हक़ीक़त रहा या सराबी रहा
भरी बज़्म में वो हिजाबी रहा
फ़लक की तरह चाँदनी याँ रही
यहाँ शख़्स इक माहताबी रहा
निगाह-ए-सनम मयकदे सी हुई
पीया भी नहीं और शराबी रहा
मुकम्मल फ़साना बयाँ कर गया
वो चेहरा यहाँ जो किताबी रहा
चमक हुस्न पे चाँद की सी रही
मिरा इश्क़ भी आफ़ताबी रहा
#अमित_अब्र
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