मैं मैं न रहा
उसे चाहा नहीं था मैंने
उसे पूजा था मैंने
कहते हैं इश्क़ को रब
सो की थी हम ने
बंदगी उस की
एहसास उसे जब हुआ
तो जगा गया
इक उम्मीद
और शुरू हुआ इक सिलसिला
इंतिज़ार का जो चला मुद्दतों लेकिन
फिर आई नज़र ना-उम्मीदी
और मार गई आधा मुझे
लेकिन इक भरोसा
रब पे
बंदगी पे
अपनी चाहत की सदाक़त पे
सो रहा बरक़रार
वो सिलसिला इंतिज़ार का
और जारी रहा
और जारी ही रहा लेकिन
ये पता भी न चला कि
वो तवील इंतिज़ार
कब मार गया पूरा मुझे
और न बाक़ी रह गई थी
कोई उम्मीद कोई इंतिज़ार
फिर देखा जो ख़ुद को तो आया समझ
कि
मैं मैं न रहा
मैं मैं न रहा
#अमित_अब्र