Monday, 2 March 2020

इक आग उठ रही है, सब ख़ाक हो रहा है

इक आग उठ रही है, सब ख़ाक हो रहा है
जागी हुई बला है, इंसान सो रहा है

कोई मुझे बता दे, है कौन जो दिलों में 
नफ़रत सहित अदावत के बीज बो रहा है 

हैं बा-वज़ूद उस के जारी यहाँ पे फ़ित्ने
नाकाम देख ख़ुद को आईन रो रहा है

क्यूँ फिर रहे हैं बातिल, बेख़ौफ़ इस शहर में 
क्यूँ जीत झूट की, क्यूँ सच का यक़ीन खो रहा है

है काम ये ख़ुदा का जो काम कर रहा हूँ 
रब आज ज़ालिमों के इल्ज़ाम ढो रहा है

फ़ित्ने हुए सियासी पर नाम रब का आया 
बदनाम नाम-ए-मजहब यूँ आज हो रहा है

गुल क़त्ल हो रहे तो गुलशन सना लहू में  
कोई दिल-ए-फ़ज़ा में ख़ंज़र चुभो रहा है  

सोचा नहीं कभी पर किरदार-ए-उंस ही अब
धागे में इश्क़ के याँ नफ़रत पिरो रहा है 

बिखरे हुए लहू का है ख़ौफ़ हर दिशा में 
है कौन जो वतन को ख़ूँ में डुबो रहा है 

ख़ामोश है यहाँ जो, इंसाफ़ की सदा पे
मेरी नज़र में क़ातिल वो शख़्स हो रहा है

#अमित_अब्र 

221  2122  221  2122

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