दिल आज मिरा मुझ से फ़सादात करे है
उल्फ़त में मिले ग़म पे सवालात करे है
है हिज्र कभी, वस्ल कभी, उस के जहाँ में
क्या क्या न यहाँ इश्क़ करामात करे है
जाना शब-ए-हिज्राँ में बहुत ये कि मुहब्बत
कुछ और नहीं, नज़्र हवालात करे है
बच के रहियो तुम कि भरी बज़्म में अक्सर
ये इश्क़ पशेमाँ तिरे जज़्बात करे है
इक ज़ख़्म हुआ इस दिल-ए-नादाँ के हवाले
इक शख़्स बहुत हम से मुलाक़ात करे है
मालूम हुई आज ख़ुराफ़ात-ए-मुहब्बत
ये पेश हमें इक ग़म-ए-हालात करे है
थे दुश्मन-ए-जाँ एक ज़माने से, मिले हैं
मय ख़ूब ग़ज़ब आज तिलिस्मात करे है
#अमित_अब्र
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