Thursday, 24 November 2022

कूचा-ए-दिल में रूह बेताब नज़र आती है

कूचा-ए-दिल में रूह बेताब नज़र आती है 
उस के बग़ैर दुनिया सराब नज़र आती है 

रुख़्सार हर्फ़-ए-उल्फ़त हैं होंट हर्फ़-ए-उल्फ़त
निगाह-ए-यार उल्फ़त की किताब नज़र आती है 

आसाँ हुआ सफ़र है हासिल हुई है मंज़िल 
साथ उस के ज़िन्दगी कामयाब नज़र आती है 

होती है ज़िन्दगी हक़ीक़त से रू-ब-रू जब 
तो मुहब्बत एक अधूरा ख़्वाब नज़र आती है

यूँ तो हैं लाखों ग़म जहाँ में लेकिन आज भी  
मुफ़्लिसी सब से बड़ा अज़ाब नज़र आती है

#अमित_सिंह 
12-10-2022

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