अस्सी के दशक की बात है जब पिता जी एक गीत गा कर सुनाया करते थे जिसका मज़मून था कि जब अर्जुन को वहम हुआ कि वही भगवान श्रीकृष्ण के सब से बड़े भक्त हैं तो भगवान उन का ये घमण्ड तोड़ने के लिये उन्हें अपने एक भक्त के यहाँ ले गये जिस ने दान में भगवान के शेर के भोजन के लिए अपने बेटे की क़ुर्बानी दे दी। यह देख अर्जुन का वहम दूर हुआ।
गीत आधा अधूरा याद था तो उसे पूरा किया और एक बहर में रख मसनवी के अन्दाज़ में कोशिश की है।
लिखा किसने है आप पढेंगे तो थोड़ा आश्चर्य होगा। नाम आख़िरी शेर में बतौर तख़ल्लुस है।
श्री कृष्ण एक दिन मन अर्जुन का भाँप कर के
दिखलाने भक्ति वो आये भक्त ही के दर पे
भगवन् का भक्त था जो था एक वीर राजा
उस मोरध्वज का क़िस्सा आकाश में विराजा
हम ने सुना कि राजा तू दानी इक बड़ा है
ये है वजह जो दर पर आना तिरे पड़ा है
तू दे वचन जो स्वागत स्वीकार गर तुझे हो
जायेंगे हम चले जो इन्कार गर तुझे हो
नृप दे वचन ये बोले जाना यहाँ से क्यूँ कर
अच्छा नहीं कि साधू जाये उदास हो कर
सुन के वचन मदन जी बोले हैं मुस्कुरा के
तुम सामने सो लाओ लड़के को अब बुला के
दोनों ही प्राणी खींचो आरे को सर पे धर के
हम जायेंगे यहाँ से अपनी क्षुधा को भर के
है शर्त ये भी आँसू आँखों से गिर न जाये
तुम दोनों मुस्कुराओ लड़का भी मुस्कुराये
ये हाल सुन के राजा फौरन महल में आये
सब हाल अपनी रानी लड़के से कह सुनाये
बोला पिता से लड़का हैरत की बात क्या है
मर जायेगा ज़माना मेरी बिसात क्या है
धनभाग मांस मेरा भगवन् का शेर खाये
यूँ नाम आप का भी दुनिया में फ़ैल जाये
माता पिता बगल में सुत बीच में खड़ा था
इन तीनों मूर्तियों पे ये इम्तिहाँ कड़ा था
आरे को सर पे धर जब माँ बाप खींचते थे
धरती ये काँपती थी दिग्गज भी चीख़ते थे
सन्नाटे में पवन थी पर्वत बिखर रहा था
औलाद को दो टुकड़ा जब बाप कर रहा था
जिस दम मुहब्बतों का सागर उछल पड़ा है
आँखों से मां के आँसू फौरन निकल पड़ा है
आँसू को देख गिरते बोले पिता से मोहन
राजा नहीं करेगा अब शेर इस का भोजन
भगवन् से बोले राजा ये बात यूँ न अब है
सच पूछिये तो आँसू गिरने का ये सबब है
ममता जो माँ के मन में थोड़ी उमड़ पड़ी है
सो बाईं आँख ही इस कारण घुमड़ पड़ी है
क्या भोग दाहिने का ही शेर अब करेगा
ये बाम अंग घर में मेरे पड़ा सड़ेगा
भगवान बोले राजन भोजन कहाँ है लाओ
भोजन के साथ रानी लड़के को भी बुलाओ
राजा कहे कि भगवन् दूजा नहीं है प्यारा
औलाद इक वही था जिस पे चला है आरा
भगवन् कहे कि तू ने अच्छा किया बताकर
हम भी रखेंगे अपने इस धर्म को बचाकर
निह्पुत करूँ तो करना भोजन उचित नहीं है
करना तुम्हें अकेला ये धर्म हित नहीं है
भगवन् ने हाल सुन ये बंसी तुरत बजाया
हँसता हुआ है बालक आगे पिता के आया
राजा रहे थे दानी उन को था आज़माना
सत् के विजय का डंका दुनिया में था बजाना
लिखते ‘ख़लील अहमद’ श्री कृष्ण का फ़साना
माया नयी नयी दुनिया को दिखा के जाना
संकलन एवं पुनर्विन्यास-
डॉ.अमित कुमार सिंह ‘अब्र’
05-10-2022