Monday, 27 July 2020

जो तुम हो यहाँ तो यहाँ ज़िन्दगी है

जो तुम हो यहाँ तो यहाँ ज़िन्दगी है
तुम्हारे बिना फिर कहाँ ज़िन्दगी है

ब-दौलत तुम्हारे थी जीने की हिम्मत
तुम्हारे बिना ना-तवाँ ज़िन्दगी है

न पूछो मिरा हाल-ए-दिल बा'द उन के
ग़म-ए-हिज्र करती बयाँ ज़िन्दगी है

सुबह शाम दिन दोपहर इक ख़मोशी
हुई यार बिन बे-ज़बाँ ज़िन्दगी है

मुनाफ़े में थी ज़िन्दगी साथ तेरे
नहीं साथ तू तो ज़ियाँ ज़िन्दगी है

हुआ हासिल-ए-इश्क़ मुझ को कहूँ क्या
फ़क़त अब ग़मों में निहाँ ज़िन्दगी है

जिगर आप ख़ंडर हुआ बा'द तेरे
वीरानी भरा इक मकाँ ज़िन्दगी है

मुहब्बत अदावत बग़ावत अदालत
बस इन के रही दरमियाँ ज़िन्दगी है

फ़साने अलम के तो किरदार ग़मगीं
अज़ाबों की इक दास्ताँ ज़िन्दगी है

सफ़र एक है धूल का धूल में ये
ग़ुबारों का इक कारवाँ ज़िन्दगी है

गुज़रता हूँ यादों के सहरा से जब तो
बिना आग होती धुआँ ज़िन्दगी है

#अमित_अब्र

122  122  122  122

Saturday, 11 July 2020

हो मुक़ाबिल की मुहब्बत हो हक़ीक़त या कि ख़्वाबी

हो मुक़ाबिल की मुहब्बत हो हक़ीक़त या कि ख़्वाबी
हुस्न गर हो चाँद सा तो इश्क़ भी हो आफ़ताबी

फ़र्क रंगत में न कर तू तो ख़ुदा भी साथ होगा
रात से गर प्यार है तो यार होगा माहताबी 

अहल-ए-दुनिया की नज़र में एक मयख़ाना हुआ वो
नैन उस के हैं बनाए आज दुनिया को शराबी

तिश्नगी तेरी करेगी फ़ैसला इस बात का अब
आब हो जाएगा सहरा या रहेगा वो सराबी

दौर-ए-हाज़िर की तबाही का सबब है बद-गुमानी
यार ने तोड़ा भरोसा आई रिश्ते में ख़राबी

#अमित_अब्र

Saturday, 4 July 2020

मिसाल-ए-जमाल इक यहाँ रह रहा है

मिसाल-ए-जमाल इक यहाँ रह रहा है
मकाँ ज़ब्त का अब मिरा ढह रहा है

लबों से टपकते हैं अशआ'र उस के
हँसे भी तो मानो ग़ज़ल कह रहा है

रवानी अदाओं में लहरों के जैसी
चले वो तो मानो बहर बह रहा है

हसीं यार की हर अदा में उलझ कर
गहे दिल गहे जाँ जिगर गह रहा है

हुए क़ातिलाना जो अंदाज़ उस के  
सितम जाने कितने ये दिल सह रहा है

#अमित_अब्र 

रौशन हुआ फ़लक तो महकी हुई ज़मीं है

रौशन हुआ फ़लक तो महकी हुई ज़मीं है
मज़दूर ही के दम से दुनिया हुई हसीं है 

तब्दील कर रहा जो ज़ुल्मत को रौशनी में 
क़िस्मत उसी की देखो रौशन हुई नहीं है

हँसते मकान सारे मज़दूर की बदौलत 
मज़दूर की बदौलत मसरूर हर मकीं है

जलते हैं घर में चूल्हे रोटी तभी है पकती
जलती है जब कहीं पे मज़दूर की जबीं है

हर हाल हाल अपना रखता निहाँ वो सब से
किस बात की खुशी है किस बात की ग़मीं है

वादा किया अगर तो पूरा भी वो करेगा
मेहनत-कशी पे उस की पूरा मुझे यक़ीं है 

एहसास-ए-कमतरी क्यूँ मायूस को कराते
बँध कर न एक दर से कमियाँ सदा रहीं हैं

मरती है ख़ूबसूरत पे याँ तमाम दुनिया
जो है न ख़ूबसूरत वो किस का दिल-नशीं है

मज़दूर भी बनेगा इक दिन यहाँ पे मालिक
ईमान-ओ-सब्र का फल मिलता सदा यहीं है

सुन दास्तान उस की रोता जिगर है मेरा
परिवार है कहीं तो मज़दूर ख़ुद कहीं है

मज़दूर चलते चलते आ कर रुका जहाँ पे
तक़दीर-ए-मुल्क भी फिर आ कर रुकी वहीं है

#अमित_अब्र