हो तुम तो दुनिया की शान-ओ-मान है मुहब्बत
जो तुम नहीं तो बिस्मिल-ओ-बे-जान है मुहब्बत
वो जाँ-ब-लब था लेकिन आया सदा पे मेरी
कैसे कहूँ ख़ुदा ना-फ़रमान है मुहब्बत
बन्द करूँ आँखें तो उभरता है अक्स-ए-यार
ख़्वाबों पे मेरे मेहरबान है मुहब्बत
आना शब के किसी पहर था प शब गुज़र गई है
क्या हुआ, इस बात से परेशान है मुहब्बत
जी उट्ठे फिर से हम मिलने के बा'द उन से
कैसे कहें बताओ बे-जान है मुहब्बत
आग पे पड़े है चलना दौरान-ए-सफ़र-ए-इश्क़
आग पे चलने का इक फ़रमान है मुहब्बत
नफ़रत भरी दिलों में, है उल्फ़त फ़क़त लबों पे
इस हाल-ए-मुहब्बत पे पशेमान है मुहब्बत
नाराज़गी से तेरे है दिल में बयाबानी
बिना तबस्सुम तेरे बयाबान है मुहब्बत
नफ़रत की तेग़ से घायल हुआ है, फिर भी
उस बिस्मिल के जी का अरमान है मुहब्बत
ख़ंज़र उतर रहा है सीने में बदले उल्फ़त
मंज़र ये देख कर लहू-लुहान है मुहब्बत
बिना तुम्हारे मानो रंजीदा शायर के
ग़मगीं ग़ज़लों का इक दीवान है मुहब्बत
चराग़-ए-दिल की हो गयी है लौ जो थोड़ी धीमी
तो हो गई बहुत ही हलकान है मुहब्बत
आवाज़ ही न दी उल्फ़त को दिल ने वर्ना
इस दिल की सदा से कब अंजान है मुहब्बत
पर्वा न कर किसी की कर तू यक़ीं कि हम पे
उस रब का ख़ूबसूरत एहसान है मुहब्बत
#अमित_अब्र
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