ज़िन्दगी सफ़र तेरा मुश्किलों भरा क्यूँ है
रास्ते कठिन तो मंज़िल ख़फ़ा-ख़फ़ा क्यूँ है
राह पे वफ़ा की चलती रही हमेशा तू
ज़िन्दगी, मुहब्बत फ़िर तुझ से बे-वफ़ा क्यूँ है
याद-ए-यार ही क्या नासूर बन गई दिल में
ज़ख़्म पर हमारे अब बे-असर दवा क्यूँ है
बाद अब तुम्हारे मुफ़्लिस हुआ मुक़द्दर क्यूँ
बाद अब तुम्हारे ये ज़िन्दगी क़ज़ा क्यूँ है
रौशनी दिया तूने जान भी दिया लेकिन
ऐ दिये ! ख़िलाफ़ अब भी तेरे ये हवा क्यूँ है
क़ैद-ए-याद है या है मुंतज़िर किसी की तू
ज़ीस्त तुझ को तन्हाई का हुआ नशा क्यूँ है
बात कुछ तो तुझ में थी ज़िन्दगी, बता वर्ना
मौत, मौत पे तेरी आज ग़मज़दा क्यूँ है
ज़िन्दगी गुनहगारों में गिनी गई मेरी
ऐ ख़ुदा बता मुझ को इश्क़ याँ ख़ता क्यूँ है
छोड़ कर गये जब तुम तो वजह समझ आई
बाम-ओ-दर पे मायूसी, रंज में फ़ज़ा क्यूँ है
मौत की तमन्ना क्यूँ आरज़ू न जीने की
बाद अब तुम्हारे ये ज़िन्दगी सज़ा क्यूँ है
#अमित_अब्र
212 1222 212 1222
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