Tuesday, 20 August 2019

ग़म की शब हुई थी नाज़िल ये ज़िन्दगी मेरी

ग़म की शब हुई थी नाज़िल ये ज़िन्दगी मेरी 
शब के ग़म में अब है शामिल ये ज़िन्दगी मेरी

मैं सब के लिए हूँ सब मेरे लिए हैं लेकिन 
इक मुझ से हुई है ग़ाफ़िल ये ज़िन्दगी मेरी 

सिमटा है समंदर सीने में रंज-ए-मुफ़्लिस का
इक दरिया-ए-ग़म का साहिल ये ज़िन्दगी मेरी

कुछ तो जल गईं ख़ुशियाँ बर्क़-ए-हिज्र में यारों 
बाक़ी इशरतों की क़ातिल ये ज़िन्दगी मेरी 

गर इन्कार-ए-इश्क़-ए-दिलबर है सामने तो फिर 
जीने के कहाँ है क़ाबिल ये ज़िन्दगी मेरी 

दुनिया साथ है पर दुनिया से दूर जी-जाँ है
मानो रंज-ओ-ग़म की हासिल ये ज़िन्दगी मेरी 

जो चुप है चराग़-ए-मुफ़्लिस की मौत पे गर तो  
फिर इस क़त्ल में है शामिल ये ज़िन्दगी मेरी 

ख़्वाबों पे यक़ीं होगा बाक़ी दिल को तेरे, पर
ख़्वाबों की नहीं अब क़ाइल ये ज़िन्दगी मेरी 

फिर क़ुर्बां हुई थी जाँ ये नाम-ए-सदाक़त में 
इतनी भी नहीं थी बातिल ये ज़िन्दगी मेरी 

चुप जो सह रही जब्र अपने ऊपर सितमगर के
मेरे क़त्ल में है शामिल ये ज़िन्दगी मेरी 

इक खटका लगा है इस को कैसे जियेगी ये
है जो शहर-ए-ग़म में दाख़िल ये ज़िन्दगी मेरी

#अमित_अब्र 


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लालाला    ललालाला   लालाला     ललालाला