जहाँ से जहाँ की मुरव्वत गई
फ़ज़ा से यहाँ की, मुहब्बत गई
अना है ज़़ेहन में बसी इस क़दर
कि दिल से हमारे नदामत गई
नशा जो हुआ तो निकाले गए
नये मयकदों से शराफ़त गई
बदल दे कज़ा को परस्तिश मगर
जहाँ से ख़ुदा की इबादत गई
लिखा जो कभी क़ैस ने रेत पे
लिखी फिर न ऐसी इबारत गई
रही मो'तबर अब न सूरत यहाँ
गई संग सीरत नफ़ासत गई
हुई हार फिर झूट के सामने
जुबाँ से हमारे सदाक़त गई
मुहब्बत की कीमत वफ़ा थी कभी
जहाँ से मगर वो तिजारत गई
शहर के शहर फिर जलाये गये
दिये से हमारी अदावत गई
उठे तो बहुत याँ मदद के लिए
दरों पे मगर बस सियासत गई
बहाया किसी ने लहू फूल का
चमन से गुलों की नज़ाकत गई
#अमित_अब्र
122 122 122 12
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