इंसान से क्यूँ इंसान आज ग़ाफ़िल है
क्यूँ दरमियान-ए-दुनिया हद्द-ए-फ़ासिल है
मजबूर हर सच है क्यूँ आज दुनिया में
क्यूँ सामने हर सच के एक बातिल है
बर्बाद पहले से कम थी ज़रा क्या जो
आज इक शहर बस्ती में फिर से दाख़िल है
ख़्वाहिश न हँसने की फ़ुरसत न रोने की
वो शख़्स ग़म की इक तस्वीर-ए-कामिल है
अब रात है दर पर दिन के उजाले में
दिन के उजालों में अब रात शामिल है
बुनियाद-ए-सहरा हिलती है हवाओं से
हर मौज से होता कमज़ोर साहिल है
दुनिया तिरी नफ़रत मिस्मार होगी अब
तूफ़ान-ए-उल्फ़त अब तेरे मुक़ाबिल है
थे हाथ तब ख़ाली जब जी रहे थे हम
दो गज़ ज़मीं मरने के बाद हासिल है
दे मौत जिस्म-ओ-जाँ को या बता ऐ रब
ग़म मेरा कम करने के कौन क़ाबिल है
हर दर्द से हो कर वाक़िफ़ है ना-वाक़िफ़
इस तौर भी ये दुनिया मेरी क़ातिल है
मौजूद है रोटी हर घर में याँ लेकिन
लौटा दरों से ख़ाली पेट साइल है
#अमित_अब्र
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