हर इक दौर ज़िन्दगी में लाती है मुफ़्लिसी
हर इक रंग-ए-ज़िन्दगी दिखाती है मुफ़्लिसी
दिये बस्तियों के याँ बुझाती है मुफ़्लिसी
ढहे को फिर और भी ढहाती है मुफ़्लिसी
कभी बे-सबब तबाह करती ग़रीब को
कभी आदतन तबाही लाती है मुफ़्लिसी
कभी भूक में जले कभी धूप में जले
क़दम-दर-क़दम जिगर जलाती है मुफ़्लिसी
कहे आप मुफ़्लिसी का मारा किसी से क्या
कहे कुछ बग़ैर मार जाती है मुफ़्लिसी
जिला कर मुझे यहाँ जला कर मुझे यहाँ
मिरी ख़ाक ख़ाक में मिलाती है मुफ़्लिसी
सुकूँ है कहाँ समझ न आया मुझे मगर
अमीरी को देख मुस्कुराती है मुफ़्लिसी
जो दरिया-ए-बेबसी में डूबे वज़ूद तो
किनारे उमीद के डुबाती है मुफ़्लिसी
ख़ुदा मुफ़्लिसी मिटा या मुफ़्लिस को दे मिटा
किसी और को कहाँ सताती है मुफ़्लिसी
#अमित_अब्र