वादे से इक तुम्हारे मजबूर हो गये
ख़ातिर तुम्हारी तुम से हम दूर हो गये
ख़्वाहिश हमारे दिल की दिल ही में रह गयी
अरमान-ए-यार आगे मा'ज़ूर हो गये
बर्क़-ए-जमाल-ओ-हुस्न-ए-दिलबर में चाँद क्या
सूरज के साथ तारे बे-नूर हो गये
उल्फ़त की चाह हम को बदनाम कर गयी
वो इश्क़ कर लिए और मशहूर हो गये
उन की जिरह के आगे मेरी दलील क्या
सारे सुबूत भी ना-मंज़ूर हो गये
-अमित सिंह
27/5/2018