Wednesday, 22 August 2018

ज़ुल्म-ए-दुनिया में मुक़द्दस आशियाने जल गए

ज़ुल्म-ए-दुनिया में मुक़द्दस आशियाने जल गए
आग में नफ़रत की उल्फ़त के फ़साने जल गए

मिट गया नाम-ओ-निशाँ बस्ती का शहरों के लिए  
शौक़-ए-शहराँ में ग़रीबों के ठिकाने जल गए

हम करें क़ाइल तुम्हें कैसे, सफ़र था रेत में
बर्क़-ए-सहरा में सफ़र के सब निशाने जल गए

कहकशाँ कब जंग में थी, इक क़रारी आग थी
राह-ए-आज़ादी में याँ कितने दीवाने जल गए

कुछ नया ता'मीर तो नाम-ए-ख़ुदा में न हुआ
मज़हबी ख़्वाहिश में लेकिन घर पुराने जल गए

वस्ल ने दी ज़ीस्त उल्फ़त की कहानी को मगर
आह-ए-हिज्राँ में मुहब्बत के फ़साने जल गए

हमसफ़र बन के चले क्या दो क़दम तुम साथ में
अंजुमन में आज अपने क्या बेगाने जल गए

जब्र-ए-दुनिया में जले जो घर ग़रीबों के यहाँ 
आह-ए-मुफ़्लिस में ख़ुदा तेरे ज़माने जल गए

#अमित_अब्र


2122  2122  2122  212

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मुक़द्दस=पवित्र
शौक़-ए-शहराँ=hobby of cities
क़ाइल=convince, यक़ीन दिलाना
बर्क़-ए-सहरा=रेगिस्तान की बिजली
कहकशाँ=galaxy सितारों का कारवाँ
ता'मीर=बनाना
वस्ल=मिलन
ज़ीस्त=ज़िंदगी
हिज्राँ=जुदाई
अंजुमन=महफ़िल
मुफ़लिस=ग़रीब

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