदा की बंदगी के हैं मुक़द्दस साज-ओ-सामाँ गुल 

ख़िज़ाँ आई, शजर सूखे, परिन्दे भी हुए बे-घर
चमन की देख वीरानी हुए हैं आज वीराँ गुल

उदासी छाई चेहरे पे हुए रुख़सत जो घर से हम
बिछड़ कर शाख से अपनी हुआ है आज बे-जाँ गुल

कभी क़ासिद, कभी ख़त तो कभी असरार-ए-उल्फ़त हैं
कभी पहचान हैं तो हैं कभी उल्फ़त के सामाँ गुल

कभी हैं शान ज़ुल्फ़ों की, कभी रुख़सार के म'आनी  
कभी पैमान-ए-लब हैं तो कभी उल्फ़त के पैमाँ गुल

जहाँ ने लाख कोशिश की कि हो नाकाम फिर भी है
मुहब्बत रंग वो लाई, रहे जिस के निगहबाँ गुल 

मरासिम जाल बुनते हैं यहाँ सय्याद बन कर जब 
हमारी फ़ितरतों को देख कर होते हैं हैराँ गुल 

लड़ो उल्फ़त की ख़ातिर तुम यहाँ, दौर-ए-अदावत में 
तुम्हारी आदत-ए-रंजिश से होते हैं पशेमाँ गुल 

#अमित_अब्र
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पैमाँ=वादा


1222 1222 1222 1222


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