Friday, 17 January 2020

इश्क़ उल्फ़त भरी इक नज़र है मियाँ

इश्क़ उल्फ़त भरी इक नज़र है मियाँ
इश्क़ उन की अदा का क़हर है मियाँ

मो'जज़ा कुछ नहीं, बात इतनी सी है
इश्क़ उन की नज़र का असर है मियाँ

क्या सुबह शाम क्या रात दिन दोपहर
याँ सफ़र इश्क़ का हर पहर है मियाँ

वस्ल या हिज्र या इक सफ़र रेत का
इश्क़ ग़म या ख़ुशी या शरर है मियाँ

मौत से रू-ब-रू होती है ज़िन्दगी
इश्क़ तो मौत से बे-ख़बर है मियाँ

ज़ुल्म के बीच जारी रहा इश्क़ है
इश्क़ पे ज़ुल्म याँ बे-असर है मियाँ

राह पे इश्क़ की चलना ही इश्क़ है
इश्क़ मंज़िल नहीं है, सफ़र है मियाँ

#अमित_अब्र
212       212    212     212 




Wednesday, 15 January 2020

दिलबर की याद में बे-चैन मेरा दिल है

दिलबर की याद में बे-चैन मेरा दिल है
सज़ा-ए-उल्फ़त है या वफ़ा का हासिल है

डूबे तो ठीक थे, निकले तो जल उठे हैं
दरिया-ए-इश्क़ का आतिश-मिज़ाज साहिल है

उल्फ़त की दास्ताँ सुन आया यक़ीन ये
राह-ए-मुहब्बत दिलबर बग़ैर मुश्किल है

नज़र-अंदाज़ हुआ जो निगाह-ए-यार से, तो
दुुनिया ही नहीं, दिल आप से भी ग़ाफ़िल है

मुजरिम बता दिया है क्या यार ने मुझे      
जो नाम पे मेरे बे-ज़ुबान महफ़िल है

सहरा से जो गुज़रे तो ख़याल-ए-क़ैस आया
उस दिल-ए-बिस्मिल का दिल आज भी क़ाइल है

बरसों रहा सफ़र में कौन उस की ख़ातिर
मिलने को आज उस से बे-क़रार मंज़िल है

#अमित_अब्र

22   22    22    22     22    2=22

    

Wednesday, 8 January 2020

हो तुम तो दुनिया की शान-ओ-मान है मुहब्बत

हो तुम तो दुनिया की शान-ओ-मान है मुहब्बत 
जो तुम नहीं तो बिस्मिल-ओ-बे-जान है मुहब्बत

वो जाँ-ब-लब था लेकिन आया सदा पे मेरी
कैसे कहूँ ख़ुदा ना-फ़रमान है मुहब्बत

बन्द करूँ आँखें तो उभरता है अक्स-ए-यार 
ख़्वाबों पे मेरे मेहरबान है मुहब्बत

आना शब के किसी पहर था प शब गुज़र गई है
क्या हुआ, इस बात से परेशान है मुहब्बत

जी उट्ठे फिर से हम मिलने के बा'द उन से
कैसे कहें बताओ बे-जान है मुहब्बत 

आग पे पड़े है चलना दौरान-ए-सफ़र-ए-इश्क़ 
आग पे चलने का इक फ़रमान है मुहब्बत 

नफ़रत भरी दिलों में, है उल्फ़त फ़क़त लबों पे 
इस हाल-ए-मुहब्बत पे पशेमान है मुहब्बत 

नाराज़गी से तेरे है दिल में बयाबानी
बिना तबस्सुम तेरे बयाबान है मुहब्बत 

नफ़रत की तेग़ से घायल हुआ है, फिर भी
उस बिस्मिल के जी का अरमान है मुहब्बत 

ख़ंज़र उतर रहा है सीने में बदले उल्फ़त 
मंज़र ये देख कर लहू-लुहान है मुहब्बत 

बिना तुम्हारे मानो रंजीदा शायर के
ग़मगीं ग़ज़लों का इक दीवान है मुहब्बत

चराग़-ए-दिल की हो गयी है लौ जो थोड़ी धीमी 
तो हो गई बहुत ही हलकान है मुहब्बत 
 
आवाज़ ही न दी उल्फ़त को दिल ने वर्ना 
इस दिल की सदा से कब अंजान है मुहब्बत 

पर्वा न कर किसी की कर तू यक़ीं कि हम पे 
उस रब का ख़ूबसूरत एहसान है मुहब्बत 

#अमित_अब्र

22   22   22   22   22   22  


Sunday, 5 January 2020

कर के रुस्वा मुझ को, वो भी पछताया होगा

कर के रुस्वा मुझ को, वो भी पछताया होगा
छुप कर ही सही, जनाज़े में मिरे आया होगा 

आया होगा ज़िक्र मिरा, जब ज़िक्र-ए-मुहब्बत में
हाल-ए-दिल अपना वो, ब-मुश्किल सब से छुपाया होगा

दूर हुए जो दस्तूर-ए-दुनिया की ब-दौलत हम
फिर नींद न आई हम को, वो भी न सो पाया होगा

हो के ग़ैर का तस्वीर हमारी जलायी होगी
यादों से मगर अपनी हम को न भुलाया होगा

ख़्वाब तो आते होंगे मेरे अक्सर उस को
ताबीरों ने भी पता मेरा उस को बताया होगा

अर्ज़-ए-दुनिया पे मुहब्बत के लिए, वो हिज्र में भी
दर्द भरे दिल से, गीत उल्फ़त के गाया होगा

गुज़र गया होगा दर्द-ए-दिल, जब हद से अपने
फिर दिल, हाल-ए-दिल पे अपने मुस्काया होगा

#अमित_अब्र

22          22      22      22   22    22  2 =26