जो तुम हो यहाँ तो यहाँ ज़िन्दगी है
तुम्हारे बिना फिर कहाँ ज़िन्दगी है
ब-दौलत तुम्हारे थी जीने की हिम्मत
तुम्हारे बिना ना-तवाँ ज़िन्दगी है
न पूछो मिरा हाल-ए-दिल बा'द उन के
ग़म-ए-हिज्र करती बयाँ ज़िन्दगी है
सुबह शाम दिन दोपहर इक ख़मोशी
हुई यार बिन बे-ज़बाँ ज़िन्दगी है
मुनाफ़े में थी ज़िन्दगी साथ तेरे
नहीं साथ तू तो ज़ियाँ ज़िन्दगी है
हुआ हासिल-ए-इश्क़ मुझ को कहूँ क्या
फ़क़त अब ग़मों में निहाँ ज़िन्दगी है
जिगर आप ख़ंडर हुआ बा'द तेरे
वीरानी भरा इक मकाँ ज़िन्दगी है
मुहब्बत अदावत बग़ावत अदालत
बस इन के रही दरमियाँ ज़िन्दगी है
फ़साने अलम के तो किरदार ग़मगीं
अज़ाबों की इक दास्ताँ ज़िन्दगी है
सफ़र एक है धूल का धूल में ये
ग़ुबारों का इक कारवाँ ज़िन्दगी है
गुज़रता हूँ यादों के सहरा से जब तो
बिना आग होती धुआँ ज़िन्दगी है
#अमित_अब्र