Monday, 29 November 2021
राह-ए-सदाक़त है वो
कभी भँवर कभी किनारे पे लाती है ज़िन्दगी
Friday, 26 November 2021
दिल-ए-मजरूह की फिर आरज़ू क्या, जुस्तुजू क्या है
दिल-ए-मजरूह की फिर आरज़ू क्या, जुस्तुजू क्या है
मुसलसल कर्ब है तो फ़र्क क्या कि रू-ब-रू क्या है
नहीं हालात वश में हैं, नहीं तक़दीर पे क़ाबू
बता ऐ ज़िन्दगी अब और बाक़ी गुफ़्तुगू क्या है
बुरी तक़दीर भी मेरी, बुरी तक़रीर भी मेरी
परेशानी-ओ-ग़म के बाद बाक़ी कू-ब-कू क्या है
गया लेकर तुम्हारे ख़्वाब भी जब साथ वो अपने
दिल-ए-मायूस बाक़ी और तेरी आरज़ू क्या है
हिफ़ाज़त के लिए दर-दर भटकने जब लगे अस्मत
हुकूमत की जहाँ में फिर बताओ आबरू क्या है
हिदायत लाख हो ख़ामोश रहने की मगर फिर भी
जफ़ा पर जो न उबले तो भला फिर वो लहू क्या है
इबादत में यक़ीं तो इश्क़ से इन्कार क्यूँ तुम को
मुहब्बत गर नही तो फिर ज़माने में ख़ुदा के हू-ब-हू क्या है
#अमित_अब्र
1222 1222 1222 1222
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दिल-ए-मजरूह= घायल दिल
आरज़ू= इच्छा
जुस्तजू= तलाश
कर्ब= दर्द
कू-ब-कू= everywhere हर जगह
Thursday, 25 November 2021
हँसी ये तुम्हारी
हँसी ये तुम्हारी
ख़ुशी है हमारी
वफ़ा की है ख़्वाहिश
रहे इश्क़ जारी
मुहब्बत की दुनिया
हसीं और प्यारी
बिना इश्क़ दुनिया
परेशान सारी
मुहब्बत शिफ़ा है
हो कोई बीमारी
हूँ बेज़ार तुम बिन
हुआ दिल भी भारी
मुहब्बत के दम से
अदावत है हारी
है क़िस्मत हमारी
है क़िस्मत की मारी
#अमित_अब्र
Wednesday, 24 November 2021
इक शख़्स को हमारा जो इंतिज़ार कम है
इक शख़्स को हमारा जो इंतिज़ार कम है
ग़मगीन है मगर दिल अब बे-क़रार कम है
कैसे रखूँ उसे अपने दर्द के मुक़ाबिल
है साथ वो मगर उस पे इख़्तियार कम है
होकर जुदा सनम से ज़िन्दा अभी तलक हूँ
अब मर्ग-ए-हिज्र पर हम को ए'तिबार कम है
शामिल हुजूम मे हूँ लेकिन बिना तुम्हारे
बर्बाद ज़िंदगी पर दार-ओ-मदार कम है
अब नब्ज़ डूबती है याँ याद में तुम्हारी
ग़मगीन एक दिल में रंज-ओ-गुबार कम है
दूरी-ए-यार का ग़म मंजूर है मगर गर
है यार बे-ख़बर तो ग़म शानदार कम है
यूँ तो बहुत हसीं है मौसम तिरे शहर का
लेकिन बग़ैर तेरे कुछ ख़ुश-गवार कम है
कुछ इस तरह ख़िज़ाँ ने वीराँ किया चमन को
अब शाख पर गुलों का नायाब बार कम है
शिकवा है ज़ीस्त से या इन्कार है तुम्हारा
क्यूँ राह-ए-ज़िन्दगी का मुझ को ख़ुमार कम है
ख़ुद में बिखर रहा हूँ जाने के बाद उन के
धड़कन सिमट रही है दिल का दयार कम है
किस बात का गिला फिर साये से ज़ुल्मतों के
सूरज ही जब हमारा हम पे निसार कम है
#अमित_अब्र
221 2122 221 2122