Monday, 10 February 2020

रंग-ए-शफ़क़ वो, वो शाम का आफ़ताब लगता है

रंग-ए-शफ़क़ वो, वो शाम का आफ़ताब लगता है
सितारों भरी रात में खिला माहताब लगता है 

रंग-ए-शफ़क़ = शाम की लालिमा का रंग
आफ़ताब =सूरज 
माहताब =चाँद


दुनिया के गुलशन में वो भरता है रंग इस क़दर
कभी मुसव्विर-ए-जहाँ, कभी सुर्ख़ाब लगता है

मुसव्विर-ए-जहाँ =painter of world
सुर्ख़ाब = a colorful bird


जुल्फ़ घटा तो झील आँखें हैं रुख़्सार गुलाबी
अदाओं से तो अपनी वो लाजवाब लगता है

रुख़्सार = cheek


पाकर एक नज़र उस की इश्क़ डूब है जाता
दरिया-ए-इश्क़ में वो हुस्न का गिर्दाब लगता है 

गिर्दाब = भँवर


यूँ तो हसीं बहुत हैं दुनिया में यारों लेकिन 
यार हमारा आप हसीनों का ख़्वाब लगता है

पड़ते हैं अंजुमन में जब जब हसीं क़दम उन के
मंज़र-ए-महफ़िल तब तब दिलकश-ओ-नायाब लगता है 

अंजुमन =महफ़िल 
नायाब = rare


तस्वीर-ए-यार देखूँ जो सुर्ख़ जोड़े में तो फिर 
दिल-ए-नादाँ बे-बस-ओ-बे-क़रार-ओ-बे-ताब लगता है 


#अमित_अब्र

22      22          22  22         22   22       2

Thursday, 6 February 2020

मुहब्बत में दिल ग़म-ज़दा हो रहा है

मुहब्बत में दिल ग़म-ज़दा हो रहा है
मिरा यार मुझ से जुदा हो रहा है

सज़ा-ए-मुहब्बत हुई फिर मुक़र्रर
यही काम याँ तयशुदा हो रहा है 

तमन्ना-ए-उल्फ़त उठे दिल में कैसे 
सनम ही मिरा जब ख़फ़ा हो रहा है 

अब उस से मुलाक़ात मुमकिन हो कैसे 
मुहब्बत में जब वो ख़ुदा हो रहा है 

नुमायाँ भले हूँ ज़माने को लेकिन 
दिल उल्फ़त में अब गुम-शुदा हो रहा है 

मुझे देख कर भी नहीं देखता जो
वही शख़्स याँ क्यूँ मिरा हो रहा है 

मुक़द्दर में था या ख़ता कुछ हुई थी
ग़म उल्फ़त की क्यूँ इब़्तिदा हो रहा है

जिसे तू नहीं जानता है मिरे दिल
बता क्यूँ उसी पे फ़िदा हो रहा है 

मिटा हूँ मुहब्बत में सो नाम मेरा 
जहाँ में मिसाल-ए-वफ़ा हो रहा है 

#अमित_अब्र
122     122    122   122




Tuesday, 4 February 2020

इश्क़ ज़बान-ए-ख़ुदा है यारों

इश्क़ ज़बान-ए-ख़ुदा है यारों
इश्क़ की राह वफ़ा है यारों 

फिर इश्क़ भी होगा आप ख़फ़ा 
गर हम-नफ़स ख़फ़ा है यारों

तब अश्क़ है इक पुर-दर्द आब
गर यार बे-वफ़ा है यारों 

नफ़रत भरे इस जहाँ की ख़ातिर 
फ़क़त इश्क़ ही भला है यारों 

गर हिज्र है तो होगा वस्ल भी 
ये इश्क़ का क़ायदा है यारों 

बाद हज़ारों कोशिश-ए-दुनिया 
हुस्न कब इश्क़ से जुदा है यारों 

दरिया-ए-दुनिया के भँवर का
बस ख़ुदा ही नाख़ुदा है यारों 

तन्हा समझ रहे हो जिसे, वो
उल्फ़त में गुम-शुदा है यारों 

जानिब-ए-ख़ुदा से इस ज़िन्दगी में 
एक मुहब्बत ही तयशुदा है यारों 

#अमित_अब्र


22       22        22      22=16






Saturday, 1 February 2020

ज़िन्दगी सफ़र तेरा मुश्किलों भरा क्यूँ है

ज़िन्दगी सफ़र तेरा मुश्किलों भरा क्यूँ है
रास्ते कठिन तो मंज़िल ख़फ़ा-ख़फ़ा क्यूँ है

राह पे वफ़ा की चलती रही हमेशा तू
ज़िन्दगी, मुहब्बत फ़िर तुझ से बे-वफ़ा क्यूँ है

याद-ए-यार ही क्या नासूर बन गई दिल में
ज़ख़्म पर हमारे अब बे-असर दवा क्यूँ है

बाद अब तुम्हारे मुफ़्लिस हुआ मुक़द्दर क्यूँ
बाद अब तुम्हारे ये ज़िन्दगी क़ज़ा क्यूँ है

रौशनी दिया तूने जान भी दिया लेकिन
ऐ दिये ! ख़िलाफ़ अब भी तेरे ये हवा क्यूँ है

क़ैद-ए-याद है या है मुंतज़िर किसी की तू
ज़ीस्त तुझ को तन्हाई का हुआ नशा क्यूँ है

बात कुछ तो तुझ में थी ज़िन्दगी, बता वर्ना
मौत, मौत पे तेरी आज ग़मज़दा क्यूँ है

ज़िन्दगी गुनहगारों में गिनी गई मेरी
ऐ ख़ुदा बता मुझ को इश्क़ याँ ख़ता क्यूँ है

छोड़ कर गये जब तुम तो वजह समझ आई
बाम-ओ-दर पे मायूसी, रंज में फ़ज़ा क्यूँ है

मौत की तमन्ना क्यूँ आरज़ू न जीने की
बाद अब तुम्हारे ये ज़िन्दगी सज़ा क्यूँ है

#अमित_अब्र

212     1222      212    1222