Saturday, 29 October 2022

कैसे उसे बताएँ कैसी है बे-क़रारी

कैसे उसे बताएँ कैसी है बे-क़रारी

आलम है हिज्र का तो बाक़ी है इंतिज़ारी


करता नहीं यक़ीं वो पर बात सच यही है
उस के बग़ैर जी में उठती है हूक भारी


इक ज़ब्त-ए-इश्क़ मेरी दुनिया बदल रहा है
क्या जानिए कहाँ अब ले जाये ये ख़ुमारी


उस के जुनून का है अब इख़्तियार मुझ पर
चलती नहीं है मुझ पर ख़ुद मेरी इख़्तियारी


है क़ैद में मुहब्बत किरदार ग़म-ज़दा हैं
रूदाद-ए-इश्क़ में है अब दर्द की शुमारी


फ़रियाद में मुझे वो जब रब से माँगता है
फ़िरदौस में उभरती है आह एक प्यारी


अंजाम-ए-इश्क़ में रख दो कहकशाँ हमारे
आग़ाज़-ए-इश्क़ हम ने काँटों में है गुज़ारी


हर इश्क़ हो मुकम्मल हर हाल में ज़मीं पे
कर ऐ ख़ुदा फ़लक से फ़रमान-ए-इश्क़ जारी


रुख़्सत हुए अगर तुम बेज़ार मेरे दर से 
बेज़ारी में फिर कटेगी मेरी ये उम्र सारी


यूँ ही नहीं तुम्हारा दर आज हम से छूटा
ऐ इश्क़ राह तेरी हम ने बहुत निहारी


हैं दर्द में मरासिम तन्हा हुआ जहाँ है
अपनों के वार से ही ये काएनात हारी


दार-ओ-मदार-ए-दुनिया सिर आन अब पड़ी है
कैसे करूँ मुहब्बत मैं तुझ पे जाँ-निसारी


-अमित सिंह

कारवान-ए-ख़याल है ज़िन्दगी

कारवान-ए-ख़याल है ज़िन्दगी
इक उरूज-ओ-ज़वाल है ज़िन्दगी 

दम-ब-दम कुछ न कुछ है ये पूछती 
आदतन इक सवाल है ज़िन्दगी 

रंज भी रंज की शिफ़ा भी है ज़ीस्त 
लाज़िमन बा-कमाल है ज़िन्दगी

आशिकों की नज़र बयाँ है किए 
जान-ए-जाँ का जमाल है ज़िन्दगी

हाल-ए-दिल क्या कहें कि अब इश्क़ में
यार बिन इक मलाल है ज़िन्दगी 

हार कर बार बार है जीतती 
हौसलों की मिसाल है ज़िन्दगी

#अमित_अब्र

मेरे लिए हुई तू मुश्किल सवाल क्यूँ है

मेरे लिए हुई तू मुश्किल सवाल क्यूँ है 
ऐ ज़िन्दगी तुझे अब जीना मुहाल क्यूँ है 

हासिल वही हुआ है क़िस्मत में जो तिरे था 
तक़दीर में नहीं जो उस का मलाल क्यूँ है 

है आजिज़ी जहाँ से या बात और है कुछ 
ऐ ज़िन्दगी तिरा यूँ बेहाल हाल क्यूँ है
  
है मौत आख़िरी में इस ज़िन्दगी का हासिल 
फिर और कुछ तुझे पाने का ख़याल क्यूँ है 

बे-नूर क्यूँ हुई है ऐ ज़िन्दगी बता भी
चेहरे पे आज तेरे आया ज़वाल क्यूँ है 

होना है क़त्ल फिर भी आता हूँ ओर तेरी
ऐ ज़ीस्त क़ातिलाना तेरा जमाल क्यूँ है 

क्यूँ दफ़्न हो रही है याँ ज़िन्दगी क़फ़स में 
इक क़ैद ज़ीस्त की मुश्किल देख-भाल क्यूँ है 

रूदाद-ए-इश्क़ पढ़ कर उठता ख़याल दिल में 
आसान हिज्र गर तो मुश्किल विसाल क्यूँ है

शमशीर नफ़रतों की ख़ामोश थी अगर तो
दीवार-ओ-दर मुहब्बत का आज लाल क्यूँ है 

हर दम यहाँ रहा जो ख़िदमत में सब की हाज़िर 
मुफ़्लिस वो आज सब पे भारी वबाल क्यूँ है 

लड़ना ही है तो लड़ तू मुफ़्लिस के हक़ की ख़ातिर 
पत्थर-दिलों की ख़ातिर तुझ में उबाल क्यूँ है 

गुमनाम फिर रही है दुनिया में क्यूँ सदाक़त 
मशहूर क्यूँ हैं झूटे बातिल मिसाल क्यूँ है  

आईन गर सही तो मुंसिफ़ अगर सही तो
क्यूँ बेगुनह क़फ़स में मुजरिम बहाल क्यूँ है 

#अमित_अब्र

सौदा दिल का बुरा नहीं होता

सौदा दिल का बुरा नहीं होता

इश्क़ घाटा नफ़ा नहीं होता


इश्क़ ज़्यादा ज़रा नहीं होता 

इश्क़ होता है या नहीं होता 


बात कुछ तो है इश्क़ में वर्ना 

दिल किसी पे फ़िदा नहीं होता


वस्ल या हिज्र या ख़ुशी या ग़म

इश्क़ बे-माजरा नहीं होता


होता हर इश्क़ गर मुकम्मल तो

क़ैस यूँ ग़म-ज़दा नहीं होता


इश्क़ में जो मिला अगर तो फिर 

दर्द दिल से जुदा नहीं होता


हाल-ए-दिल होता है बुरा यारो

दिल किसी का बुरा नहीं होता


वो तो नाराज़ है बहुत लेकिन   

क्यूँ मैं उस से ख़फ़ा नहीं होता


मिलते वो हम से रोज़ हैं लेकिन 

मिलने सा वाक़िआ' नहीं होता

 

सब से मिलता है सब का हो कर वो

जाने क्यूँ बस मिरा नहीं होता


तोहमतें हुस्न पर हमेशा क्यूँ

इश्क़ क्या बे-वफ़ा नहीं होता


फ़र्क हम ने किया बहुत लेकिन 

इश्क़ रब से जुदा नहीं होता


-अमित सिंह 

05-07-2018

याद में उस की अजब सी बे-क़रारी दिल में है

याद में उस की अजब सी बे-क़रारी दिल में है
वो नहीं है पास पर उस की ख़ुमारी दिल में है 

भूलता हूँ ये जहाँ जब यार आता है नज़र 
दूर होता है तो उठती हूक भारी दिल में है 

बे-वफ़ा है वो कि है मजबूर सब के सामने 
है हक़ीक़त क्या इसी की जंग जारी दिल में है

क्या बताएँ इश्क़ की तासीर का आलम तुम्हें 
अक्स ज़ेहन में तो उस की यादगारी दिल में है

इश्क़ पे बढ़ता गया है ज़ुल्म-ए-दुनिया दिन-ब-दिन
देख उल्फ़त पे सितम इक आह-ओ-ज़ारी दिल में है

जाँ-ब-लब थे हम मगर मिलने न आया था सनम
इसलिए है चश्म-ए-नम तो ज़ख़्म-ए-कारी दिल में है

आज भी कल की तरह मजबूर उल्फ़त है यहाँ 
इश्क़ की इस बेबसी पे सोगवारी दिल में है

शान-ओ-शौकत ने किया मग़रूर है पर आज भी
इश्क़ की ख़ातिर सनम इक ख़ाकसारी दिल में है

नाम आये गर कहानी में तो हमदम तू न डर
आज भी महफ़ूज़ तेरी राज़दारी दिल में है

बाद तुम को माँगने के कुछ न माँगू रब से मैं
आरज़ू भी जुस्तुजू भी बस तुम्हारी दिल में है

तू न आयेगी मगर चाहत पे अपनी है यक़ीं 
ऐ मुहब्बत अब भी तेरी इंतिज़ारी दिल में है

#अमित_अब्र 

करने को शाद उस को मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

करने को शाद उस को मैं इश्क़ लिख रहा हूँ
है सामने वही सो मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

चेहरा लगे है उस का जैसे किताब-ए-उल्फ़त
जब से पढ़ा है उस को मैं इश्क़ लिख रहा हूँ 

मसरूफ़ हूँ बहुत मैं मिलने के बाद उस से
मुझ से निजात पाओ मैं इश्क़ लिख रहा हूँ 

उस की हर इक अदा है मज़मून-ए-इश्क़ यारो
उस की हर इक अदा को मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

मालूम है पढ़ेगा मुझ को नहीं वो फिर भी
सब भूल कर के यारो मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

कैसे लिखूँ मुहब्बत आता नहीं समझ में
उस से मुझे मिलाओ मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

जल्वा-ए-हुस्न-ए-जानाँ मानो बयान-ए-उल्फ़त
देखा है जब से उन को मैं इश्क़ लिख रहा हूँ 

-अमित सिंह 
27-11-2021

हँसाना मुहब्बत रुलाना मुहब्बत

हँसाना मुहब्बत रुलाना मुहब्बत 
रुला कर उसे फिर हँसाना मुहब्बत

परेशान करना बिना बात उस को
परेशान कर फिर मनाना मुहब्बत
 
दिखाना कि नाराज़ उस से हूँ लेकिन
उसे देख कर मुस्कुराना मुहब्बत

उसे जीत जाता हूँ ख़ुद हार कर के 
कि है हार ही जीत जाना मुहब्बत 

ख़फ़ा तो हूँ पूरे ज़माने से लेकिन 
उसी एक पे हक़ जताना मुहब्बत

#अमित_अब्र
13-05-2022

ख़ुश-नसीबी भूल कर भी उस के घर आती नहीं

ख़ुश-नसीबी भूल कर भी उस के घर आती नहीं
घर से मुफ़्लिस के कभी अच्छी ख़बर आती नहीं

आसमाँ से बाँट कर आती ज़मीं पे क्या कि जो
रौशनी ये एक जैसी सब के दर आती नहीं  

क्या कभी तुम ने सुनी मुफ़्लिस के मरने की ख़बर
मौत होती है मगर हम तक ख़बर आती नहीं

बाद हर शब इक सहर आती शहर में रोज़ है 
बस्तियों में क्यूँ वही लेकिन सहर आती नहीं 

ले रही है जाँ ग़रीबों की ग़रीबी दिन-ब-दिन
मुफ़्लिसी फिर भी हमें क़ातिल नज़र आती नहीं 

क्या बदल ली वक़्त ने करवट बला की ओर है
ख़ुश-नसीबी भूलकर भी जो इधर आती नहीं 

आदमी सा हो चला क्या आज तू भी ऐ ख़ुदा
आज क्यूँ मजबूर तक तेरी मेहर आती नहीं

#अमित_अब्र 

ख़ूबसूरत ख़ुमार है यारों

ख़ूबसूरत ख़ुमार है यारों
इश्क़ दिल की पुकार है यारों 

इश्क़ में मुब्तला जवाँ दिल पे 
कब रहा इख़्तियार है यारों

और कुछ भी नहीं है इश्क़ फ़क़त
अपना ही इन्तिज़ार है यारों

हिज्र चुभता है दिल में काँटे सा  
यार बिन ज़ीस्त ख़ार है यारों

करता तो बेक़रार है लेकिन
इश्क़ ही से क़रार है यारों

#अमित_अब्र 
30-09-2022

वजूद-ए-मुहब्बत सवालों में है


वजूद-ए-मुहब्बत सवालों में है
नहीं गर तू मेरे ख़यालों में है


कि तू जो है शामिल हर इक ख़्वाब में 
हर इक रात मेरी उजालों में है


लिखा है दिलों पे मुहब्बत ने जो
कहाँ वो कहानी रिसालों में है


मुहब्बत की ख़ातिर है जो इश्क़ में
कहाँ बात वो हुस्न वालों में है


है मदहोश जिस में मुहब्बत भी अब
वही जाम याँ आज प्यालों में है


किसी का फ़साना अधूरा रहा 
किसी की कहानी हवालों में है


नहीं इश्क़ में आबलों से तू डर
मुहब्बत निहाँ आज छालों में है


शब-ए-वस्ल की उम्र पल भर की थी
शब-ए-हिज्र की उम्र सालों में है


हवा से लड़ा इक दिया उम्र भर 
मुहब्बत अब उस की मिसालों में है


#अमित_अब्र

श्री कृष्ण एक दिन मन अर्जुन का भाँप कर के

अस्सी के दशक की बात है जब पिता जी एक गीत गा कर सुनाया करते थे जिसका मज़मून था कि जब अर्जुन को वहम हुआ कि वही भगवान श्रीकृष्ण के सब से बड़े भक्त हैं तो भगवान उन का ये घमण्ड तोड़ने के लिये उन्हें अपने एक भक्त के यहाँ ले गये जिस ने दान में भगवान के शेर के भोजन के लिए अपने बेटे की क़ुर्बानी दे दी। यह देख अर्जुन का वहम दूर हुआ। 
गीत आधा अधूरा याद था तो उसे पूरा किया और एक बहर में रख मसनवी के अन्दाज़ में कोशिश की है।
लिखा किसने है आप पढेंगे तो थोड़ा आश्चर्य होगा। नाम आख़िरी शेर में बतौर तख़ल्लुस है। 


श्री कृष्ण एक दिन मन अर्जुन का भाँप कर के
दिखलाने भक्ति वो आये भक्त ही के दर पे 

भगवन् का भक्त था जो था एक वीर राजा 
उस मोरध्वज का क़िस्सा आकाश में विराजा

हम ने सुना कि राजा तू दानी इक बड़ा है 
ये है वजह जो दर पर आना तिरे पड़ा है
तू दे वचन जो स्वागत स्वीकार गर तुझे हो 
जायेंगे हम चले जो इन्कार गर तुझे हो 

नृप दे वचन ये बोले जाना यहाँ से क्यूँ कर
अच्छा नहीं कि साधू जाये उदास हो कर 

सुन के वचन मदन जी बोले हैं मुस्कुरा के
तुम सामने सो लाओ लड़के को अब बुला के

दोनों ही प्राणी खींचो आरे को सर पे धर के
हम जायेंगे यहाँ से अपनी क्षुधा को भर के

है शर्त ये भी आँसू आँखों से गिर न जाये
तुम दोनों मुस्कुराओ लड़का भी मुस्कुराये

ये हाल सुन के राजा फौरन महल में आये
सब हाल अपनी रानी लड़के से कह सुनाये

बोला पिता से लड़का हैरत की बात क्या है
मर जायेगा ज़माना मेरी बिसात क्या है

धनभाग मांस मेरा भगवन् का शेर खाये
यूँ नाम आप का भी दुनिया में फ़ैल जाये 

माता पिता बगल में सुत बीच में खड़ा था
इन तीनों मूर्तियों पे ये इम्तिहाँ कड़ा था

आरे को सर पे धर जब माँ बाप खींचते थे
धरती ये काँपती थी दिग्गज भी चीख़ते थे 

सन्नाटे में पवन थी पर्वत बिखर रहा था
औलाद को दो टुकड़ा जब बाप कर रहा था

जिस दम मुहब्बतों का सागर उछल पड़ा है
आँखों से मां के आँसू फौरन निकल पड़ा है

आँसू को देख गिरते बोले पिता से मोहन 
राजा नहीं करेगा अब शेर इस का भोजन

भगवन् से बोले राजा ये बात यूँ न अब है
सच पूछिये तो आँसू गिरने का ये सबब है

ममता जो माँ के मन में थोड़ी उमड़ पड़ी है
सो बाईं आँख ही इस कारण घुमड़ पड़ी है

क्या भोग दाहिने का ही शेर अब करेगा
ये बाम अंग घर में मेरे पड़ा सड़ेगा

भगवान बोले राजन भोजन कहाँ है लाओ
भोजन के साथ रानी लड़के को भी बुलाओ

राजा कहे कि भगवन् दूजा नहीं है प्यारा
औलाद इक वही था जिस पे चला है आरा

भगवन् कहे कि तू ने अच्छा किया बताकर
हम भी रखेंगे अपने इस धर्म को बचाकर

निह्पुत करूँ तो करना भोजन उचित नहीं है
करना तुम्हें अकेला ये धर्म हित नहीं है

भगवन् ने हाल सुन ये बंसी तुरत बजाया
हँसता हुआ है बालक आगे पिता के आया

राजा रहे थे दानी उन को था आज़माना
सत् के विजय का डंका दुनिया में था बजाना

लिखते ‘ख़लील अहमद’ श्री कृष्ण का फ़साना
माया नयी नयी दुनिया को दिखा के जाना

संकलन एवं पुनर्विन्यास-
डॉ.अमित कुमार सिंह ‘अब्र’
05-10-2022


हो कर गई मुहब्बत रुस्वा दर-ए-शहर से

हो कर गई मुहब्बत रुस्वा दर-ए-शहर से 

देखा किए सभी पर निकला न कोई घर से 


दिल है बुझा बुझा सा उस के बग़ैर मेरा
घर में भी हो गई है इक शाम अब सहर से


हर दर्द के सफ़र में दिलबर इलाज-ए-ग़म है
कटता नहीं हमारा नाला-ए-दिल ज़हर से


क्या दैर क्या हरम क्या दर शैख-ओ-बरहमन का
जाते नहीं कहीं हम अब यार के शहर से


कुछ यूँ गुज़र रही है इस दौर में मुहब्बत
अब बह रहा है इस में ख़ूँ आप चश्म-ए-तर से


दीद-ए-सनम की ख़ातिर भूला हूँ दर ख़ुदा का
मैं हो गया हूँ काफ़िर दुनिया में इस ख़बर से


इक बार तुम मिले थे इक भीड़ में कहीं पर
तस्वीर अब तुम्हारी हटती नहीं नज़र से


ख़्वाब-ए-फ़िराक़-ए-दिलबर मंज़ूर अब नहीं है
कह दो निगाह-ए-दिन से और रात के जिगर से


पैहम यहाँ चले तो हासिल हुआ ठिकाना
मंज़िल के वास्ते हम हारे नहीं सफ़र से


यायावरी हमारी कर दे न दूर उन को
कूचा-ए-यार घर है इस बात की फ़िकर से


रौशन न था दिनों से माना मकान उस का 

सोया नहीं मुसलसल क्यूँ मैं कई पहर से 


#अमित_अब्र

झील आँखों में समंदर रंज-ओ-ग़म का इक बहे

झील आँखों में समंदर रंज-ओ-ग़म का इक बहे
क़ैद अपने साहिलों में झील ग़म किस से कहे

एक दिल है लाख ग़म हैं और दौर-ए-हिज्र है
ग़म सहे कितने मगर दिल दर्द-ए-दिल कैसे सहे

दौर-ए-नफ़रत आज का भी है गुज़िश्ता दौर सा
बेक़ुसूरों के ख़ुदाया आशियाने फिर ढहे 

जल रहे हैं रूह-ओ-जाँ अब याद की इक आग में 
यार आ भी जा कि कब तक जाँ झुलसती ही रहे

क्या बताऊँ मैं कि कैसी थी मसाफ़त इश्क़ की 
गाह चलता था सफ़र में और रुकता था गहे

#अमित_अब्र 

बे-क़रारी इश्क़ में है बे-क़रारी प्यार में है

बे-क़रारी इश्क़ में है बे-क़रारी प्यार में है
बे-क़रारी हिज्र में है और वस्ल-ए-यार में है

बे-क़रारी में मुहब्बत आज टहली जो गली में 
बे-क़रारी है गली में, कूचा-ए-दिलदार में है

मौत होगी या कि हासिल इश्क़ होगा यार का अब
बे-क़रारी बे-क़रारी इश्क़ के बीमार में है

आज आएगा नज़र वो या कि पर्दे में रहेगा    
इक अजब सी बे-क़रारी हसरत-ए-दीदार में है

है इलाज-ए-बे-क़रारी कह दूँ उन से हाल-ए-दिल 
सोचना आसाँ मगर मुश्किल बहुत इज़हार में है

उन के आने की ख़बर से बे-क़रारी आस्ताँ में
बेक़रारी आँगन-ओ-बाम-ओ-दर-ओ-दीवार में है

आ रहा था हम से मिलने पर न आया अब तलक वो
बे-क़रारी और ख़्याल-ए-यार भी अफ़्कार में है

#अमित_अब्र 


सँवर जाती है जब ये ज़िन्दगी उल्फ़त की राहों में

सँवर जाती है जब ये ज़िन्दगी उल्फ़त की राहों में 
ज़माना क्यूँ गिने है फिर मुहब्बत को गुनाहों में 

वही चेहरा वही आँखें वही आरिज़ वही ज़ुल्फ़ें
वही इक शख़्स बसता है हमारी इन निगाहों में

कभी झुमका कभी पायल कभी नथिया कभी बिंदी
कभी देखूँ तिलिस्मी से वो दो तावीज़ बाहों में

अदालत नफ़रतों की फिर न दे पाई सज़ा कोई
मुक़दमे में मुहब्बत जब रही शामिल गवाहों में

मुहब्बत से पुकारो तो ख़ुदा ख़ुद में नज़र आए 
ज़रूरी कब रहा जाना शिवालों ईदगाहों में

ज़माना और भी शफ़्फ़ाफ़ होता है मुहब्बत में
निखरता और है इंसाँ मुहब्बत की पनाहों में

मुहब्बत से भरे दिल को सताया जब ज़माने ने 
ज़माना आप जल उट्ठा दीवाने दिल की आहों में

#अमित_अब्र
14-09-2022



इश्क़ करते हैं तो ख़ता क्या है

इश्क़ करते हैं तो ख़ता क्या है
ग़र ख़ता है भी तो सज़ा क्या है

सुन रहे हो ना तुम मेरी धड़कन 
मेरे दिल की सुनो रज़ा क्या है 

इश्क़ पे ही नहीं यक़ीं तुम को 
तुम से मैं क्या कहूँ वफ़ा क्या है 

जान देना जो कम है तो कहिए
इश्क़ की और इंतिहा क्या है

कीजिए इश्क़ बन्दगी की जगह
और फिर जानिए ख़ुदा क्या है

#अमित_अब्र
06-09-2021

कल शब जो बढ़ा आलम-ए-रानाई ज़रा और

कल शब जो बढ़ा आलम-ए-रानाई ज़रा और

छायी दिल-ए-मायूस पे तन्हाई ज़रा और


होता न अँधेरा मिरी तक़दीर पे क़ाबिज़ 

होती जो उजाले से शनासाई ज़रा और


जल्दी में था सूरज मिरा बिन शाम ढला आज

वर्ना अभी चलती मिरी परछाई ज़रा और 


बदनाम मिरी ज़ीस्त अभी कम थी भला क्या 

जो मौत ने शोहरत मुझे दिलवाई ज़रा और


मानी जो नहीं बात सितमगर की तो यारो

शमशीर-ए-सितमगर मिरी ओर आई ज़रा और


ज्यों ज्यों बढ़ा है ज़ुल्म-ओ-सितम जिस्म-ओ-ज़ुबाँ पर 

हिम्मत मेरी इस रूह पे गहराई ज़रा और


मसले पे जिरह बिन ही गुनहगार हुए हम

बच जाते अगर चलती जो सुनवाई ज़रा और 


-अमित सिंह

30-4-2018