Monday, 29 November 2021

राह-ए-सदाक़त है वो

राह-ए-सदाक़त है वो
सच की किताबत है वो

इश्क़ है, इश्क़ की राह में 
सच्ची शहादत है वो

हौसला-ए-इश्क़ की इक
हसीं हिकायत* है वो
*कहानी

ईमान-ओ-दीन-ओ-ख़ुदा मेरा
मेरी इबादत है वो

पढ़ता हूँ उस में इश्क़ 
रब की इबारत है वो

लगता नहीं दिल उस बिन 
दिल की आदत है वो

बचे हैं गुल तूफ़ाँ में भी
शाख़-ए-हिफ़ाज़त है वो

करूँ अब इश्क़ कि इश्क़ की
हर्फ़-ए-इजाज़त है वो

चाहे दिल असीरी उस की
हसीं हिरासत है वो

फैसला मेरे हक़ में हुआ 
अच्छी शिकायत है वो

ख़िलाफ़ नफ़रत के 
सख़्त हिदायत है वो

आँखों में लहू की बूँदें
एक बग़ावत है वो

दलीलें ख़िलाफ़ हैं तो क्या 
मेरी हिमायत है वो

#अमित_अब्र

22      22    22 

कभी भँवर कभी किनारे पे लाती है ज़िन्दगी

कभी भँवर कभी किनारे पे लाती है ज़िन्दगी 
क़दम क़दम पर सब्र आज़माती है ज़िन्दगी 

बच्चों की ख़ातिर हँसते हैं हम ग़मगीन
अक्सर यूँ भी हमें सताती है ज़िन्दगी 

कहता नहीं किसी से अब दिल ग़म-ए-मुहब्बत 
ग़म चुपचाप अश्क़ में बहाती है ज़िन्दगी 

जब भी सितम-ज़दा दिल होता है इश्क़ में 
कई सवाल इश्क़ पे उठाती है ज़िन्दगी 

हूँ आज जाँ-ब-लब जो बाद-ए-यार तो फिर 
क्यूँकर महबूब से मिलाती है ज़िन्दगी

राह-ए-सफ़र-ए-याद-ए-यार में अक्सर अब
जाकर दूर तलक लौट आती है ज़िन्दगी 

आती है जब तासीर-ए-मुहब्बत में 
भूल अपना भी वजूद जाती है ज़िन्दगी 

ख़्वाब उस का आता है फिर नींद टूट जाती है  
पल में हँसाती पल में रुलाती है ज़िन्दगी 

#अमित_अब्र

22        22     22     22   22     2=22






Friday, 26 November 2021

दिल-ए-मजरूह की फिर आरज़ू क्या, जुस्तुजू क्या है

दिल-ए-मजरूह की फिर आरज़ू क्या, जुस्तुजू क्या है
मुसलसल कर्ब है तो फ़र्क क्या कि रू-ब-रू क्या है

नहीं हालात वश में हैं, नहीं तक़दीर पे क़ाबू
बता ऐ ज़िन्दगी अब और बाक़ी गुफ़्तुगू क्या है

बुरी तक़दीर भी मेरी, बुरी तक़रीर भी मेरी
परेशानी-ओ-ग़म के बाद बाक़ी कू-ब-कू क्या है

गया लेकर तुम्हारे ख़्वाब भी जब साथ वो अपने 
दिल-ए-मायूस बाक़ी और तेरी आरज़ू क्या है

हिफ़ाज़त के लिए दर-दर भटकने जब लगे अस्मत
हुकूमत की जहाँ में फिर बताओ आबरू क्या है

हिदायत लाख हो ख़ामोश रहने की मगर फिर भी
जफ़ा पर जो न उबले तो भला फिर वो लहू क्या है

इबादत में यक़ीं तो इश्क़ से इन्कार क्यूँ तुम को
मुहब्बत गर नही तो फिर ज़माने में ख़ुदा के हू-ब-हू क्या है

#अमित_अब्र

1222  1222  1222  1222

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दिल-ए-मजरूह= घायल दिल
आरज़ू= इच्छा
जुस्तजू= तलाश
कर्ब= दर्द
कू-ब-कू= everywhere हर जगह

Thursday, 25 November 2021

हँसी ये तुम्हारी

हँसी ये तुम्हारी
ख़ुशी है हमारी


वफ़ा की है ख़्वाहिश
रहे इश्क़ जारी


मुहब्बत की दुनिया
हसीं और प्यारी


बिना इश्क़ दुनिया
परेशान सारी


मुहब्बत शिफ़ा है
हो कोई बीमारी


हूँ बेज़ार तुम बिन
हुआ दिल भी भारी


मुहब्बत के दम से
अदावत है हारी


है क़िस्मत हमारी
है क़िस्मत की मारी


#अमित_अब्र

Wednesday, 24 November 2021

इक शख़्स को हमारा जो इंतिज़ार कम है

इक शख़्स को हमारा जो इंतिज़ार कम है
ग़मगीन है मगर दिल अब बे-क़रार कम है

कैसे रखूँ उसे अपने दर्द के मुक़ाबिल
है साथ वो मगर उस पे इख़्तियार कम है

होकर जुदा सनम से ज़िन्दा अभी तलक हूँ
अब मर्ग-ए-हिज्र पर हम को ए'तिबार कम है

शामिल हुजूम मे हूँ लेकिन बिना तुम्हारे
बर्बाद ज़िंदगी पर दार-ओ-मदार कम है

अब नब्ज़ डूबती है याँ याद में तुम्हारी
ग़मगीन एक दिल में रंज-ओ-गुबार कम है

दूरी-ए-यार का ग़म मंजूर है मगर गर
है यार बे-ख़बर तो ग़म शानदार कम है

यूँ तो बहुत हसीं है मौसम तिरे शहर का
लेकिन बग़ैर तेरे कुछ ख़ुश-गवार कम है

कुछ इस तरह ख़िज़ाँ ने वीराँ किया चमन को
अब शाख पर गुलों का नायाब बार कम है

शिकवा है ज़ीस्त से या इन्कार है तुम्हारा 
क्यूँ राह-ए-ज़िन्दगी का मुझ को ख़ुमार कम है

ख़ुद में बिखर रहा हूँ जाने के बाद उन के
धड़कन सिमट रही है दिल का दयार कम है

किस बात का गिला फिर साये से ज़ुल्मतों के
सूरज ही जब हमारा हम पे निसार कम है

#अमित_अब्र 


221  2122  221  2122

Tuesday, 16 November 2021

कभी जुस्तुजू कभी आरज़ू कभी जज़्बात होती हैं बेटियाँ

कभी जुस्तुजू, कभी आरज़ू 
कभी जज़्बात होती हैं बेटियाँ
कभी ज़िन्दगी, कभी रूह-ए-ज़िन्दगी 
तो कभी आब-ए-हयात होती हैं बेटियाँ 

कभी सवाल, कभी जवाब 
कभी पूरी किताब होती हैं बेटियाँ
कभी दिन, कभी रात, कभी आफ़ताब 
तो कभी माहताब होती हैं बेटियाँ

कभी शान ,कभी ईमान 
कभी ज़िन्दगी का अरमान होती हैं बेटियाँ 
कभी ज़मीं, कभी आसमान
तो कभी मुकम्मल जहान होती हैं बेटियाँ 

#अमित_अब्र






सितारा है घटा है या हसीं इक ख़्वाब है क्या है

सितारा है घटा है या हसीं इक ख़्वाब है क्या है 
चमकता सा लिबास-ए-शब में वो महताब है क्या है 

घनी ज़ुल्फ़ें क़मर रू सुर्ख़ लब तो झील आँखें हैं 
फ़क़त है हुस्न ही या हुस्न का सैलाब है क्या है 

कि अब तब्दील होती है चमकते चाँद में उल्फ़त 
जमाल-ए-यार है ख़ुर्शीद या शब-ताब है क्या है 

हँसी पर यार के होती अँधेरी रात भी रौशन 
सितारा है कि जुग्नू है कि इक महताब है क्या है 

उभरता डूबता है इश्क़ उस की मुस्कुराहट में 
समंदर हुस्न का है हुस्न का गिर्दाब है क्या है 

फ़ज़ा रंगीन होवे है अगर मौजूद जो वो हो
हुआ इक गुल हसीं वो या हुआ सुर्ख़ाब है क्या है 

तुम्हारी जुस्तुजू में ऐ मुहब्बत बे-क़रारी क्यूँ 
दिल-ए-मजरूह-ए-उल्फ़त या दिल-ए-बेताब है क्या है 

#अमित_अब्र


1222  1222  1222  1222