Sunday, 26 February 2017

हक़ीक़त रहा या सराबी रहा

हक़ीक़त रहा या सराबी रहा
भरी बज़्म में वो हिजाबी रहा

फ़लक की तरह चाँदनी याँ रही
यहाँ शख़्स इक माहताबी रहा

निगाह-ए-सनम मयकदे सी हुई
पीया भी नहीं और शराबी रहा

मुकम्मल फ़साना बयाँ कर गया
वो चेहरा यहाँ जो किताबी रहा

चमक हुस्न पे चाँद की सी रही
मिरा इश्क़ भी आफ़ताबी रहा

#अमित_अब्र


122  122  122  12



ख़ुदा के जहाँ से अदावत न कर

ख़ुदा के जहाँ से अदावत न कर

जफ़ा की मगर तू इबादत न कर

 

शहर को जला कर बुझा कर दिये

ख़िज़ाँ के हवाले रियासत न कर


सफ़र में मिलेगी शब-ए-ग़म यूँ भी 

किसी तीरगी की हिफ़ाज़त न कर


वसीयत अगर है अदावत भरी  

किसी के सिरों ये विरासत न कर


सफ़र इश्क़ का है मुक़द्दस सफ़र 

हक़-ए-आशिक़ी पे सियासत न कर


#अमित_अब्र 








फ़रिश्ता हुए या रग-ए-जाँ हुए


फ़रिश्ता हुए या रग-ए-जाँ हुए
गया कौन जो हम परेशाँ हुए

मुहब्बत न याँ फिर मुकम्मल हुई
किसी और के वो दिल-ओ-जाँ हुए

कहानी हमारी हुई क़ैस सी
मिले जो नहीं तो न हैराँ हुए

सुना जो हमें तो शमा बुझ गई
मुक़द्दस दिये भी पशेमाँ हुए

चमन के खिले फूल मुरझा गए
चमन के न हम जो निगहबाँ हुए

भँवर में रहे हम तुम्हारे बिना
किनारे न हम पे मेहरबाँ हुए

गली में तुम्हारी भटकते रहे
फ़साना मिला बस न तुम याँ हुए

शब-ए-वस्ल तो यार शादाब थी 
फ़िराक़-ए-सनम में बयाबाँ हुए

गई बुतपरस्ती न तुम जो मिले
तिरे इश्क़ में 'अब्र' बेजाँ हुए

#अमित_अब्र 


122  122  122  12

जहाँ से जहाँ की मुरव्वत गई

जहाँ से जहाँ की मुरव्वत गई
फ़ज़ा से यहाँ की, मुहब्बत गई

अना है ज़़ेहन में बसी इस क़दर
कि दिल से हमारे नदामत गई

नशा जो हुआ तो निकाले गए
नये मयकदों से शराफ़त गई

बदल दे कज़ा को परस्तिश मगर
जहाँ से ख़ुदा की इबादत गई

लिखा जो कभी क़ैस ने रेत पे
लिखी फिर न ऐसी इबारत गई

रही मो'तबर अब न सूरत यहाँ
गई संग सीरत नफ़ासत गई

हुई हार फिर झूट के सामने
जुबाँ से हमारे सदाक़त गई

मुहब्बत की कीमत वफ़ा थी कभी 
जहाँ से मगर वो तिजारत गई

शहर के शहर फिर जलाये गये
दिये से हमारी अदावत गई

उठे तो बहुत याँ मदद के लिए
दरों पे मगर बस सियासत गई

बहाया किसी ने लहू फूल का
चमन से गुलों की नज़ाकत गई

#अमित_अब्र


122  122  122  12

Saturday, 25 February 2017

बयाबाँ वो दिल का शहर कर गया

बयाबाँ वो दिल का शहर कर गया
मुझे सूखता इक शजर कर गया

अभी तक रहा था मिरे ख़्वाब में
अब इक दर्द मेरे जिगर कर गया

मिला तो नहीं वो मगर देख कर
जहाँ से मुझे बे-ख़बर कर गया

चला साथ जो काफ़िला याद का
चला भी नहीं और सफ़र कर गया

न टूटी मुहब्बत शब-ओ-रोज़ की  
दिया रात पे यूँ असर कर गया

#अमित_अब्र