हुकूमत नहीं हो मज़दूर हो तुम
हक़ीक़त कहूँ तो मजबूर हो तुम
तुम्हारे यहाँ से खाली ही लौटा
कहूँ किस ज़ुबाँ से, मअमूर हो तुम
उदासी बनी है तक़दीर, वर्ना
बताओ हुए कब, मसरूर हो तुम
मरे हो, मगर क्यूँ मरते नहीं हो
कहा मौत ने भी, मग़रूर हो तुम
तुम्हें रौशनी में गुमनाम पाया
मगर ज़ुल्मतों में, मशहूर हो तुम
सताया तुम्हें यूँ इस ज़िन्दगी ने
कि ख़ुद आप ही से मफ़रूर हो तुम
कहीं ज़ीस्त दी तो वीराँ कहीं पे
हवाओं बहुत ही मख़मूर हो तुम
उसी को बुझाया रौशन थे जिस से
कहूँ क्या, बड़े ना-मशकूर हो तुम
जले धूप भी याँ दर पे तुम्हारे
कहो इस क़दर क्या महरूर हो तुम
हँसी है मगर है ये भी हक़ीक़त
ग़म ए ज़िन्दगी से महसूर हो तुम
लहू जब तुम्हारा तुम पर न रोये
समझ लो कि ख़ुद से महजूर हो तुम
शहर को शहर है तुम ने बनाया
शहर को मगर ना-मंज़ूर हो तुम
हमेशा बहर ने जिस को बहाया
उसी रेत सा बे-मक़्दूर हो तुम
तुम्हारे लिबासों का ये हुनर है
बरहना हो कर भी मस्तूर हो तुम
करो अब न अपनी तारीफ़ खुद से
कि इक मुख़्तसर सा मज़कूर हो तुम
जो ख़ुद्दारी तुम में बाक़ी नहीं तो
नज़र में हमारी मग़्फ़ूर हो तुम
#अमित_अब्र
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मअमूर=आबाद
मसरूर=प्रसन्न
मग़रूर=घमण्डी
ज़ुल्मत=अंधेरा
मफ़रूर=भागा हुआ
मख़मूर=नशे में चूर
ना-मशकूर=thankless
महरूर=गर्म मिज़ाज का
महसूर=surrounded
महजूर=cut off
बे-मक़्दूर=शक्तिहीन
बरहना=nude
मस्तूर=covered
मुख़्तसर=short
मज़कूर=discussion
मग़्फ़ूर=dead
मुतक़ारिब मुसम्मन अस्लम रूप -2
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