Tuesday, 17 October 2017

पानी बदल रहा है पत्थर पिघल रहे हैं

पानी बदल रहा है पत्थर पिघल रहे हैं
दीये नही यहाँ अब इन्सान जल रहे हैं

रानाइयां दिलों की अब आग हो चली हैं
बारूद पर हमारे अब ख़्वाब पल रहे हैं

निस्तब्धता भरी है जिस राह मे यहाँ पर
उस राह पर हमारे क्यूँ जिस्म चल रहे हैं

नाराज़ क्यूँ हुए हम इस ख़ूब ज़िन्दगी से
हो मौत की गली क्यूँ अरमाँ निकल रहे हैं

आसान ज़िन्दगी को मुश्किल बना रहे हम
पल पल यहाँ हमारे अब पल बदल रहे हैं

जिस ओर बस मिलेगा साया ए दर्द हम को
उस ओर के लिये क्यूँ हम तुम मचल रहे हैं

अब धुंध मे धँसी कुछ इस तौर ये ज़मीं है
सूरज यहाँ क्षितिज पे बे-वक़्त ढल रहे हैं

फरियाद कर रहे हैं अब तो हमें बताओ
भगवान! क्यूँ नही हम गिरकर सँभल रहे हैं

#अमित_अब्र


221  2122  221  2122

Thursday, 27 April 2017

हुकूमत नहीं हो मज़दूर हो तुम

हुकूमत नहीं हो मज़दूर हो तुम     
हक़ीक़त कहूँ तो मजबूर हो तुम
 
तुम्हारे यहाँ से खाली ही लौटा
कहूँ किस ज़ुबाँ से, मअमूर हो तुम

उदासी बनी है तक़दीर, वर्ना 
बताओ हुए कब, मसरूर हो तुम

मरे हो, मगर क्यूँ मरते नहीं हो 
कहा मौत ने भी, मग़रूर हो तुम

तुम्हें रौशनी में गुमनाम पाया 
मगर ज़ुल्मतों में, मशहूर हो तुम

सताया तुम्हें यूँ इस ज़िन्दगी ने 
कि ख़ुद आप ही से मफ़रूर हो तुम

कहीं ज़ीस्त दी तो वीराँ कहीं पे 
हवाओं बहुत ही मख़मूर हो तुम

उसी को बुझाया रौशन थे जिस से
कहूँ क्या, बड़े ना-मशकूर हो तुम

जले धूप भी याँ दर पे तुम्हारे 
कहो इस क़दर क्या महरूर हो तुम

हँसी है मगर है ये भी हक़ीक़त
ग़म ए ज़िन्दगी से महसूर हो तुम

लहू जब तुम्हारा तुम पर न रोये
समझ लो कि ख़ुद से महजूर हो तुम

शहर को शहर है तुम ने बनाया
शहर को मगर ना-मंज़ूर हो तुम

हमेशा बहर ने जिस को बहाया
उसी रेत सा बे-मक़्दूर हो तुम
 
तुम्हारे लिबासों का ये हुनर है
बरहना हो कर भी मस्तूर हो तुम

करो अब न अपनी तारीफ़ खुद से
कि इक मुख़्तसर सा मज़कूर हो तुम

जो ख़ुद्दारी तुम में बाक़ी नहीं तो
नज़र में हमारी मग़्फ़ूर हो तुम

#अमित_अब्र

______________________________________
मअमूर=आबाद
मसरूर=प्रसन्न
मग़रूर=घमण्डी
ज़ुल्मत=अंधेरा
मफ़रूर=भागा हुआ
मख़मूर=नशे में चूर
ना-मशकूर=thankless 
महरूर=गर्म मिज़ाज का 
महसूर=surrounded  
महजूर=cut off
बे-मक़्दूर=शक्तिहीन
बरहना=nude
मस्तूर=covered
मुख़्तसर=short
मज़कूर=discussion
मग़्फ़ूर=dead 

मुतक़ारिब मुसम्मन अस्लम रूप -2
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ैलुन फ़ऊलुन
122      122      22    122




Sunday, 26 February 2017

हक़ीक़त रहा या सराबी रहा

हक़ीक़त रहा या सराबी रहा
भरी बज़्म में वो हिजाबी रहा

फ़लक की तरह चाँदनी याँ रही
यहाँ शख़्स इक माहताबी रहा

निगाह-ए-सनम मयकदे सी हुई
पीया भी नहीं और शराबी रहा

मुकम्मल फ़साना बयाँ कर गया
वो चेहरा यहाँ जो किताबी रहा

चमक हुस्न पे चाँद की सी रही
मिरा इश्क़ भी आफ़ताबी रहा

#अमित_अब्र


122  122  122  12



ख़ुदा के जहाँ से अदावत न कर

ख़ुदा के जहाँ से अदावत न कर

जफ़ा की मगर तू इबादत न कर

 

शहर को जला कर बुझा कर दिये

ख़िज़ाँ के हवाले रियासत न कर


सफ़र में मिलेगी शब-ए-ग़म यूँ भी 

किसी तीरगी की हिफ़ाज़त न कर


वसीयत अगर है अदावत भरी  

किसी के सिरों ये विरासत न कर


सफ़र इश्क़ का है मुक़द्दस सफ़र 

हक़-ए-आशिक़ी पे सियासत न कर


#अमित_अब्र 








फ़रिश्ता हुए या रग-ए-जाँ हुए


फ़रिश्ता हुए या रग-ए-जाँ हुए
गया कौन जो हम परेशाँ हुए

मुहब्बत न याँ फिर मुकम्मल हुई
किसी और के वो दिल-ओ-जाँ हुए

कहानी हमारी हुई क़ैस सी
मिले जो नहीं तो न हैराँ हुए

सुना जो हमें तो शमा बुझ गई
मुक़द्दस दिये भी पशेमाँ हुए

चमन के खिले फूल मुरझा गए
चमन के न हम जो निगहबाँ हुए

भँवर में रहे हम तुम्हारे बिना
किनारे न हम पे मेहरबाँ हुए

गली में तुम्हारी भटकते रहे
फ़साना मिला बस न तुम याँ हुए

शब-ए-वस्ल तो यार शादाब थी 
फ़िराक़-ए-सनम में बयाबाँ हुए

गई बुतपरस्ती न तुम जो मिले
तिरे इश्क़ में 'अब्र' बेजाँ हुए

#अमित_अब्र 


122  122  122  12

जहाँ से जहाँ की मुरव्वत गई

जहाँ से जहाँ की मुरव्वत गई
फ़ज़ा से यहाँ की, मुहब्बत गई

अना है ज़़ेहन में बसी इस क़दर
कि दिल से हमारे नदामत गई

नशा जो हुआ तो निकाले गए
नये मयकदों से शराफ़त गई

बदल दे कज़ा को परस्तिश मगर
जहाँ से ख़ुदा की इबादत गई

लिखा जो कभी क़ैस ने रेत पे
लिखी फिर न ऐसी इबारत गई

रही मो'तबर अब न सूरत यहाँ
गई संग सीरत नफ़ासत गई

हुई हार फिर झूट के सामने
जुबाँ से हमारे सदाक़त गई

मुहब्बत की कीमत वफ़ा थी कभी 
जहाँ से मगर वो तिजारत गई

शहर के शहर फिर जलाये गये
दिये से हमारी अदावत गई

उठे तो बहुत याँ मदद के लिए
दरों पे मगर बस सियासत गई

बहाया किसी ने लहू फूल का
चमन से गुलों की नज़ाकत गई

#अमित_अब्र


122  122  122  12

Saturday, 25 February 2017

बयाबाँ वो दिल का शहर कर गया

बयाबाँ वो दिल का शहर कर गया
मुझे सूखता इक शजर कर गया

अभी तक रहा था मिरे ख़्वाब में
अब इक दर्द मेरे जिगर कर गया

मिला तो नहीं वो मगर देख कर
जहाँ से मुझे बे-ख़बर कर गया

चला साथ जो काफ़िला याद का
चला भी नहीं और सफ़र कर गया

न टूटी मुहब्बत शब-ओ-रोज़ की  
दिया रात पे यूँ असर कर गया

#अमित_अब्र