Sunday, 26 February 2017

फ़रिश्ता हुए या रग-ए-जाँ हुए


फ़रिश्ता हुए या रग-ए-जाँ हुए
गया कौन जो हम परेशाँ हुए

मुहब्बत न याँ फिर मुकम्मल हुई
किसी और के वो दिल-ओ-जाँ हुए

कहानी हमारी हुई क़ैस सी
मिले जो नहीं तो न हैराँ हुए

सुना जो हमें तो शमा बुझ गई
मुक़द्दस दिये भी पशेमाँ हुए

चमन के खिले फूल मुरझा गए
चमन के न हम जो निगहबाँ हुए

भँवर में रहे हम तुम्हारे बिना
किनारे न हम पे मेहरबाँ हुए

गली में तुम्हारी भटकते रहे
फ़साना मिला बस न तुम याँ हुए

शब-ए-वस्ल तो यार शादाब थी 
फ़िराक़-ए-सनम में बयाबाँ हुए

गई बुतपरस्ती न तुम जो मिले
तिरे इश्क़ में 'अब्र' बेजाँ हुए

#अमित_अब्र 


122  122  122  12

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