Wednesday, 17 October 2018

दिल आज मिरा मुझ से फ़सादात करे है

दिल आज मिरा मुझ से फ़सादात करे है
उल्फ़त में मिले ग़म पे सवालात करे है

है हिज्र कभी, वस्ल कभी, उस के जहाँ में
क्या क्या न यहाँ इश्क़ करामात करे है

जाना शब-ए-हिज्राँ में बहुत ये कि मुहब्बत
कुछ और नहीं, नज़्र हवालात करे है

बच के रहियो तुम कि भरी बज़्म में अक्सर 
ये इश्क़ पशेमाँ तिरे जज़्बात करे है

इक ज़ख़्म हुआ इस दिल-ए-नादाँ के हवाले
इक शख़्स बहुत हम से मुलाक़ात करे है

मालूम हुई आज ख़ुराफ़ात-ए-मुहब्बत
ये पेश हमें इक ग़म-ए-हालात करे है

थे दुश्मन-ए-जाँ एक ज़माने से, मिले हैं
मय ख़ूब ग़ज़ब आज तिलिस्मात करे है

#अमित_अब्र


221  1221  1221  122

Wednesday, 22 August 2018

ज़ुल्म-ए-दुनिया में मुक़द्दस आशियाने जल गए

ज़ुल्म-ए-दुनिया में मुक़द्दस आशियाने जल गए
आग में नफ़रत की उल्फ़त के फ़साने जल गए

मिट गया नाम-ओ-निशाँ बस्ती का शहरों के लिए  
शौक़-ए-शहराँ में ग़रीबों के ठिकाने जल गए

हम करें क़ाइल तुम्हें कैसे, सफ़र था रेत में
बर्क़-ए-सहरा में सफ़र के सब निशाने जल गए

कहकशाँ कब जंग में थी, इक क़रारी आग थी
राह-ए-आज़ादी में याँ कितने दीवाने जल गए

कुछ नया ता'मीर तो नाम-ए-ख़ुदा में न हुआ
मज़हबी ख़्वाहिश में लेकिन घर पुराने जल गए

वस्ल ने दी ज़ीस्त उल्फ़त की कहानी को मगर
आह-ए-हिज्राँ में मुहब्बत के फ़साने जल गए

हमसफ़र बन के चले क्या दो क़दम तुम साथ में
अंजुमन में आज अपने क्या बेगाने जल गए

जब्र-ए-दुनिया में जले जो घर ग़रीबों के यहाँ 
आह-ए-मुफ़्लिस में ख़ुदा तेरे ज़माने जल गए

#अमित_अब्र


2122  2122  2122  212

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मुक़द्दस=पवित्र
शौक़-ए-शहराँ=hobby of cities
क़ाइल=convince, यक़ीन दिलाना
बर्क़-ए-सहरा=रेगिस्तान की बिजली
कहकशाँ=galaxy सितारों का कारवाँ
ता'मीर=बनाना
वस्ल=मिलन
ज़ीस्त=ज़िंदगी
हिज्राँ=जुदाई
अंजुमन=महफ़िल
मुफ़लिस=ग़रीब

Sunday, 5 August 2018

उस्लूब-ए-ख़ास-ओ-नाज़-ओ-नायाब तुम हुए हो

उस्लूब-ए-ख़ास-ओ-नाज़-ओ-नायाब तुम हुए हो
बे-नूर आसमाँ का महताब तुम हुए हो

ताबीर ही से जिसकी शब खुशनुमा हुई है
बे-हद हसीन-ओ-दिलकश वो ख़्वाब तुम हुए हो 

साया-ए-रंज-ओ-ग़म भी काफ़ूर हो गये हैं
वीरान ज़िन्दगी में शादाब तुम हुए हो

दरिया में डूब कर भी प्यासे ही हम रहे हैं
जो तिश्नगी मिटाये वो आब तुम हुए हो

सुकून-ए-अंजुमन है महफ़िल में तेरा आना
बे-ताब धड़कनों की अब ताब तुम हुए हो

लाला-ओ-गुल खिले हैं आने से याँ तुम्हारे
गुलशन के आसमाँ पर सुर्ख़ाब तुम हुए हो

डूबे गये तुम्हारे दरिया-ए-हुस्न में हम
बे-हद हसीन-ओ-ज़ालिम गिर्दाब तुम हुए हो

#अमित_अब्र

221  2122  221  2122
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उस्लूब-ए-ख़ास=special
ताबीर=interpretation  (of dreams)
शादाब=greenery, हरियाली
तिश्नगी=प्यास
लाला-ओ-गुल=tulip & rose or flowers
सुर्खाब=a colourful bird
गिर्दाब=भँवर

Friday, 25 May 2018

दिये पे वो अपना असर चाहता है

दिये पे वो अपना असर चाहता है
अँधेरा मिरे घर बसर चाहता है

रहे रात ही रात क़ायम ज़मीं पे
सितमगर फ़लक बे-सहर चाहता हैै

ख़िज़ाँ चाहती है गुलों पे हुकूमत
बयाबाँ शजर बे-समर चाहता है

सियासत की साज़िश में दुनिया है उलझी
यहाँ कौन किस की ख़बर चाहता है

फ़सादात दैर-ओ-हरम के शहर में
लहू फिर से शायद शहर चाहता है

उदासी भरा एक चेहरा नही कुछ
मुहब्बत भरी इक नज़र चाहता है

#अमित_अब्र


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