किस दुनिया में बसती बस्ती है
ग़म है फिर भी फ़ाक़ा-मस्ती है
जीने की ख़ातिर मुफ़्त में मरता
जाँ मुफ़्लिस की कितनी सस्ती है
लिबास हैं जिन के उजले-उजले
उन की काली वतन-परस्ती है
पत्थर दिल से उल्फ़त ठीक नहीं
फ़िराक़, अंजाम-ए-बुत-परस्ती है
नाम-ए-मजहब और सियासत में
चारों जानिब दराज़-दस्ती है
बातिल के आगे आज हुई फिर
मायूस सदाक़त की हस्ती है
उल्फ़त का परचम ऊँचा ही रहा
उल्फ़त में कब आई पस्ती है
उल्फ़त में कर तू यक़ीन जीत का
हासिल-ए-नफ़रत फ़क़त शिकस्ती है
#अमित_अब्र