Thursday, 6 January 2022

ग़ज़ल हिज्र में गुनगुना कर चले

ग़ज़ल हिज्र में गुनगुना कर चले

ग़म-ए-हिज्र दिल में छुपा कर चले


मुहब्बत की दुनिया न मेरी हुई 

मुहब्बत की दुनिया भुला कर चले


नहीं वो रहे जो मिरे मुंतज़िर 

मुहब्बत से जी सो उठा कर चले 


विसाल-ए-सनम जब न मुमकिन हुआ

तो हम जश्न-ए-फ़ुर्क़त मना कर चले


मुहब्बत में वादे किए थे कई

मुहब्बत के वादे निभा कर चले


मुहब्बत की ख़्वाहिश रहूँ दूर सो

निशाँ इश्क़ के सब मिटा कर चले


हक़ीक़त में हैं वो भुलाये हमें

उन्हे ख़्वाब में याद आ कर चले


बुराई का दामन बड़ा है बहुत 

बुराई से दामन बचा कर चले


सबब थी तबाही की मेरी अना   

अना ख़ाक में सो मिला कर चले


हँसाकर किसी एक मायूस को 

यहाँ प्यार यूँ भी जता कर चले


रह-ए-इश्क़ में दिल दुखा है बहुत 

नई राह दिल को दिखा कर चले


न बुत है न काबा न तुम हो यहाँ

परस्तिश की लौ सो बुझा कर चले


रहीं जब न ख़ुशियाँ यहाँ मुस्तक़िल

मरासिम ग़मों से बना कर चले


रहे मो'तबर आसमाँ इश्क़ का 

परिन्दे वफ़ा के उड़ा कर चले


सताया गया हूँ बहुत इश्क़ में

मगर इश्क़ रब है बता कर चले


बयाबाँ किया था मुझे इश्क़ ने

गुल-ए-इश्क़ फिर भी खिला कर चले 


रह-ए-इश्क़ दुनिया की काँटो भरी

रह-ए-इश्क़ में गुल बिछा कर चले


वही आरज़ू है वही जुस्तुजू 

उसी एक से जी लगा कर चले


वफ़ा के बगीचे बयाबाँ हुए 

वफ़ा के बगीचे सजा कर चले


मुहब्बत ही है हिज्र के मोड़ पर 

नज़र से न उन को गिरा कर चले


मुहब्बत न थी मेरी तक़दीर में 

यही बात दिल को बता कर चले


हयात-ए-मुहब्बत की ख़ातिर ख़ुदा 

मुहब्बत की बस्ती बसा कर चले


अगरचे मयस्सर नहीं वो मुझे 

मगर आस जी को दिला कर चले


तक़ाज़ा-ए-उल्फ़त की ख़ातिर ही हम 

ग़म-ए-हिज्र में मुस्कुरा कर चले


किया 'अब्र' क्या तुम ने आकर यहाँ

ग़म-ए-ज़ीस्त गाकर सुना कर चले 


#अमित_अब्र

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