Monday, 19 December 2022
जब से मिला हूँ उस से मैं इश्क़ लिख रहा हूँ
Thursday, 24 November 2022
इश्क़ और क्या है क़िस्सा दिल के ख़याल का है
कूचा-ए-दिल में रूह बेताब नज़र आती है
Thursday, 17 November 2022
बताया भी छिपाया भी हँसाया भी रुलाया भी
Saturday, 29 October 2022
कैसे उसे बताएँ कैसी है बे-क़रारी
कैसे उसे बताएँ कैसी है बे-क़रारी
आलम है हिज्र का तो बाक़ी है इंतिज़ारी
करता नहीं यक़ीं वो पर बात सच यही है
उस के बग़ैर जी में उठती है हूक भारी
इक ज़ब्त-ए-इश्क़ मेरी दुनिया बदल रहा है
क्या जानिए कहाँ अब ले जाये ये ख़ुमारी
उस के जुनून का है अब इख़्तियार मुझ पर
चलती नहीं है मुझ पर ख़ुद मेरी इख़्तियारी
है क़ैद में मुहब्बत किरदार ग़म-ज़दा हैं
रूदाद-ए-इश्क़ में है अब दर्द की शुमारी
फ़रियाद में मुझे वो जब रब से माँगता है
फ़िरदौस में उभरती है आह एक प्यारी
अंजाम-ए-इश्क़ में रख दो कहकशाँ हमारे
आग़ाज़-ए-इश्क़ हम ने काँटों में है गुज़ारी
हर इश्क़ हो मुकम्मल हर हाल में ज़मीं पे
कर ऐ ख़ुदा फ़लक से फ़रमान-ए-इश्क़ जारी
रुख़्सत हुए अगर तुम बेज़ार मेरे दर से
बेज़ारी में फिर कटेगी मेरी ये उम्र सारी
यूँ ही नहीं तुम्हारा दर आज हम से छूटा
ऐ इश्क़ राह तेरी हम ने बहुत निहारी
हैं दर्द में मरासिम तन्हा हुआ जहाँ है
अपनों के वार से ही ये काएनात हारी
दार-ओ-मदार-ए-दुनिया सिर आन अब पड़ी है
कैसे करूँ मुहब्बत मैं तुझ पे जाँ-निसारी
-अमित सिंह
कारवान-ए-ख़याल है ज़िन्दगी
मेरे लिए हुई तू मुश्किल सवाल क्यूँ है
सौदा दिल का बुरा नहीं होता
सौदा दिल का बुरा नहीं होता
इश्क़ घाटा नफ़ा नहीं होता
इश्क़ ज़्यादा ज़रा नहीं होता
इश्क़ होता है या नहीं होता
बात कुछ तो है इश्क़ में वर्ना
दिल किसी पे फ़िदा नहीं होता
वस्ल या हिज्र या ख़ुशी या ग़म
इश्क़ बे-माजरा नहीं होता
होता हर इश्क़ गर मुकम्मल तो
क़ैस यूँ ग़म-ज़दा नहीं होता
इश्क़ में जो मिला अगर तो फिर
दर्द दिल से जुदा नहीं होता
हाल-ए-दिल होता है बुरा यारो
दिल किसी का बुरा नहीं होता
वो तो नाराज़ है बहुत लेकिन
क्यूँ मैं उस से ख़फ़ा नहीं होता
मिलते वो हम से रोज़ हैं लेकिन
मिलने सा वाक़िआ' नहीं होता
सब से मिलता है सब का हो कर वो
जाने क्यूँ बस मिरा नहीं होता
तोहमतें हुस्न पर हमेशा क्यूँ
इश्क़ क्या बे-वफ़ा नहीं होता
फ़र्क हम ने किया बहुत लेकिन
इश्क़ रब से जुदा नहीं होता
-अमित सिंह
05-07-2018
याद में उस की अजब सी बे-क़रारी दिल में है
बाद तुम को माँगने के कुछ न माँगू रब से मैं
करने को शाद उस को मैं इश्क़ लिख रहा हूँ
चेहरा लगे है उस का जैसे किताब-ए-उल्फ़त
मसरूफ़ हूँ बहुत मैं मिलने के बाद उस से
उस की हर इक अदा है मज़मून-ए-इश्क़ यारो
मालूम है पढ़ेगा मुझ को नहीं वो फिर भी
कैसे लिखूँ मुहब्बत आता नहीं समझ में
जल्वा-ए-हुस्न-ए-जानाँ मानो बयान-ए-उल्फ़त
-अमित सिंह
हँसाना मुहब्बत रुलाना मुहब्बत
ख़ुश-नसीबी भूल कर भी उस के घर आती नहीं
ख़ूबसूरत ख़ुमार है यारों
वजूद-ए-मुहब्बत सवालों में है
वजूद-ए-मुहब्बत सवालों में है
नहीं गर तू मेरे ख़यालों में है
कि तू जो है शामिल हर इक ख़्वाब में
हर इक रात मेरी उजालों में है
लिखा है दिलों पे मुहब्बत ने जो
कहाँ वो कहानी रिसालों में है
मुहब्बत की ख़ातिर है जो इश्क़ में
कहाँ बात वो हुस्न वालों में है
है मदहोश जिस में मुहब्बत भी अब
वही जाम याँ आज प्यालों में है
किसी का फ़साना अधूरा रहा
किसी की कहानी हवालों में है
नहीं इश्क़ में आबलों से तू डर
मुहब्बत निहाँ आज छालों में है
शब-ए-वस्ल की उम्र पल भर की थी
शब-ए-हिज्र की उम्र सालों में है
हवा से लड़ा इक दिया उम्र भर
मुहब्बत अब उस की मिसालों में है
#अमित_अब्र
श्री कृष्ण एक दिन मन अर्जुन का भाँप कर के
तू दे वचन जो स्वागत स्वीकार गर तुझे हो
हो कर गई मुहब्बत रुस्वा दर-ए-शहर से
हो कर गई मुहब्बत रुस्वा दर-ए-शहर से
देखा किए सभी पर निकला न कोई घर से
दिल है बुझा बुझा सा उस के बग़ैर मेरा
घर में भी हो गई है इक शाम अब सहर से
हर दर्द के सफ़र में दिलबर इलाज-ए-ग़म है
कटता नहीं हमारा नाला-ए-दिल ज़हर से
क्या दैर क्या हरम क्या दर शैख-ओ-बरहमन का
जाते नहीं कहीं हम अब यार के शहर से
कुछ यूँ गुज़र रही है इस दौर में मुहब्बत
अब बह रहा है इस में ख़ूँ आप चश्म-ए-तर से
दीद-ए-सनम की ख़ातिर भूला हूँ दर ख़ुदा का
मैं हो गया हूँ काफ़िर दुनिया में इस ख़बर से
इक बार तुम मिले थे इक भीड़ में कहीं पर
तस्वीर अब तुम्हारी हटती नहीं नज़र से
ख़्वाब-ए-फ़िराक़-ए-दिलबर मंज़ूर अब नहीं है
कह दो निगाह-ए-दिन से और रात के जिगर से
पैहम यहाँ चले तो हासिल हुआ ठिकाना
मंज़िल के वास्ते हम हारे नहीं सफ़र से
यायावरी हमारी कर दे न दूर उन को
कूचा-ए-यार घर है इस बात की फ़िकर से
रौशन न था दिनों से माना मकान उस का
सोया नहीं मुसलसल क्यूँ मैं कई पहर से
#अमित_अब्र
झील आँखों में समंदर रंज-ओ-ग़म का इक बहे
बे-क़रारी इश्क़ में है बे-क़रारी प्यार में है
सँवर जाती है जब ये ज़िन्दगी उल्फ़त की राहों में
इश्क़ करते हैं तो ख़ता क्या है
कल शब जो बढ़ा आलम-ए-रानाई ज़रा और
कल शब जो बढ़ा आलम-ए-रानाई ज़रा और
छायी दिल-ए-मायूस पे तन्हाई ज़रा और
होता न अँधेरा मिरी तक़दीर पे क़ाबिज़
होती जो उजाले से शनासाई ज़रा और
जल्दी में था सूरज मिरा बिन शाम ढला आज
वर्ना अभी चलती मिरी परछाई ज़रा और
बदनाम मिरी ज़ीस्त अभी कम थी भला क्या
जो मौत ने शोहरत मुझे दिलवाई ज़रा और
मानी जो नहीं बात सितमगर की तो यारो
शमशीर-ए-सितमगर मिरी ओर आई ज़रा और
ज्यों ज्यों बढ़ा है ज़ुल्म-ओ-सितम जिस्म-ओ-ज़ुबाँ पर
हिम्मत मेरी इस रूह पे गहराई ज़रा और
मसले पे जिरह बिन ही गुनहगार हुए हम
बच जाते अगर चलती जो सुनवाई ज़रा और
-अमित सिंह
30-4-2018
Wednesday, 12 January 2022
उन की नज़र में उन के मैं नाम हो रहा हूँ
उन की नज़र में उन के मैं नाम हो रहा हूँ
सब की नज़र में लेकिन बदनाम हो रहा हूँ
मिलकर भी उस से मिलना मुमकिन नहीं हुआ है
वो सुब्ह हो रही है मैं शाम हो रहा हूँ
आ जाये वो अगर तो मुमकिन कि साँस लौटे
जीने में वर्ना अब मैं नाकाम हो रहा हूँ
हँस कर के वो मिले थे बेचैन मैं हूँ तब से
आग़ाज़-ए-इश्क़ वो मैं अंजाम हो रहा हूँ
दीदार-ए-यार ने था तन्हा किया जहाँ में
अब डूब इश्क़ में मैं गुमनाम हो रहा हूँ
तहरीक-ए-इश्क़ का जो ऐलान कर दिया है
उल्फ़त के दुश्मनों का ईनाम हो रहा हूँ
क्या ख़ूब है मुहब्बत का खेल अब कहूँ क्या
उन की भी हार का मैं इल्ज़ाम हो रहा हूँ
वसलत भी हिज्र भी फिर नाराज़गी जहाँ की
उल्फ़त का इक मुकम्मल पैग़ाम हो रहा हूँ
दिल की लगी का हासिल उल्फ़त का है ये तोहफ़ा
मशहूर हो रहा हूँ बदनाम हो रहा हूँ
#अमित_अब्र
इंसान से क्यूँ इंसान आज ग़ाफ़िल है
इंसान से क्यूँ इंसान आज ग़ाफ़िल है
क्यूँ दरमियान-ए-दुनिया हद्द-ए-फ़ासिल है
मजबूर हर सच है क्यूँ आज दुनिया में
क्यूँ सामने हर सच के एक बातिल है
बर्बाद पहले से कम थी ज़रा क्या जो
आज इक शहर बस्ती में फिर से दाख़िल है
ख़्वाहिश न हँसने की फ़ुरसत न रोने की
वो शख़्स ग़म की इक तस्वीर-ए-कामिल है
अब रात है दर पर दिन के उजाले में
दिन के उजालों में अब रात शामिल है
बुनियाद-ए-सहरा हिलती है हवाओं से
हर मौज से होता कमज़ोर साहिल है
दुनिया तिरी नफ़रत मिस्मार होगी अब
तूफ़ान-ए-उल्फ़त अब तेरे मुक़ाबिल है
थे हाथ तब ख़ाली जब जी रहे थे हम
दो गज़ ज़मीं मरने के बाद हासिल है
दे मौत जिस्म-ओ-जाँ को या बता ऐ रब
ग़म मेरा कम करने के कौन क़ाबिल है
हर दर्द से हो कर वाक़िफ़ है ना-वाक़िफ़
इस तौर भी ये दुनिया मेरी क़ातिल है
मौजूद है रोटी हर घर में याँ लेकिन
लौटा दरों से ख़ाली पेट साइल है
#अमित_अब्र
Monday, 10 January 2022
हम आह लिखते हैं वो वाह करते हैं
हम आह लिखते हैं वो वाह करते हैं
दिल ग़म में रहता है वो शाद रहते हैं
दरिया-ए-दिल उन बिन सहरा हुआ यारों
बादल भी हो कर दर से दूर उड़ते हैं
चेहरे पे बिखरी है मुस्कान पर उस बिन
ग़म के समंदर चश्म-ए-नम में बहते हैं
कुछ कर न पाये जब हम ख़ातिर उल्फ़त की
तक़दीर पे फिर अपनी आह भरते हैं
इस ख़ूब दुनिया के दस्तूर हैं कैसे
इक आरज़ू में याँ सौ ख़्वाब मरते हैं
ज़ालिम सियासत से घायल सदाक़त है
सच की सदा पे अब सौ ज़ुल्म ढहते हैं
हर रोज़ हैं बुझते तूफ़ान में उस के
दीये मगर शब से हर रोज़ लड़ते हैं
मजबूर को मत और मजबूर कर ऐ रब
इक आह-ए-सहरा में सौ दरिया जलते हैं
मायूस हैं तो क्या ख़्वाहिश नहीं होती
बेबस दिलों में भी अरमान पलते हैं
सहरा हुआ है तब तब्दील सागर में
आफ़ाक़ पे बादल जब शाद चलते हैं
इक सच जहाँ में है मौजूद मुद्दत से
उल्फ़त भरे दिल अक्सर ज़ुल्म सहते हैं
#अमित_अब्र
ख़ुदा मैं तुम्हारी दुआ चाहता हूँ
ख़ुदा मैं तुम्हारी दुआ चाहता हूँ
सनम का अब अपने हुआ चाहता हूँ
सबा भी हुई नर्म छूकर जिसे
बदन मख़मली वो छुआ चाहता हूँ
अगर मौत ही अब मिलाये सनम से
तो जीना नहीं मैं मुआ चाहता हूँ
मिला दे मुझे जो जुआ ज़िन्दगी से
वही खेलना मैं जुआ चाहता हूँ
मुहब्बत हुई गर पशेमान मुझ से
मुहब्बत की मैं बद-दुआ चाहता हूँ
#अमित_अब्र
उल्फ़त में परेशाँ दिल-ए-नादान हुआ है
दर से तेरे दूर
तुम्हारी याद में मंज़र यहाँ जो मुस्कुराये हैं
तुम्हारी याद में मंज़र यहाँ जो मुस्कुराये हैं
हसीं कितने हुए तुम ये ज़माने को बताये हैं
तुम्हारा ज़िक्र आया है मुहब्बत गुनगुनाई है
मुहब्बत के तराने जुगनुओं ने भी सुनाये हैं
तुम्हारी ज़ुल्फ़ का जादू फ़लक पर आज कुछ यूँ है
कि सहराओं में भी देखो घनेरे अब्र छाये हैं
यक़ीं मानो रखा तुम ने क़दम दर पर हमारे जब
सितारे चाँद भी तब आसमाँ में मुस्कुराये हैं
तुम्हारी याद आती है मिरा दिल मुस्कुराता है
हमारे ख़्वाब में भी ख़्वाब अब तेरे समाये हैं
मुहब्बत पे यक़ीं कर जब सनम को हम ने है देखा
मनाज़िर ख़ूब हर जानिब नज़र फिर आज आये हैं
मुहब्बत की कहानी से अभी तक हम रहे ग़ाफ़िल
मगर देखा तुम्हें तो इश्क़ के एहसास आये हैं
मुहब्बत के सफ़र में कुछ तो है लग़्ज़िश हुई हम से
सफ़र के रास्ते जो आज हमसे वो छुपाये हैं
हमारा बस यही पैग़ाम है नफ़रत की दुनिया को
मुहब्बत से यहाँ हर फ़ासले हमने मिटाये हैं
#अमित_अब्र
Friday, 7 January 2022
अब इश्क़ हुआ नफ़रतों के ज़ेर-ए-नगीं है
अब इश्क़ हुआ नफ़रतों के ज़ेर-ए-नगीं है
लगता है मुहब्बत का शजर ज़ेर-ए-ज़मीं है
नाराज़ सा लगता है ख़ुदा यार-ओ-सनम से
जो अर्श-नशीं था वही अब ख़ाक-नशीं है
हैं राह-ए-मुहब्बत में अँधेरे ही अँधेरे
बे-नूर हुआ इश्क़ सियह माह-जबीं है
बेज़ार हुआ इश्क़ सलीक़ा-ए-जहाँ से
बस फ़िक्र-ए-मुहब्बत है कहीं ज़िक्र नहीं है
मजबूर मुहब्बत सर-ए-बाज़ार लुटेगी
ग़मगीन फ़लक और पशेमान ज़मीं है
कहने को हुए दूर तिरे दर से सनम हम
बस जिस्म हुआ दूर मगर रूह वहीं है
मंज़ूर नहीं आज उसे बात हमारी
कहता था कभी जो कि फ़क़त तुम पे यक़ीं है
अब और कहाँ ढूँढ़ रहीं तेरी निगाहें
तेरा दिल-ए-बिस्मिल दिल-ए-मजरूह यहीं है
क्यूँ ज़िक्र-ए-मुहब्बत नहीं हम से कभी करते
आईन-ए-मकाँ है या कोई ख़ौफ़-ए-मकीं है
क्या राज़-ए-वफ़ा याद तुझे आज दिलायें
जब राज़-ए-वफ़ा यार तुझे याद नहीं है
जब से है हुआ यार मिरा दूर नज़र से
ये जी है कहीं और ज़ेहन और कहीं है
इस इश्क़ से है इश्क़ हमें हद से ज़ियादा
ये इश्क़ ज़माने की हर इक शय से हसीं है
-अमित सिंह
दर-ए-ग़म पे वीरानियाँ चाहता हूँ
दर-ए-ग़म पे वीरानियाँ चाहता हूँ
मैं ख़ुशियों भरा आशियाँ चाहता हूँ
उसे जीत जाऊँ मैं जिन बाज़ियों में
ख़ुदा मैं वही बाज़ियाँ चाहता हूँ
परेशान हो तुम जहाँ से तो तुम से
तुम्हारी परेशानियाँ चाहता हूँ
कहानी भरेगी दिलों में उदासी
नहीं ज़िक्र-ए-दुश्वारियाँ चाहता हूँ
हो आसान जिस से सफ़र इश्क़ का फिर
वही आज आसानियाँ चाहता हूँ
ख़ुदा हो न पर हो मिसाल-ए-सदाकत
फ़क़त एक ऐसा मियाँ चाहता हूँ
मिले दर से दर और दिल से मिले दिल
न दीवार मैं दरमियाँ चाहता हूँ
चले ज़िन्दगी कुछ हसद के बिना भी
दिलों में न अब दूरियाँ चाहता हूँ
हो जिस हाल में मौत मंज़ूर, ऐसी
जहाँ में न मजबूरियाँ चाहता हूँ
सदा ही रही मेरी बे-रंग दुनिया
मैं इक दौर-ए-रंगीनियाँ चाहता हूँ
अदावत भरे इस जहाँ में इलाही
मुहब्बत की सरगोशियाँ चाहता हूँ
#अमित_अब्र
Thursday, 6 January 2022
ग़ज़ल हिज्र में गुनगुना कर चले
ग़ज़ल हिज्र में गुनगुना कर चले
ग़म-ए-हिज्र दिल में छुपा कर चले
मुहब्बत की दुनिया न मेरी हुई
मुहब्बत की दुनिया भुला कर चले
नहीं वो रहे जो मिरे मुंतज़िर
मुहब्बत से जी सो उठा कर चले
विसाल-ए-सनम जब न मुमकिन हुआ
तो हम जश्न-ए-फ़ुर्क़त मना कर चले
मुहब्बत में वादे किए थे कई
मुहब्बत के वादे निभा कर चले
मुहब्बत की ख़्वाहिश रहूँ दूर सो
निशाँ इश्क़ के सब मिटा कर चले
हक़ीक़त में हैं वो भुलाये हमें
उन्हे ख़्वाब में याद आ कर चले
बुराई का दामन बड़ा है बहुत
बुराई से दामन बचा कर चले
सबब थी तबाही की मेरी अना
अना ख़ाक में सो मिला कर चले
हँसाकर किसी एक मायूस को
यहाँ प्यार यूँ भी जता कर चले
रह-ए-इश्क़ में दिल दुखा है बहुत
नई राह दिल को दिखा कर चले
न बुत है न काबा न तुम हो यहाँ
परस्तिश की लौ सो बुझा कर चले
रहीं जब न ख़ुशियाँ यहाँ मुस्तक़िल
मरासिम ग़मों से बना कर चले
रहे मो'तबर आसमाँ इश्क़ का
परिन्दे वफ़ा के उड़ा कर चले
सताया गया हूँ बहुत इश्क़ में
मगर इश्क़ रब है बता कर चले
बयाबाँ किया था मुझे इश्क़ ने
गुल-ए-इश्क़ फिर भी खिला कर चले
रह-ए-इश्क़ दुनिया की काँटो भरी
रह-ए-इश्क़ में गुल बिछा कर चले
वही आरज़ू है वही जुस्तुजू
उसी एक से जी लगा कर चले
वफ़ा के बगीचे बयाबाँ हुए
वफ़ा के बगीचे सजा कर चले
मुहब्बत ही है हिज्र के मोड़ पर
नज़र से न उन को गिरा कर चले
मुहब्बत न थी मेरी तक़दीर में
यही बात दिल को बता कर चले
हयात-ए-मुहब्बत की ख़ातिर ख़ुदा
मुहब्बत की बस्ती बसा कर चले
अगरचे मयस्सर नहीं वो मुझे
मगर आस जी को दिला कर चले
तक़ाज़ा-ए-उल्फ़त की ख़ातिर ही हम
ग़म-ए-हिज्र में मुस्कुरा कर चले
किया 'अब्र' क्या तुम ने आकर यहाँ
ग़म-ए-ज़ीस्त गाकर सुना कर चले
#अमित_अब्र
ख़फ़ा इश्क़ से अब ज़माना हुआ
ख़फ़ा इश्क़ से अब ज़माना हुआ
न अब क़ैस कोई दीवाना हुआ
ग़ज़ल दास्तान-ए-सियासत हुई
कभी थी इबादत फ़साना हुआ
दर-ए-इश्क़ है दर इबादत का पर
किसी का वहाँ अब न जाना हुआ
मुहब्बत के अब हैं तरीक़े नये
पुराना तरीक़ा पुराना हुआ
हुआ जो जुदा मैं तिरे प्यार से
मिरा जी ग़मों का ठिकाना हुआ
मिले तो बहुत याँ मगर बाद तेरे
किसी पे न दिल का फिर आना हुआ
मुहब्बत में जो ग़म मिला था मुझे
कभी वो न जी से रवाना हुआ
हुआ बाद तेरे यहाँ ये सितम
था आबाद दिल जो वीराना हुआ
उजाड़ा फ़सादों ने घर यूँ मिरा
की फिर घर न मुझ से बनाना हुआ
सितमगर हुआ आज सय्याद जो
भला इक परिन्दा निशाना हुआ
मुहब्बत तुम्हारी न मुझ को मिली
सो मैं आप से भी बेगाना हुआ
#अमित_अब्र
नज़र में वही जो रही रात भर
नज़र में वही जो रही रात भर
रही बात कुछ अनकही रात भर
बयाँ कर गया जो फ़साना उसे
कही फिर कहानी वही रात भर
लबों ने नहीं जब फ़साने कहे
नज़र ने कहानी कही रात भर
मिटाये गये जो हसीं ख़्वाब तो
नदी आँख़ में इक बही रात भर
सहर की न थी आस जिस रात को
वही रात हमने सही रात भर
#अमित_अब्र
इक दौर-ए-कर्ब में अब सारा मिरा जहाँ है
इक दौर-ए-कर्ब में अब सारा मिरा जहाँ है
बिन यार जल रही शब दिन भी धुआँ धुआँ है
दर-दर भटक रहा हूँ मैं फ़िक्र में सनम की
मेरे ख़ुदा बता मेरी ज़िन्दगी कहाँ है
ज़ुल्म-ओ-सितम जहाँ का उसके नहीं मुक़ाबिल
नाला-ए-हिज्र में जो ग़म एक अब निहाँ है
है दूर यार जो तो बेहाल हाल-ए-दिल क्यूँ
क्यूँ चश्म तर-ब-तर और वीराँ हुआ मकाँ है
दिलबर नहीं रहा जो अब मुंतज़िर मिरा तो
ईजाद मेरे दिल पर इक ज़ख्म का निशाँ है
वादा-ए-वस्ल है सो ज़िन्दा यहाँ हूँ वर्ना
ये ज़ीस्त मौत की बस इक और तर्जुमाँ है
ज़ख़्मी हुआ हूँ मैं ख़ुद अपने फ़साद-ए-दिल से
ख़ातिर सनम की देखो मुश्किल में मेरी जाँ है
क़तरा-ए-इश्क़ की है इक आरज़ू जिगर में
शम्स-ओ-क़मर नहीं ना ख़्वाहिश में आसमाँ है
चैन-ओ-क़रार क्या क्या मसरूफ़ियत जहाँ की
जो पास तुम नहीं तो ये ज़ीस्त रायगाँ है
है यार जो हमारा अब दूर काफ़िले से
ठहरा हुआ सफ़र है ग़मगीन कारवाँ है
आग़ाज़-ए-ज़िन्दगी से अंजाम-ए-ज़िन्दगी तक
कुछ और क्या सफ़र में बस दर्द दरमियाँ है
#अमित_अब्र