ख़्वाब में रोज़ मेरे वो आ कर गया
इश्क़ मेरा मुझे यूँ सता कर गया
आह उठकर सिमट ही गई जी में, जब
वो कहा कुछ नहीं, मुस्कुरा कर गया
आग आग़ोश में क्या लिये है फिरे
इश्क़ क्यूँ है दिलों को जला कर गया
इश्क़ मुझ ना-तवाँ से बयाँ कब हुआ
यार भी हाल-ए-दिल था छिपा कर गया
इश्क़ शीरीं का ज़िन्दा हुआ यार तब
जान फ़रहाद जब है लुटा कर गया
इश्क़ ग़म है, ख़ुशी है, रह-ए-रेत है
क़ैस राज़-ए-मुहब्बत बता कर गया
जो मुहब्बत हुई मो'तबर फिर तो मैं
आदमी क्या, बुतों से वफ़ा कर गया
नाम-ए-उल्फ़त पे तुम ने बुझाया जिसे
वो चराग़-ए-मुहब्बत जला कर गया
#अमित_अब्र