Monday, 10 January 2022

हम आह लिखते हैं वो वाह करते हैं

हम आह लिखते हैं वो वाह करते हैं
दिल ग़म में रहता है वो शाद रहते हैं


दरिया-ए-दिल उन बिन सहरा हुआ यारों
बादल भी हो कर दर से दूर उड़ते हैं


चेहरे पे बिखरी है मुस्कान पर उस बिन
ग़म के समंदर चश्म-ए-नम में बहते हैं


कुछ कर न पाये जब हम ख़ातिर उल्फ़त की
तक़दीर पे फिर अपनी आह भरते हैं


इस ख़ूब दुनिया के दस्तूर हैं कैसे
इक आरज़ू में याँ सौ ख़्वाब मरते हैं


ज़ालिम सियासत से घायल सदाक़त है
सच की सदा पे अब सौ ज़ुल्म ढहते हैं


हर रोज़ हैं बुझते तूफ़ान में उस के
दीये मगर शब से हर रोज़ लड़ते हैं


मजबूर को मत और मजबूर कर ऐ रब
इक आह-ए-सहरा में सौ दरिया जलते हैं


मायूस हैं तो क्या ख़्वाहिश नहीं होती
बेबस दिलों में भी अरमान पलते हैं


सहरा हुआ है तब तब्दील सागर में
आफ़ाक़ पे बादल जब शाद चलते हैं


इक सच जहाँ में है मौजूद मुद्दत से
उल्फ़त भरे दिल अक्सर ज़ुल्म सहते हैं


#अमित_अब्र

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