उन की नज़र में उन के मैं नाम हो रहा हूँ
सब की नज़र में लेकिन बदनाम हो रहा हूँ
मिलकर भी उस से मिलना मुमकिन नहीं हुआ है
वो सुब्ह हो रही है मैं शाम हो रहा हूँ
आ जाये वो अगर तो मुमकिन कि साँस लौटे
जीने में वर्ना अब मैं नाकाम हो रहा हूँ
हँस कर के वो मिले थे बेचैन मैं हूँ तब से
आग़ाज़-ए-इश्क़ वो मैं अंजाम हो रहा हूँ
दीदार-ए-यार ने था तन्हा किया जहाँ में
अब डूब इश्क़ में मैं गुमनाम हो रहा हूँ
तहरीक-ए-इश्क़ का जो ऐलान कर दिया है
उल्फ़त के दुश्मनों का ईनाम हो रहा हूँ
क्या ख़ूब है मुहब्बत का खेल अब कहूँ क्या
उन की भी हार का मैं इल्ज़ाम हो रहा हूँ
वसलत भी हिज्र भी फिर नाराज़गी जहाँ की
उल्फ़त का इक मुकम्मल पैग़ाम हो रहा हूँ
दिल की लगी का हासिल उल्फ़त का है ये तोहफ़ा
मशहूर हो रहा हूँ बदनाम हो रहा हूँ
#अमित_अब्र