ख़ुदा के जहाँ से अदावत न कर
जफ़ा की मगर तू इबादत न कर
शहर को जला कर बुझा कर दिये
ख़िज़ाँ के हवाले रियासत न कर
सफ़र में मिलेगी शब-ए-ग़म यूँ भी
किसी तीरगी की हिफ़ाज़त न कर
वसीयत अगर है अदावत भरी
किसी के सिरों ये विरासत न कर
सफ़र इश्क़ का है मुक़द्दस सफ़र
हक़-ए-आशिक़ी पे सियासत न कर
#अमित_अब्र
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