फ़रिश्ता हुए या रग-ए-जाँ हुए
गया कौन जो हम परेशाँ हुए
मुहब्बत न याँ फिर मुकम्मल हुई
किसी और के वो दिल-ओ-जाँ हुए
कहानी हमारी हुई क़ैस सी
मिले जो नहीं तो न हैराँ हुए
सुना जो हमें तो शमा बुझ गई
मुक़द्दस दिये भी पशेमाँ हुए
चमन के खिले फूल मुरझा गए
चमन के न हम जो निगहबाँ हुए
भँवर में रहे हम तुम्हारे बिना
किनारे न हम पे मेहरबाँ हुए
गली में तुम्हारी भटकते रहे
फ़साना मिला बस न तुम याँ हुए
शब-ए-वस्ल तो यार शादाब थी
फ़िराक़-ए-सनम में बयाबाँ हुए
गई बुतपरस्ती न तुम जो मिले
तिरे इश्क़ में 'अब्र' बेजाँ हुए
#अमित_अब्र
122 122 122 12
No comments:
Post a Comment