बताया भी छिपाया भी हँसाया भी रुलाया भी
सितम ढा कर मिरे दिल पे सितम-गर मुस्कुराया भी
कहानी में मुहब्बत की वो मेरे साथ आया भी
कहानी में मुहब्बत फिर वो मेरी आज़माया भी
समंदर ज़िन्दगी का ज़िन्दगी में फ़ितरती निकला
भँवर में ज़िन्दगी के वो डुबाया भी बचाया भी
ज़माना भी अजब किरदार में था ज़ीस्त में मेरी
गले मुझ को लगाया भी लगाकर फिर भुलाया भी
तुम्हारी याद में ही शाम गुज़री और सहर आई
तुम्हारी याद में दीया जलाया भी बुझाया भी
ज़माने से रहे हम मुंतज़िर जिस शख़्स के यारों
वो बरसों बाद आया भी हमें आना जताया भी
अदावत भी रही उस से मुहब्बत भी रही उस से
न जाने क्यूँ रहा वो शख़्स अपना भी पराया भी
शहर के साथ या-रब जल रही है लाश यारों की
शहर को अपने हम ने ही बसाया भी मिटाया भी
अदावत ने किया बर्बाद था लेकिन मुहब्बत ने
ज़माने को बचाया भी बनाया भी सजाया भी
-अमित सिंह
08-08-2020
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