Tuesday, 17 March 2020

कहानी नही हूँ, तहरीर हूँ मैं

कहानी नही हूँ, तहरीर हूँ मैं 
शहर की मुकम्मल तस्वीर हूँ मैं

बयाँ कर रही है दीवार मुझ को
सुनो, पत्थरों की तक़रीर हूँ मैं

नज़र में मिरी अब हैं क़ैद आँसू
ग़म-ए-ज़िन्दगी की तफ़्सीर हूँ मैं

किया ज़ुल्मतों ने बे-नूर इतना 
शमा इक यहां बे-तनवीर* हूँ मैं 
(without light)

मेरी जिंदगी क्यूं ग़मगीन की है
ख़ुदा क्या तुम्हारी तक़्सीर* हूँ मैं 
(fault)

करो यूं न इतना बे-ज़ार मुझ को
किसी की खुशी की तदबीर हूँ मैं

बनाओ न मुझ को दीवार टूटी
सँवरते मकां की तक़दीर हूँ मैं

न कोई हुआ याँ मुझ से दुखी है 
मगर ग़र हुआ तो तकफ़ीर* हूँ मैं  
(who can be called काफ़िर)

मिटा दो मुझे ये कहकर शहर से
शहर मे शहर की तहक़ीर* हूँ मैं 
(insult)

रखे हो मुझे तुम महफ़ूज़ ऐसे 
लगे कोई हर्फ़-ए-तकबीर हूँ मैं
         
मेरी ये रिदा ही मेरा कफ़न है 
नही मुफ़्लिसी की तशहीर* हूँ मैं 
(publicity)

किसी के ग़मों ने ज़िन्दा रखा है 
किसी के अलम की तसख़ीर* हूँ मैं 
(जीत)

ग़ज़ल पाक है अब जिन आँसुओं से    
वही अश्क़, आब-ए-ततहीर* हूँ मैं 
(water of purification)

#अमित_अब्र

122  122  22  122

Friday, 6 March 2020

मालिक मिरे ! दिलों को बे-शर्त तू मिला दे

मालिक मिरे ! दिलों को बे-शर्त तू मिला दे
हैं दूरियाँ अगर तो, तू दूरियाँ मिटा दे 

नाकाम कर उन्हें रब, जो हैं हुए फ़सादी
हैं जो ख़िलाफ़-ए-ज़ुल्म, उन का हौसला बढ़ा दे

हो जाए ख़ाक जिस में, हर नफ़रत इस जहाँ की
भगवान् ! आग ऐसी दुनिया में तू जला दे

शाबाशियाँ उन्हें दे, जो लड़ रहे बला से 
रब ! जीत का उन्हें जज़्बा और तू ज़रा दे

क़ातिल हुई सियासत, सब जानते हैं लेकिन 
है कौन जो हुकूमत को, आज आइना दे

मैदान-ए-जंग-ए-उल्फ़त में, इश्क़ ही की ख़ातिर
तू बे-लहू बदन को, हिम्मत मिरे ख़ुदा दे

इंसान नेकियों से, फिर दूर हो रहा है 
करना दिलों को फिर से, तू नेकियाँ सिखा दे 

नादिम हुआ ख़ुदा है, इंसाँ की देख फ़ितरत 
कैसे बता हमें वो, खुशियों भरी दुआ दे

कश्ती फँसी भँवर में, नाराज़ नाख़ुदा है  
हो पार नाव मेरी, ठोकर ख़ुदा लगा दे

है आख़िरी तमन्ना, ऐ रब जहाँ की ख़ातिर 
कर रौशनी दिलों में, सब नफ़रतें बुझा दे

बेख़ौफ़ चल रहा हूँ, ले कर मशाल-ए-उल्फ़त
रब आज राह-ए-उल्फ़त में, दीप तू जला दे

#अमित_अब्र 

221  2122  221  2122








Monday, 2 March 2020

इक आग उठ रही है, सब ख़ाक हो रहा है

इक आग उठ रही है, सब ख़ाक हो रहा है
जागी हुई बला है, इंसान सो रहा है

कोई मुझे बता दे, है कौन जो दिलों में 
नफ़रत सहित अदावत के बीज बो रहा है 

हैं बा-वज़ूद उस के जारी यहाँ पे फ़ित्ने
नाकाम देख ख़ुद को आईन रो रहा है

क्यूँ फिर रहे हैं बातिल, बेख़ौफ़ इस शहर में 
क्यूँ जीत झूट की, क्यूँ सच का यक़ीन खो रहा है

है काम ये ख़ुदा का जो काम कर रहा हूँ 
रब आज ज़ालिमों के इल्ज़ाम ढो रहा है

फ़ित्ने हुए सियासी पर नाम रब का आया 
बदनाम नाम-ए-मजहब यूँ आज हो रहा है

गुल क़त्ल हो रहे तो गुलशन सना लहू में  
कोई दिल-ए-फ़ज़ा में ख़ंज़र चुभो रहा है  

सोचा नहीं कभी पर किरदार-ए-उंस ही अब
धागे में इश्क़ के याँ नफ़रत पिरो रहा है 

बिखरे हुए लहू का है ख़ौफ़ हर दिशा में 
है कौन जो वतन को ख़ूँ में डुबो रहा है 

ख़ामोश है यहाँ जो, इंसाफ़ की सदा पे
मेरी नज़र में क़ातिल वो शख़्स हो रहा है

#अमित_अब्र 

221  2122  221  2122