Monday, 19 December 2022

जब से मिला हूँ उस से मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

जब से मिला हूँ उस से मैं इश्क़ लिख रहा हूँ
भूले न वो भुलाये मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

इक दास्तान-ए-उल्फ़त मुझ में तुम्हें मिलेगी
अपने किताब-ए-दिल पे मैं इश्क़ लिख रहा हूँ 

फ़रहाद-ओ-शीरीं राँझा-ओ-हीर क़ैस-ओ-लैला 
क़िस्से इन्ही के पढ़ के मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

लिखने की बात क्या अब चर्चा तलक है मुश्किल
दिल जानता है कैसे मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

आसान कब रहा है उल्फ़त बयान करना
तौफ़ीक़ ऐ ख़ुदा दे मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

-अमित सिंह 
27-11-2021

Thursday, 24 November 2022

इश्क़ और क्या है क़िस्सा दिल के ख़याल का है

इश्क़ और क्या है क़िस्सा दिल के ख़याल का है 
दिल और कुछ नहीं है इक घर वबाल का है

मुद्दत से कह रही है हर दास्तान-ए-उल्फ़त
कब फ़िक्र-ए-हिज्र थी मुद्दा तो विसाल का है

पहरे बहुत थे फिर भी मिल कर के उस से आया
यारों में आज चर्चा मेरी मजाल का है 

ये ज़िन्दगी कि जैसे हो एक मौज-ए-दरिया
किस्सा उरूज का कुछ किस्सा ज़वाल का है

रुस्वा बहुत हुआ दिल कर के फ़क़त मुहब्बत
मुझ को मलाल यारो दिल के मलाल का है 

मदहोश हो रहा है यूँ ही नहीं ज़माना
सारा ख़ुमार जानाँ तेरे जमाल का है

चेहरे जुदा-जुदा हैं पर हैं हसीन सारे
अल्लाह कारी-गर तू क्या ही कमाल का है 

तेरे नहीं मुक़ाबिल दुनिया में और कोई 
तू ही जवाब अपने हर इक सवाल का है

#अमित_सिंह
13-10-2022

कूचा-ए-दिल में रूह बेताब नज़र आती है

कूचा-ए-दिल में रूह बेताब नज़र आती है 
उस के बग़ैर दुनिया सराब नज़र आती है 

रुख़्सार हर्फ़-ए-उल्फ़त हैं होंट हर्फ़-ए-उल्फ़त
निगाह-ए-यार उल्फ़त की किताब नज़र आती है 

आसाँ हुआ सफ़र है हासिल हुई है मंज़िल 
साथ उस के ज़िन्दगी कामयाब नज़र आती है 

होती है ज़िन्दगी हक़ीक़त से रू-ब-रू जब 
तो मुहब्बत एक अधूरा ख़्वाब नज़र आती है

यूँ तो हैं लाखों ग़म जहाँ में लेकिन आज भी  
मुफ़्लिसी सब से बड़ा अज़ाब नज़र आती है

#अमित_सिंह 
12-10-2022

Thursday, 17 November 2022

बताया भी छिपाया भी हँसाया भी रुलाया भी

बताया भी छिपाया भी हँसाया भी रुलाया भी
सितम ढा कर मिरे दिल पे सितम-गर मुस्कुराया भी

कहानी में मुहब्बत की वो मेरे साथ आया भी  
कहानी में मुहब्बत फिर वो मेरी आज़माया भी

समंदर ज़िन्दगी का ज़िन्दगी में फ़ितरती निकला  
भँवर में ज़िन्दगी के वो डुबाया भी बचाया भी

ज़माना भी अजब किरदार में था ज़ीस्त में मेरी 
गले मुझ को लगाया भी लगाकर फिर भुलाया भी

तुम्हारी याद में ही शाम गुज़री और सहर आई
तुम्हारी याद में दीया जलाया भी बुझाया भी

ज़माने से रहे हम मुंतज़िर जिस शख़्स के यारों
वो बरसों बाद आया भी हमें आना जताया भी

अदावत भी रही उस से मुहब्बत भी रही उस से  
न जाने क्यूँ रहा वो शख़्स अपना भी पराया भी

शहर के साथ या-रब जल रही है लाश यारों की
शहर को अपने हम ने ही बसाया भी मिटाया भी

अदावत ने किया बर्बाद था लेकिन मुहब्बत ने 
ज़माने को बचाया भी बनाया भी सजाया भी

-अमित सिंह 
08-08-2020

Saturday, 29 October 2022

कैसे उसे बताएँ कैसी है बे-क़रारी

कैसे उसे बताएँ कैसी है बे-क़रारी

आलम है हिज्र का तो बाक़ी है इंतिज़ारी


करता नहीं यक़ीं वो पर बात सच यही है
उस के बग़ैर जी में उठती है हूक भारी


इक ज़ब्त-ए-इश्क़ मेरी दुनिया बदल रहा है
क्या जानिए कहाँ अब ले जाये ये ख़ुमारी


उस के जुनून का है अब इख़्तियार मुझ पर
चलती नहीं है मुझ पर ख़ुद मेरी इख़्तियारी


है क़ैद में मुहब्बत किरदार ग़म-ज़दा हैं
रूदाद-ए-इश्क़ में है अब दर्द की शुमारी


फ़रियाद में मुझे वो जब रब से माँगता है
फ़िरदौस में उभरती है आह एक प्यारी


अंजाम-ए-इश्क़ में रख दो कहकशाँ हमारे
आग़ाज़-ए-इश्क़ हम ने काँटों में है गुज़ारी


हर इश्क़ हो मुकम्मल हर हाल में ज़मीं पे
कर ऐ ख़ुदा फ़लक से फ़रमान-ए-इश्क़ जारी


रुख़्सत हुए अगर तुम बेज़ार मेरे दर से 
बेज़ारी में फिर कटेगी मेरी ये उम्र सारी


यूँ ही नहीं तुम्हारा दर आज हम से छूटा
ऐ इश्क़ राह तेरी हम ने बहुत निहारी


हैं दर्द में मरासिम तन्हा हुआ जहाँ है
अपनों के वार से ही ये काएनात हारी


दार-ओ-मदार-ए-दुनिया सिर आन अब पड़ी है
कैसे करूँ मुहब्बत मैं तुझ पे जाँ-निसारी


-अमित सिंह

कारवान-ए-ख़याल है ज़िन्दगी

कारवान-ए-ख़याल है ज़िन्दगी
इक उरूज-ओ-ज़वाल है ज़िन्दगी 

दम-ब-दम कुछ न कुछ है ये पूछती 
आदतन इक सवाल है ज़िन्दगी 

रंज भी रंज की शिफ़ा भी है ज़ीस्त 
लाज़िमन बा-कमाल है ज़िन्दगी

आशिकों की नज़र बयाँ है किए 
जान-ए-जाँ का जमाल है ज़िन्दगी

हाल-ए-दिल क्या कहें कि अब इश्क़ में
यार बिन इक मलाल है ज़िन्दगी 

हार कर बार बार है जीतती 
हौसलों की मिसाल है ज़िन्दगी

#अमित_अब्र

मेरे लिए हुई तू मुश्किल सवाल क्यूँ है

मेरे लिए हुई तू मुश्किल सवाल क्यूँ है 
ऐ ज़िन्दगी तुझे अब जीना मुहाल क्यूँ है 

हासिल वही हुआ है क़िस्मत में जो तिरे था 
तक़दीर में नहीं जो उस का मलाल क्यूँ है 

है आजिज़ी जहाँ से या बात और है कुछ 
ऐ ज़िन्दगी तिरा यूँ बेहाल हाल क्यूँ है
  
है मौत आख़िरी में इस ज़िन्दगी का हासिल 
फिर और कुछ तुझे पाने का ख़याल क्यूँ है 

बे-नूर क्यूँ हुई है ऐ ज़िन्दगी बता भी
चेहरे पे आज तेरे आया ज़वाल क्यूँ है 

होना है क़त्ल फिर भी आता हूँ ओर तेरी
ऐ ज़ीस्त क़ातिलाना तेरा जमाल क्यूँ है 

क्यूँ दफ़्न हो रही है याँ ज़िन्दगी क़फ़स में 
इक क़ैद ज़ीस्त की मुश्किल देख-भाल क्यूँ है 

रूदाद-ए-इश्क़ पढ़ कर उठता ख़याल दिल में 
आसान हिज्र गर तो मुश्किल विसाल क्यूँ है

शमशीर नफ़रतों की ख़ामोश थी अगर तो
दीवार-ओ-दर मुहब्बत का आज लाल क्यूँ है 

हर दम यहाँ रहा जो ख़िदमत में सब की हाज़िर 
मुफ़्लिस वो आज सब पे भारी वबाल क्यूँ है 

लड़ना ही है तो लड़ तू मुफ़्लिस के हक़ की ख़ातिर 
पत्थर-दिलों की ख़ातिर तुझ में उबाल क्यूँ है 

गुमनाम फिर रही है दुनिया में क्यूँ सदाक़त 
मशहूर क्यूँ हैं झूटे बातिल मिसाल क्यूँ है  

आईन गर सही तो मुंसिफ़ अगर सही तो
क्यूँ बेगुनह क़फ़स में मुजरिम बहाल क्यूँ है 

#अमित_अब्र

सौदा दिल का बुरा नहीं होता

सौदा दिल का बुरा नहीं होता

इश्क़ घाटा नफ़ा नहीं होता


इश्क़ ज़्यादा ज़रा नहीं होता 

इश्क़ होता है या नहीं होता 


बात कुछ तो है इश्क़ में वर्ना 

दिल किसी पे फ़िदा नहीं होता


वस्ल या हिज्र या ख़ुशी या ग़म

इश्क़ बे-माजरा नहीं होता


होता हर इश्क़ गर मुकम्मल तो

क़ैस यूँ ग़म-ज़दा नहीं होता


इश्क़ में जो मिला अगर तो फिर 

दर्द दिल से जुदा नहीं होता


हाल-ए-दिल होता है बुरा यारो

दिल किसी का बुरा नहीं होता


वो तो नाराज़ है बहुत लेकिन   

क्यूँ मैं उस से ख़फ़ा नहीं होता


मिलते वो हम से रोज़ हैं लेकिन 

मिलने सा वाक़िआ' नहीं होता

 

सब से मिलता है सब का हो कर वो

जाने क्यूँ बस मिरा नहीं होता


तोहमतें हुस्न पर हमेशा क्यूँ

इश्क़ क्या बे-वफ़ा नहीं होता


फ़र्क हम ने किया बहुत लेकिन 

इश्क़ रब से जुदा नहीं होता


-अमित सिंह 

05-07-2018

याद में उस की अजब सी बे-क़रारी दिल में है

याद में उस की अजब सी बे-क़रारी दिल में है
वो नहीं है पास पर उस की ख़ुमारी दिल में है 

भूलता हूँ ये जहाँ जब यार आता है नज़र 
दूर होता है तो उठती हूक भारी दिल में है 

बे-वफ़ा है वो कि है मजबूर सब के सामने 
है हक़ीक़त क्या इसी की जंग जारी दिल में है

क्या बताएँ इश्क़ की तासीर का आलम तुम्हें 
अक्स ज़ेहन में तो उस की यादगारी दिल में है

इश्क़ पे बढ़ता गया है ज़ुल्म-ए-दुनिया दिन-ब-दिन
देख उल्फ़त पे सितम इक आह-ओ-ज़ारी दिल में है

जाँ-ब-लब थे हम मगर मिलने न आया था सनम
इसलिए है चश्म-ए-नम तो ज़ख़्म-ए-कारी दिल में है

आज भी कल की तरह मजबूर उल्फ़त है यहाँ 
इश्क़ की इस बेबसी पे सोगवारी दिल में है

शान-ओ-शौकत ने किया मग़रूर है पर आज भी
इश्क़ की ख़ातिर सनम इक ख़ाकसारी दिल में है

नाम आये गर कहानी में तो हमदम तू न डर
आज भी महफ़ूज़ तेरी राज़दारी दिल में है

बाद तुम को माँगने के कुछ न माँगू रब से मैं
आरज़ू भी जुस्तुजू भी बस तुम्हारी दिल में है

तू न आयेगी मगर चाहत पे अपनी है यक़ीं 
ऐ मुहब्बत अब भी तेरी इंतिज़ारी दिल में है

#अमित_अब्र 

करने को शाद उस को मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

करने को शाद उस को मैं इश्क़ लिख रहा हूँ
है सामने वही सो मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

चेहरा लगे है उस का जैसे किताब-ए-उल्फ़त
जब से पढ़ा है उस को मैं इश्क़ लिख रहा हूँ 

मसरूफ़ हूँ बहुत मैं मिलने के बाद उस से
मुझ से निजात पाओ मैं इश्क़ लिख रहा हूँ 

उस की हर इक अदा है मज़मून-ए-इश्क़ यारो
उस की हर इक अदा को मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

मालूम है पढ़ेगा मुझ को नहीं वो फिर भी
सब भूल कर के यारो मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

कैसे लिखूँ मुहब्बत आता नहीं समझ में
उस से मुझे मिलाओ मैं इश्क़ लिख रहा हूँ

जल्वा-ए-हुस्न-ए-जानाँ मानो बयान-ए-उल्फ़त
देखा है जब से उन को मैं इश्क़ लिख रहा हूँ 

-अमित सिंह 
27-11-2021

हँसाना मुहब्बत रुलाना मुहब्बत

हँसाना मुहब्बत रुलाना मुहब्बत 
रुला कर उसे फिर हँसाना मुहब्बत

परेशान करना बिना बात उस को
परेशान कर फिर मनाना मुहब्बत
 
दिखाना कि नाराज़ उस से हूँ लेकिन
उसे देख कर मुस्कुराना मुहब्बत

उसे जीत जाता हूँ ख़ुद हार कर के 
कि है हार ही जीत जाना मुहब्बत 

ख़फ़ा तो हूँ पूरे ज़माने से लेकिन 
उसी एक पे हक़ जताना मुहब्बत

#अमित_अब्र
13-05-2022

ख़ुश-नसीबी भूल कर भी उस के घर आती नहीं

ख़ुश-नसीबी भूल कर भी उस के घर आती नहीं
घर से मुफ़्लिस के कभी अच्छी ख़बर आती नहीं

आसमाँ से बाँट कर आती ज़मीं पे क्या कि जो
रौशनी ये एक जैसी सब के दर आती नहीं  

क्या कभी तुम ने सुनी मुफ़्लिस के मरने की ख़बर
मौत होती है मगर हम तक ख़बर आती नहीं

बाद हर शब इक सहर आती शहर में रोज़ है 
बस्तियों में क्यूँ वही लेकिन सहर आती नहीं 

ले रही है जाँ ग़रीबों की ग़रीबी दिन-ब-दिन
मुफ़्लिसी फिर भी हमें क़ातिल नज़र आती नहीं 

क्या बदल ली वक़्त ने करवट बला की ओर है
ख़ुश-नसीबी भूलकर भी जो इधर आती नहीं 

आदमी सा हो चला क्या आज तू भी ऐ ख़ुदा
आज क्यूँ मजबूर तक तेरी मेहर आती नहीं

#अमित_अब्र 

ख़ूबसूरत ख़ुमार है यारों

ख़ूबसूरत ख़ुमार है यारों
इश्क़ दिल की पुकार है यारों 

इश्क़ में मुब्तला जवाँ दिल पे 
कब रहा इख़्तियार है यारों

और कुछ भी नहीं है इश्क़ फ़क़त
अपना ही इन्तिज़ार है यारों

हिज्र चुभता है दिल में काँटे सा  
यार बिन ज़ीस्त ख़ार है यारों

करता तो बेक़रार है लेकिन
इश्क़ ही से क़रार है यारों

#अमित_अब्र 
30-09-2022

वजूद-ए-मुहब्बत सवालों में है


वजूद-ए-मुहब्बत सवालों में है
नहीं गर तू मेरे ख़यालों में है


कि तू जो है शामिल हर इक ख़्वाब में 
हर इक रात मेरी उजालों में है


लिखा है दिलों पे मुहब्बत ने जो
कहाँ वो कहानी रिसालों में है


मुहब्बत की ख़ातिर है जो इश्क़ में
कहाँ बात वो हुस्न वालों में है


है मदहोश जिस में मुहब्बत भी अब
वही जाम याँ आज प्यालों में है


किसी का फ़साना अधूरा रहा 
किसी की कहानी हवालों में है


नहीं इश्क़ में आबलों से तू डर
मुहब्बत निहाँ आज छालों में है


शब-ए-वस्ल की उम्र पल भर की थी
शब-ए-हिज्र की उम्र सालों में है


हवा से लड़ा इक दिया उम्र भर 
मुहब्बत अब उस की मिसालों में है


#अमित_अब्र

श्री कृष्ण एक दिन मन अर्जुन का भाँप कर के

अस्सी के दशक की बात है जब पिता जी एक गीत गा कर सुनाया करते थे जिसका मज़मून था कि जब अर्जुन को वहम हुआ कि वही भगवान श्रीकृष्ण के सब से बड़े भक्त हैं तो भगवान उन का ये घमण्ड तोड़ने के लिये उन्हें अपने एक भक्त के यहाँ ले गये जिस ने दान में भगवान के शेर के भोजन के लिए अपने बेटे की क़ुर्बानी दे दी। यह देख अर्जुन का वहम दूर हुआ। 
गीत आधा अधूरा याद था तो उसे पूरा किया और एक बहर में रख मसनवी के अन्दाज़ में कोशिश की है।
लिखा किसने है आप पढेंगे तो थोड़ा आश्चर्य होगा। नाम आख़िरी शेर में बतौर तख़ल्लुस है। 


श्री कृष्ण एक दिन मन अर्जुन का भाँप कर के
दिखलाने भक्ति वो आये भक्त ही के दर पे 

भगवन् का भक्त था जो था एक वीर राजा 
उस मोरध्वज का क़िस्सा आकाश में विराजा

हम ने सुना कि राजा तू दानी इक बड़ा है 
ये है वजह जो दर पर आना तिरे पड़ा है
तू दे वचन जो स्वागत स्वीकार गर तुझे हो 
जायेंगे हम चले जो इन्कार गर तुझे हो 

नृप दे वचन ये बोले जाना यहाँ से क्यूँ कर
अच्छा नहीं कि साधू जाये उदास हो कर 

सुन के वचन मदन जी बोले हैं मुस्कुरा के
तुम सामने सो लाओ लड़के को अब बुला के

दोनों ही प्राणी खींचो आरे को सर पे धर के
हम जायेंगे यहाँ से अपनी क्षुधा को भर के

है शर्त ये भी आँसू आँखों से गिर न जाये
तुम दोनों मुस्कुराओ लड़का भी मुस्कुराये

ये हाल सुन के राजा फौरन महल में आये
सब हाल अपनी रानी लड़के से कह सुनाये

बोला पिता से लड़का हैरत की बात क्या है
मर जायेगा ज़माना मेरी बिसात क्या है

धनभाग मांस मेरा भगवन् का शेर खाये
यूँ नाम आप का भी दुनिया में फ़ैल जाये 

माता पिता बगल में सुत बीच में खड़ा था
इन तीनों मूर्तियों पे ये इम्तिहाँ कड़ा था

आरे को सर पे धर जब माँ बाप खींचते थे
धरती ये काँपती थी दिग्गज भी चीख़ते थे 

सन्नाटे में पवन थी पर्वत बिखर रहा था
औलाद को दो टुकड़ा जब बाप कर रहा था

जिस दम मुहब्बतों का सागर उछल पड़ा है
आँखों से मां के आँसू फौरन निकल पड़ा है

आँसू को देख गिरते बोले पिता से मोहन 
राजा नहीं करेगा अब शेर इस का भोजन

भगवन् से बोले राजा ये बात यूँ न अब है
सच पूछिये तो आँसू गिरने का ये सबब है

ममता जो माँ के मन में थोड़ी उमड़ पड़ी है
सो बाईं आँख ही इस कारण घुमड़ पड़ी है

क्या भोग दाहिने का ही शेर अब करेगा
ये बाम अंग घर में मेरे पड़ा सड़ेगा

भगवान बोले राजन भोजन कहाँ है लाओ
भोजन के साथ रानी लड़के को भी बुलाओ

राजा कहे कि भगवन् दूजा नहीं है प्यारा
औलाद इक वही था जिस पे चला है आरा

भगवन् कहे कि तू ने अच्छा किया बताकर
हम भी रखेंगे अपने इस धर्म को बचाकर

निह्पुत करूँ तो करना भोजन उचित नहीं है
करना तुम्हें अकेला ये धर्म हित नहीं है

भगवन् ने हाल सुन ये बंसी तुरत बजाया
हँसता हुआ है बालक आगे पिता के आया

राजा रहे थे दानी उन को था आज़माना
सत् के विजय का डंका दुनिया में था बजाना

लिखते ‘ख़लील अहमद’ श्री कृष्ण का फ़साना
माया नयी नयी दुनिया को दिखा के जाना

संकलन एवं पुनर्विन्यास-
डॉ.अमित कुमार सिंह ‘अब्र’
05-10-2022


हो कर गई मुहब्बत रुस्वा दर-ए-शहर से

हो कर गई मुहब्बत रुस्वा दर-ए-शहर से 

देखा किए सभी पर निकला न कोई घर से 


दिल है बुझा बुझा सा उस के बग़ैर मेरा
घर में भी हो गई है इक शाम अब सहर से


हर दर्द के सफ़र में दिलबर इलाज-ए-ग़म है
कटता नहीं हमारा नाला-ए-दिल ज़हर से


क्या दैर क्या हरम क्या दर शैख-ओ-बरहमन का
जाते नहीं कहीं हम अब यार के शहर से


कुछ यूँ गुज़र रही है इस दौर में मुहब्बत
अब बह रहा है इस में ख़ूँ आप चश्म-ए-तर से


दीद-ए-सनम की ख़ातिर भूला हूँ दर ख़ुदा का
मैं हो गया हूँ काफ़िर दुनिया में इस ख़बर से


इक बार तुम मिले थे इक भीड़ में कहीं पर
तस्वीर अब तुम्हारी हटती नहीं नज़र से


ख़्वाब-ए-फ़िराक़-ए-दिलबर मंज़ूर अब नहीं है
कह दो निगाह-ए-दिन से और रात के जिगर से


पैहम यहाँ चले तो हासिल हुआ ठिकाना
मंज़िल के वास्ते हम हारे नहीं सफ़र से


यायावरी हमारी कर दे न दूर उन को
कूचा-ए-यार घर है इस बात की फ़िकर से


रौशन न था दिनों से माना मकान उस का 

सोया नहीं मुसलसल क्यूँ मैं कई पहर से 


#अमित_अब्र

झील आँखों में समंदर रंज-ओ-ग़म का इक बहे

झील आँखों में समंदर रंज-ओ-ग़म का इक बहे
क़ैद अपने साहिलों में झील ग़म किस से कहे

एक दिल है लाख ग़म हैं और दौर-ए-हिज्र है
ग़म सहे कितने मगर दिल दर्द-ए-दिल कैसे सहे

दौर-ए-नफ़रत आज का भी है गुज़िश्ता दौर सा
बेक़ुसूरों के ख़ुदाया आशियाने फिर ढहे 

जल रहे हैं रूह-ओ-जाँ अब याद की इक आग में 
यार आ भी जा कि कब तक जाँ झुलसती ही रहे

क्या बताऊँ मैं कि कैसी थी मसाफ़त इश्क़ की 
गाह चलता था सफ़र में और रुकता था गहे

#अमित_अब्र 

बे-क़रारी इश्क़ में है बे-क़रारी प्यार में है

बे-क़रारी इश्क़ में है बे-क़रारी प्यार में है
बे-क़रारी हिज्र में है और वस्ल-ए-यार में है

बे-क़रारी में मुहब्बत आज टहली जो गली में 
बे-क़रारी है गली में, कूचा-ए-दिलदार में है

मौत होगी या कि हासिल इश्क़ होगा यार का अब
बे-क़रारी बे-क़रारी इश्क़ के बीमार में है

आज आएगा नज़र वो या कि पर्दे में रहेगा    
इक अजब सी बे-क़रारी हसरत-ए-दीदार में है

है इलाज-ए-बे-क़रारी कह दूँ उन से हाल-ए-दिल 
सोचना आसाँ मगर मुश्किल बहुत इज़हार में है

उन के आने की ख़बर से बे-क़रारी आस्ताँ में
बेक़रारी आँगन-ओ-बाम-ओ-दर-ओ-दीवार में है

आ रहा था हम से मिलने पर न आया अब तलक वो
बे-क़रारी और ख़्याल-ए-यार भी अफ़्कार में है

#अमित_अब्र 


सँवर जाती है जब ये ज़िन्दगी उल्फ़त की राहों में

सँवर जाती है जब ये ज़िन्दगी उल्फ़त की राहों में 
ज़माना क्यूँ गिने है फिर मुहब्बत को गुनाहों में 

वही चेहरा वही आँखें वही आरिज़ वही ज़ुल्फ़ें
वही इक शख़्स बसता है हमारी इन निगाहों में

कभी झुमका कभी पायल कभी नथिया कभी बिंदी
कभी देखूँ तिलिस्मी से वो दो तावीज़ बाहों में

अदालत नफ़रतों की फिर न दे पाई सज़ा कोई
मुक़दमे में मुहब्बत जब रही शामिल गवाहों में

मुहब्बत से पुकारो तो ख़ुदा ख़ुद में नज़र आए 
ज़रूरी कब रहा जाना शिवालों ईदगाहों में

ज़माना और भी शफ़्फ़ाफ़ होता है मुहब्बत में
निखरता और है इंसाँ मुहब्बत की पनाहों में

मुहब्बत से भरे दिल को सताया जब ज़माने ने 
ज़माना आप जल उट्ठा दीवाने दिल की आहों में

#अमित_अब्र
14-09-2022



इश्क़ करते हैं तो ख़ता क्या है

इश्क़ करते हैं तो ख़ता क्या है
ग़र ख़ता है भी तो सज़ा क्या है

सुन रहे हो ना तुम मेरी धड़कन 
मेरे दिल की सुनो रज़ा क्या है 

इश्क़ पे ही नहीं यक़ीं तुम को 
तुम से मैं क्या कहूँ वफ़ा क्या है 

जान देना जो कम है तो कहिए
इश्क़ की और इंतिहा क्या है

कीजिए इश्क़ बन्दगी की जगह
और फिर जानिए ख़ुदा क्या है

#अमित_अब्र
06-09-2021

कल शब जो बढ़ा आलम-ए-रानाई ज़रा और

कल शब जो बढ़ा आलम-ए-रानाई ज़रा और

छायी दिल-ए-मायूस पे तन्हाई ज़रा और


होता न अँधेरा मिरी तक़दीर पे क़ाबिज़ 

होती जो उजाले से शनासाई ज़रा और


जल्दी में था सूरज मिरा बिन शाम ढला आज

वर्ना अभी चलती मिरी परछाई ज़रा और 


बदनाम मिरी ज़ीस्त अभी कम थी भला क्या 

जो मौत ने शोहरत मुझे दिलवाई ज़रा और


मानी जो नहीं बात सितमगर की तो यारो

शमशीर-ए-सितमगर मिरी ओर आई ज़रा और


ज्यों ज्यों बढ़ा है ज़ुल्म-ओ-सितम जिस्म-ओ-ज़ुबाँ पर 

हिम्मत मेरी इस रूह पे गहराई ज़रा और


मसले पे जिरह बिन ही गुनहगार हुए हम

बच जाते अगर चलती जो सुनवाई ज़रा और 


-अमित सिंह

30-4-2018





Wednesday, 12 January 2022

उन की नज़र में उन के मैं नाम हो रहा हूँ

उन की नज़र में उन के मैं नाम हो रहा हूँ
सब की नज़र में लेकिन बदनाम हो रहा हूँ


मिलकर भी उस से मिलना मुमकिन नहीं हुआ है 
वो सुब्ह हो रही है मैं शाम हो रहा हूँ


आ जाये वो अगर तो मुमकिन कि साँस लौटे
जीने में वर्ना अब मैं नाकाम हो रहा हूँ


हँस कर के वो मिले थे बेचैन मैं हूँ तब से  
आग़ाज़-ए-इश्क़ वो मैं अंजाम हो रहा हूँ


दीदार-ए-यार ने था तन्हा किया जहाँ में 
अब डूब इश्क़ में मैं गुमनाम हो रहा हूँ


तहरीक-ए-इश्क़ का जो ऐलान कर दिया है
उल्फ़त के दुश्मनों का ईनाम हो रहा हूँ


क्या ख़ूब है मुहब्बत का खेल अब कहूँ क्या
उन की भी हार का मैं इल्ज़ाम हो रहा हूँ


वसलत भी हिज्र भी फिर नाराज़गी जहाँ की
उल्फ़त का इक मुकम्मल पैग़ाम हो रहा हूँ


दिल की लगी का हासिल उल्फ़त का है ये तोहफ़ा
मशहूर हो रहा हूँ बदनाम हो रहा हूँ


#अमित_अब्र

इंसान से क्यूँ इंसान आज ग़ाफ़िल है

इंसान से क्यूँ इंसान आज ग़ाफ़िल है
क्यूँ दरमियान-ए-दुनिया हद्द-ए-फ़ासिल है


मजबूर हर सच है क्यूँ आज दुनिया में
क्यूँ सामने हर सच के एक बातिल है


बर्बाद पहले से कम थी ज़रा क्या जो
आज इक शहर बस्ती में फिर से दाख़िल है


ख़्वाहिश न हँसने की फ़ुरसत न रोने की
वो शख़्स ग़म की इक तस्वीर-ए-कामिल है


अब रात है दर पर दिन के उजाले में
दिन के उजालों में अब रात शामिल है


बुनियाद-ए-सहरा हिलती है हवाओं से
हर मौज से होता कमज़ोर साहिल है


दुनिया तिरी नफ़रत मिस्मार होगी अब
तूफ़ान-ए-उल्फ़त अब तेरे मुक़ाबिल है


थे हाथ तब ख़ाली जब जी रहे थे हम
दो गज़ ज़मीं मरने के बाद हासिल है


दे मौत जिस्म-ओ-जाँ को या बता ऐ रब
ग़म मेरा कम करने के कौन क़ाबिल है


हर दर्द से हो कर वाक़िफ़ है ना-वाक़िफ़
इस तौर भी ये दुनिया मेरी क़ातिल है


मौजूद है रोटी हर घर में याँ लेकिन
लौटा दरों से ख़ाली पेट साइल है


#अमित_अब्र

Monday, 10 January 2022

हम आह लिखते हैं वो वाह करते हैं

हम आह लिखते हैं वो वाह करते हैं
दिल ग़म में रहता है वो शाद रहते हैं


दरिया-ए-दिल उन बिन सहरा हुआ यारों
बादल भी हो कर दर से दूर उड़ते हैं


चेहरे पे बिखरी है मुस्कान पर उस बिन
ग़म के समंदर चश्म-ए-नम में बहते हैं


कुछ कर न पाये जब हम ख़ातिर उल्फ़त की
तक़दीर पे फिर अपनी आह भरते हैं


इस ख़ूब दुनिया के दस्तूर हैं कैसे
इक आरज़ू में याँ सौ ख़्वाब मरते हैं


ज़ालिम सियासत से घायल सदाक़त है
सच की सदा पे अब सौ ज़ुल्म ढहते हैं


हर रोज़ हैं बुझते तूफ़ान में उस के
दीये मगर शब से हर रोज़ लड़ते हैं


मजबूर को मत और मजबूर कर ऐ रब
इक आह-ए-सहरा में सौ दरिया जलते हैं


मायूस हैं तो क्या ख़्वाहिश नहीं होती
बेबस दिलों में भी अरमान पलते हैं


सहरा हुआ है तब तब्दील सागर में
आफ़ाक़ पे बादल जब शाद चलते हैं


इक सच जहाँ में है मौजूद मुद्दत से
उल्फ़त भरे दिल अक्सर ज़ुल्म सहते हैं


#अमित_अब्र

ख़ुदा मैं तुम्हारी दुआ चाहता हूँ

ख़ुदा मैं तुम्हारी दुआ चाहता हूँ
सनम का अब अपने हुआ चाहता हूँ


सबा भी हुई नर्म छूकर जिसे
बदन मख़मली वो छुआ चाहता हूँ


अगर मौत ही अब मिलाये सनम से
तो जीना नहीं मैं मुआ चाहता हूँ


मिला दे मुझे जो जुआ ज़िन्दगी से
वही खेलना मैं जुआ चाहता हूँ


मुहब्बत हुई गर पशेमान मुझ से 
मुहब्बत की मैं बद-दुआ चाहता हूँ


#अमित_अब्र

उल्फ़त में परेशाँ दिल-ए-नादान हुआ है

उल्फ़त में परेशाँ दिल-ए-नादान हुआ है 
महबूब मिरा मुझ से ही अंजान हुआ है

बर्बाद मुझे कर के अगर शाद हो तुम तो 
रंज-ओ-ग़म-ए-उल्फ़त मिरा आसान हुआ है

वो दूर सही मेरे ख़यालों में ही गुम है 
ऐसे भी सनम मुझ पे मेहरबान हुआ है

सरसब्ज़ थी इस दिल की ज़मीं आप के दम से
उपवन ये बिना आप के वीरान हुआ है

हम कर न सके रंज बयॉं नज़्म-ओ-ग़ज़ल में 
दर्द-ए-दिल-ए-नाकाम ही दीवान हुआ है 

-अमित सिंह

दर से तेरे दूर

दर से तेरे दूर
जीना ना-मंज़ूर 

तेरी वजह से ही
दिल में मेरे नूर

उल्फ़त की दुनिया तो
दुनिया से मजबूर

वो खुश तो उल्फ़त में 
टूटा जी मसरूर

उल्फ़त ही रौशन है 
नफ़रत है बे-नूर

ज़ुल्मत में ख़ुर्शीद
अँधियारे मग़रूर

रहमत है गुमनाम  
ज़ालिम है मशहूर  

सरमाये का राज
राजा बे-मक़्दूर

ताजिर की ताज़ीर
भूखे हैं मज़दूर 

वहशत है याँ शाद
इशरत है रंजूर 

#अमित_अब्र

तुम्हारी याद में मंज़र यहाँ जो मुस्कुराये हैं

तुम्हारी याद में मंज़र यहाँ जो मुस्कुराये हैं
हसीं कितने हुए तुम ये ज़माने को बताये हैं


तुम्हारा ज़िक्र आया है मुहब्बत गुनगुनाई है
मुहब्बत के तराने जुगनुओं ने भी सुनाये हैं


तुम्हारी ज़ुल्फ़ का जादू फ़लक पर आज कुछ यूँ है
कि सहराओं में भी देखो घनेरे अब्र छाये हैं


यक़ीं मानो रखा तुम ने क़दम दर पर हमारे जब
सितारे चाँद भी तब आसमाँ में मुस्कुराये हैं


तुम्हारी याद आती है मिरा दिल मुस्कुराता है
हमारे ख़्वाब में भी ख़्वाब अब तेरे समाये हैं


मुहब्बत पे यक़ीं कर जब सनम को हम ने है देखा
मनाज़िर ख़ूब हर जानिब नज़र फिर आज आये हैं


मुहब्बत की कहानी से अभी तक हम रहे ग़ाफ़िल
मगर देखा तुम्हें तो इश्क़ के एहसास आये हैं


मुहब्बत के सफ़र में कुछ तो है लग़्ज़िश हुई हम से
सफ़र के रास्ते जो आज हमसे वो छुपाये हैं


हमारा बस यही पैग़ाम है नफ़रत की दुनिया को
मुहब्बत से यहाँ हर फ़ासले हमने मिटाये हैं


#अमित_अब्र

Friday, 7 January 2022

अब इश्क़ हुआ नफ़रतों के ज़ेर-ए-नगीं है

अब इश्क़ हुआ नफ़रतों के ज़ेर-ए-नगीं है

लगता है मुहब्बत का शजर ज़ेर-ए-ज़मीं है


नाराज़ सा लगता है ख़ुदा यार-ओ-सनम से

जो अर्श-नशीं था वही अब ख़ाक-नशीं है


हैं राह-ए-मुहब्बत में अँधेरे ही अँधेरे

बे-नूर हुआ इश्क़ सियह माह-जबीं है


बेज़ार हुआ इश्क़ सलीक़ा-ए-जहाँ से

बस फ़िक्र-ए-मुहब्बत है कहीं ज़िक्र नहीं है


मजबूर मुहब्बत सर-ए-बाज़ार लुटेगी

ग़मगीन फ़लक और पशेमान ज़मीं है


कहने को हुए दूर तिरे दर से सनम हम

बस जिस्म हुआ दूर मगर रूह वहीं है


मंज़ूर नहीं आज उसे बात हमारी 

कहता था कभी जो कि फ़क़त तुम पे यक़ीं है


अब और कहाँ ढूँढ़ रहीं तेरी निगाहें 

तेरा दिल-ए-बिस्मिल दिल-ए-मजरूह यहीं है


क्यूँ ज़िक्र-ए-मुहब्बत नहीं हम से कभी करते  

आईन-ए-मकाँ है या कोई ख़ौफ़-ए-मकीं है


क्या राज़-ए-वफ़ा याद तुझे आज दिलायें 

जब राज़-ए-वफ़ा यार तुझे याद नहीं है


जब से है हुआ यार मिरा दूर नज़र से 

ये जी है कहीं और ज़ेहन और कहीं है


इस इश्क़ से है इश्क़ हमें हद से ज़ियादा

ये इश्क़ ज़माने की हर इक शय से हसीं है 


-अमित सिंह

दर-ए-ग़म पे वीरानियाँ चाहता हूँ

दर-ए-ग़म पे वीरानियाँ चाहता हूँ
मैं ख़ुशियों भरा आशियाँ चाहता हूँ


उसे जीत जाऊँ मैं जिन बाज़ियों में
ख़ुदा मैं वही बाज़ियाँ चाहता हूँ


परेशान हो तुम जहाँ से तो तुम से
तुम्हारी परेशानियाँ चाहता हूँ


कहानी भरेगी दिलों में उदासी
नहीं ज़िक्र-ए-दुश्वारियाँ चाहता हूँ


हो आसान जिस से सफ़र इश्क़ का फिर
वही आज आसानियाँ चाहता हूँ


ख़ुदा हो न पर हो मिसाल-ए-सदाकत
फ़क़त एक ऐसा मियाँ चाहता हूँ


मिले दर से दर और दिल से मिले दिल
न दीवार मैं दरमियाँ चाहता हूँ


चले ज़िन्दगी कुछ हसद के बिना भी
दिलों में न अब दूरियाँ चाहता हूँ


हो जिस हाल में मौत मंज़ूर, ऐसी
जहाँ में न मजबूरियाँ चाहता हूँ


सदा ही रही मेरी बे-रंग दुनिया
मैं इक दौर-ए-रंगीनियाँ चाहता हूँ


अदावत भरे इस जहाँ में इलाही
मुहब्बत की सरगोशियाँ चाहता हूँ


#अमित_अब्र

Thursday, 6 January 2022

ग़ज़ल हिज्र में गुनगुना कर चले

ग़ज़ल हिज्र में गुनगुना कर चले

ग़म-ए-हिज्र दिल में छुपा कर चले


मुहब्बत की दुनिया न मेरी हुई 

मुहब्बत की दुनिया भुला कर चले


नहीं वो रहे जो मिरे मुंतज़िर 

मुहब्बत से जी सो उठा कर चले 


विसाल-ए-सनम जब न मुमकिन हुआ

तो हम जश्न-ए-फ़ुर्क़त मना कर चले


मुहब्बत में वादे किए थे कई

मुहब्बत के वादे निभा कर चले


मुहब्बत की ख़्वाहिश रहूँ दूर सो

निशाँ इश्क़ के सब मिटा कर चले


हक़ीक़त में हैं वो भुलाये हमें

उन्हे ख़्वाब में याद आ कर चले


बुराई का दामन बड़ा है बहुत 

बुराई से दामन बचा कर चले


सबब थी तबाही की मेरी अना   

अना ख़ाक में सो मिला कर चले


हँसाकर किसी एक मायूस को 

यहाँ प्यार यूँ भी जता कर चले


रह-ए-इश्क़ में दिल दुखा है बहुत 

नई राह दिल को दिखा कर चले


न बुत है न काबा न तुम हो यहाँ

परस्तिश की लौ सो बुझा कर चले


रहीं जब न ख़ुशियाँ यहाँ मुस्तक़िल

मरासिम ग़मों से बना कर चले


रहे मो'तबर आसमाँ इश्क़ का 

परिन्दे वफ़ा के उड़ा कर चले


सताया गया हूँ बहुत इश्क़ में

मगर इश्क़ रब है बता कर चले


बयाबाँ किया था मुझे इश्क़ ने

गुल-ए-इश्क़ फिर भी खिला कर चले 


रह-ए-इश्क़ दुनिया की काँटो भरी

रह-ए-इश्क़ में गुल बिछा कर चले


वही आरज़ू है वही जुस्तुजू 

उसी एक से जी लगा कर चले


वफ़ा के बगीचे बयाबाँ हुए 

वफ़ा के बगीचे सजा कर चले


मुहब्बत ही है हिज्र के मोड़ पर 

नज़र से न उन को गिरा कर चले


मुहब्बत न थी मेरी तक़दीर में 

यही बात दिल को बता कर चले


हयात-ए-मुहब्बत की ख़ातिर ख़ुदा 

मुहब्बत की बस्ती बसा कर चले


अगरचे मयस्सर नहीं वो मुझे 

मगर आस जी को दिला कर चले


तक़ाज़ा-ए-उल्फ़त की ख़ातिर ही हम 

ग़म-ए-हिज्र में मुस्कुरा कर चले


किया 'अब्र' क्या तुम ने आकर यहाँ

ग़म-ए-ज़ीस्त गाकर सुना कर चले 


#अमित_अब्र

ख़फ़ा इश्क़ से अब ज़माना हुआ

ख़फ़ा इश्क़ से अब ज़माना हुआ

न अब क़ैस कोई दीवाना हुआ


ग़ज़ल दास्तान-ए-सियासत हुई

कभी थी इबादत फ़साना हुआ


दर-ए-इश्क़ है दर इबादत का पर

किसी का वहाँ अब न जाना हुआ


मुहब्बत के अब हैं तरीक़े नये

पुराना तरीक़ा पुराना हुआ


हुआ जो जुदा मैं तिरे प्यार से

मिरा जी ग़मों का ठिकाना हुआ


मिले तो बहुत याँ मगर बाद तेरे

किसी पे न दिल का फिर आना हुआ


मुहब्बत में जो ग़म मिला था मुझे 

कभी वो न जी से रवाना हुआ


हुआ बाद तेरे यहाँ ये सितम

था आबाद दिल जो वीराना हुआ


उजाड़ा फ़सादों ने घर यूँ मिरा

की फिर घर न मुझ से बनाना हुआ 


सितमगर हुआ आज सय्याद जो

भला इक परिन्दा निशाना हुआ 


मुहब्बत तुम्हारी न मुझ को मिली

सो मैं आप से भी बेगाना हुआ


#अमित_अब्र

नज़र में वही जो रही रात भर

नज़र में वही जो रही रात भर
रही बात कुछ अनकही रात भर 


बयाँ कर गया जो फ़साना उसे       
कही फिर कहानी वही रात भर


लबों ने नहीं जब फ़साने कहे 
नज़र ने कहानी कही रात भर


मिटाये गये जो हसीं ख़्वाब तो
नदी आँख़ में इक बही रात भर


सहर की न थी आस जिस रात को
वही रात हमने सही रात भर


#अमित_अब्र

इक दौर-ए-कर्ब में अब सारा मिरा जहाँ है

इक दौर-ए-कर्ब में अब सारा मिरा जहाँ है
बिन यार जल रही शब दिन भी धुआँ धुआँ है 


दर-दर भटक रहा हूँ मैं फ़िक्र में सनम की 
मेरे ख़ुदा बता मेरी ज़िन्दगी कहाँ है 


ज़ुल्म-ओ-सितम जहाँ का उसके नहीं मुक़ाबिल
नाला-ए-हिज्र में जो ग़म एक अब निहाँ है 


है दूर यार जो तो बेहाल हाल-ए-दिल क्यूँ
क्यूँ चश्म तर-ब-तर और वीराँ हुआ मकाँ है 


दिलबर नहीं रहा जो अब मुंतज़िर मिरा तो

ईजाद मेरे दिल पर इक ज़ख्म का निशाँ है 


वादा-ए-वस्ल है सो ज़िन्दा यहाँ हूँ वर्ना
ये ज़ीस्त मौत की बस इक और तर्जुमाँ है 


ज़ख़्मी हुआ हूँ मैं ख़ुद अपने फ़साद-ए-दिल से
ख़ातिर सनम की देखो मुश्किल में मेरी जाँ है 


क़तरा-ए-इश्क़ की है इक आरज़ू जिगर में
शम्स-ओ-क़मर नहीं ना ख़्वाहिश में आसमाँ है 


चैन-ओ-क़रार क्या क्या मसरूफ़ियत जहाँ की
जो पास तुम नहीं तो ये ज़ीस्त रायगाँ है 


है यार जो हमारा अब दूर काफ़िले से
ठहरा हुआ सफ़र है ग़मगीन कारवाँ है 


आग़ाज़-ए-ज़िन्दगी से अंजाम-ए-ज़िन्दगी तक
कुछ और क्या सफ़र में बस दर्द दरमियाँ है 


#अमित_अब्र