Wednesday, 25 December 2019
अब उन से याराना क्या होगा
Sunday, 22 December 2019
आज शहर की हम ने अपने जलती देखी तस्वीर
आज शहर की हम ने अपने जलती देखी तस्वीर
नाम-ए-सियासत और मजहब में जल गई उस की तक़दीर
तलवार नहीं है कहीं पे लेकिन शहर सना है लहू में अपने
क्या तक़रीर ख़िलाफ़-ए-हुकूमत ही आज हुई शमशीर
सच आ जाये न सामने सब के सो आज हुकूमत ने
ताले डाले होंटों पर, डाली पैरों में ज़ंजीर
कोशिश ऐसी की कि हो जाती हक़ीक़त दुनिया सपनों की
सियासी आग में लेकिन जल गई मेरे ख़्वाबों की ताबीर
ज़ुल्म-ओ-जब्र-ओ-जफ़ा में गर जो मज़दूर हुआ मा'जूर*
कैसे होगी शहर में कोई नई इमारत फिर ता'मीर
*असहाय
किस को सुनाऊँ अपना ग़म, कैसे बताऊँ जी का हाल
रंजीदा हूँ कितना मैं देख सितमगर की ताज़ीर*
*punishment
आज मुहब्बत दिलबर की हो गई नफ़रत में तब्दील
कैसे सहे अब ज़ुल्म-ए-जुदाई, दिल का मारा ये दिल-गीर*
*ग़मगीन
#अमित_अब्र
22 22 22 22 22 22 221=29
Saturday, 14 December 2019
फ़ज़ा हुई फ़रेबी सो हैं शजर हुए मजबूर
Monday, 2 December 2019
घर क्या है तेरे आने के बाद
घर क्या है तेरे आने के बाद
इक शादाबी वीराने के बाद
माँगा उस रब से फिर हम ने कुछ न
तेरे दिल में आ जाने के बाद
अफ़साने बाक़ी सब हैं बेकार
तेरे मेरे अफ़साने के बाद
होता है रौशन दुनिया में इश्क़
दीवार-ए-नफ़रत ढाने के बाद
ख़्वाहिश इस दिल को किस का हो आज
बाक़ी क्या तुम को पाने के बाद
क्या बच जायेगा फिर मेरे पास
इस घर से तेरे जाने के बाद
रह जाऊँगा बस इक मैं ही साथ
तेरे सारे याराने के बाद
इक मदहोशी फिर छाई महफ़िल पे
उस नाज़ुक के इतराने के बाद
ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-दिल निकला इश्क़
दिल ख़ुश है सौ ग़म खाने के बाद
उल्फ़त को झुकना है ना-मंज़़ूर
परचम अपना लहराने के बाद
नश्शे सारे दुनिया के बेकार
नश्शा-ए-रिज़्क़-ओ-दाने के बाद
ग़मगीं दिल तब ज़्यादा रोया, जब थे
अपने आये बेगाने के बाद
बुलबुल सुन तेरी जाएगी जान
गाने उल्फ़त के गाने के बाद
मिलता है साहिल अक्सर दरिया के
हर तूफ़ाँ से टकराने के बाद
उल्फ़त ख़ातिर फिर लड़ने ज़ुल्मत से
जुग्नू आये दीवाने के बाद
ख़ुश हो बिन मेरे जब तुम कहती हो
आती है मौत इस ताने के बाद
बिन उस के घर मेरा था ग़मगीन
ग़मगीं हम थे काशाने* के बाद
*घर
वापस आया फिर मय-ख़ाने से कौन
इन रिन्दों के बहकाने के बाद
पत्थर किस ने काटा फिर बे-ख़ौफ़
शीरीं के उस दीवाने के बाद
लगती जी में जब उल्फ़त की आग
शम्मा जलती परवाने के बाद
तुर्बत में मेरी, तेरी यादों के
तहखाने थे तहखाने के बाद
जब भी की हम ने काबे की बात
है बुत छूटा बुतखाने के बाद
जाने क्यूँ ग़ाफ़िल है दिलबर मुझ से
उलझन सारी सुलझाने के बाद
यारी मय-ख़ाने से इतनी की, कि
भूले सब कुछ पैमाने के बाद
कैसी है ये कर्ज़े की फ़ेहरिस्त
बच जाता कुछ हर्जाने के बाद
ग़मगीं का ग़म तब होगा महसूस
इक ग़मगीं को घर लाने के बाद
कुछ रिश्ता था उस अंजाने से, जो
दम निकला उस अंजाने के बाद
#अमित_अब्र
222 222 2221
Friday, 15 November 2019
बाद तुम्हारे मेरी कहानी
22 22 22 22
Thursday, 14 November 2019
उल्फ़त में उल्फ़त की ख़ातिर उल्फ़त पे हम ने वारी दुनिया
उल्फ़त में उल्फ़त की ख़ातिर उल्फ़त पे हम ने वारी दुनिया
हासिल उल्फ़त हुई नहीं भूल गई हम को सारी दुनिया
तेरी ख़ातिर दुनिया छोड़ी पर साथ तुम्हारा पा न सके
कूचे में तेरे सो हम ने तन्हा आज गुज़ारी दुनिया
रौशन दिल था, रौशन थी दुनिया भी लेकिन बाद तुम्हारे
आयी दिल में वीरानी और बिखर गई हमारी दुनिया
दीदार-ए-यार हुआ नहीं तो थे चश्म-ए-तर जब लौटे दर से
आज़ार-ए-ग़म-ए-फ़ुर्क़त से हो गई दिल की मेरे भारी दुनिया
अपनों ने छोड़ा तनहा आई जब है मुश्किल जीवन में
गिला करे क्या ग़ैरों की जब अपनों से ही हारी दुनिया
झूट की फ़ितरत, नफ़रत और अदावत दुनिया की तक़दीर हुए
इस दौर-ए-रंजिश में आज हुई रंज-ओ-ग़म की मारी दुनिया
ईमान, मुहब्बत,इमदाद की आदत, क्यूँ हो इन से दूर हुए
ये ही ख़ू* तेरे तो दुनिया को बनाते हैं प्यारी दुनिया
*आदत
बर्बाद किये क्यूँ दुनिया को हो तुम नाम-ए-मजहब में जब कि
नाम-ए-मजहब में ही ख़ुद तुम ने थी कभी सँवारी दुनिया
#अमित_अब्र
Sunday, 10 November 2019
मेरी मुहब्बत
Friday, 8 November 2019
क़ैद-ए-बे-हुनर से कब आज़ाद हुनरमंद हुए
Tuesday, 29 October 2019
किस दुनिया में बसती बस्ती है
Monday, 28 October 2019
याद में उन की जी का मेरे, देखो काम तमाम हुआ
Sunday, 20 October 2019
तुम आये, चैन आया, पूरा जी का अरमान हुआ
Sunday, 29 September 2019
धड़कन है, साँस है, रूह-ओ-जान है मुहब्बत
धड़कन है, साँस है, रूह-ओ-जान है मुहब्बत
पाकीज़गी दिलों की, ईमान है मुहब्बत
है ख़ूब ये फ़साना, किरदार गुल से कोमल
मासूम है मुहब्बत, नादान है मुहब्बत
दुनिया की मुफ़्लिसी से क्या लेना इश्क़ को है
दुनियावी मुफ़्लिसी से अंजान है मुहब्बत
रौशन है फिर मुहब्बत रौशन अगर वफ़ा है
मजबूर गर वफ़ा तो बे-जान है मुहब्बत
अहल-ए-वफ़ा बँधे अब जंजीर-ए-रस्म में हैं
अहल-ए-वफ़ा बिना अब वीरान है मुहब्बत
कितनी भी नफ़रतें हों अहल-ए-जहाँ में लेकिन
ऐ काएनात ! तेरी पहचान है मुहब्बत
दिल में न बे-क़रारी, ग़ाफ़िल हो सो अलग से
अंदाज़ से तुम्हारे हैरान है मुहब्बत
क़तरा-ए-इश्क़ से भी रौशन हुआ है इन्साँ
नेमत ख़ुदा की, दुनिया की शान है मुहब्बत
#अमित_अब्र
Sunday, 22 September 2019
ज़ेहन में तिरी याद के क़ाफ़िले थे
ज़ेहन में तिरी याद के क़ाफ़िले थे
तक़ाज़ा-ए-उल्फ़त में तुझ से मिले थे
नज़र से नज़र कर रही गुफ़्तुगू थी
थी मिज़्गाँ खुली लब हमारे सिले थे
हक़ीक़त की दुनिया तो कांटों भरी थी
मगर ख़्वाब में फूल फिर भी खिले थे
विसाल-ए-सनम थी वजह हिज्र की, सो
किसी से न शिकवे न कोई गिले थे
कभी था मिलन तो कभी थी जुदाई
रह-ए-इश्क़ में याँ यही सिलसिले थे
#अमित_अब्र
Wednesday, 18 September 2019
आग़ाज़ है नया तो अंजाम भी नया हो
आग़ाज़ है नया तो अंजाम भी नया हो
उल्फ़त अगर नई तो पैग़ाम भी नया हो
परवाज़-ए-इश्क़ ख़ातिर शाहीन अब नये हों
हो आस्माँ नया और आयाम भी नया हो
मंज़िल अगर नई है, रस्ता अगर नया है
तो हासिल-ए-सफ़र को फिर गाम भी नया हो
बे-बस को गर बचाना शामिल है फैसले में
तदबीर फिर नई हो, इबराम भी नया हो
तब्दील मौत में की क्यूँ क़ैद-ए-बा-मशक़्कत
बदली गई सज़ा तो इल्ज़ाम भी नया हो
कीमत नई लगाओ कि शान बिक रही है
सामान हो नया तो फिर दाम भी नया हो
आये नये शहर हो, कुछ लो नया शहर से
मयखाना गर नया हो तो जाम भी नया हो
मज़दूर ख़ुश रहा सो बस्ती हुई शहर सी
था काम ये नया सो ईनाम भी नया हो
मैं तो हिमायती याँ कल के रिवाज का था
गर बद नई रिवायत, बदनाम भी नया हो
#अमित_अब्र
Sunday, 1 September 2019
हाल पे बस्ती के शहर कब है परेशान हुआ
हाल पे बस्ती के शहर कब है परेशान हुआ
देख के वीरान यहाँ कौन है वीरान हुआ
था आग़ोश में पानी पर रहने दिया जलने
सहरा पे समंदर याँ कब है मेहरबान हुआ
मुंसिफ़ बदल गये पर सुलझा नहीं मुक़दमा
सच हर बार आग में झूट की है श्मशान हुआ
बे-ख़ौफ़ हवाएँ हैं आज ज़मींदोज़ हुईं
जब्र में तूफ़ान-ए-तहरीक बयाबान हुआ
ये कौन है जो हम को तक़्सीम कर गया है
क्या है जो फ़ासला हमारे दरमियान हुआ
ज़ज्ब किया सूरज मिरा ऊँची इमारतों ने
ज़ुल्मत मेरे घर का साज-ओ-सामान हुआ
मिज़ाज यूँ है बदला इंसानी फ़ितरतों ने
ग़म ही किसी का अब किसी का इत्मीनान हुआ
कर सकते थे जहाँ क़ैद मुट्ठी में रौशनी को
जंग अँधेरे से वहीं आज घमासान हुआ
#अमित_अब्र
Tuesday, 20 August 2019
ग़म की शब हुई थी नाज़िल ये ज़िन्दगी मेरी
Friday, 12 April 2019
हल्के-हल्के से ही बात भारी कही
हल्के-हल्के से ही बात भारी कही
मुख़्तसर ही मगर बात सारी कही
आरज़ू इश्क़ की जब न पूरी हुई
दर्द-ए-दिल ने ग़ज़ल इक मेआरी कही
वक़्त-ए-उल्फ़त हुआ ख़ूब, जब हिज्र से
वस्ल ने इश्क़ की बे-क़रारी कही
ख़्वाब में तुम ही तुम थे सो ताबीर ने
छाई हम पे तुम्हारी ख़ुमारी कही
दिन गया तो गई रात ने रात से
रात ग़मगीन कैसे गुज़ारी, कही
मुफ़्लिसी ने मिटाकर जहाँ से हमें
मुफ़्लिसों से कहानी हमारी कही
हार कर उल्फ़तों से, अदावत ने फिर
दुनिया से इश्क़ की शानदारी कही
#अमित_अब्र