तुम आये, चैन आया, पूरा जी का अरमान हुआ
नज़र नज़र में हुई गुफ़्तगू, सौदा दिल के दरम्यान हुआ
तुम क्या हो मेरी ख़ातिर, देखो मेरी नज़रों से
घर, आँगन, कूचा सारा तुम बिन है वीरान हुआ
तुम रूठे, जग रूठा, रूठे सूरज चाँद सितारे
रूठ गये रिश्ते सारे, मैं भी ख़ुद से अंजान हुआ
आबाद शहर वीरान हुआ, बस्ती भी सुनसान हुई
बाद तुम्हारे घर भी ये ख़ाली एक मकान हुआ
खाये पत्थर उन की ख़ातिर, पर उन से हम मिल न सके
ज़ख़्मी सारा जिस्म हुआ, दिल भी था बे-जान हुआ
तदबीर न कोई काम आई, आख़िर दोनों दूर हुए
दिल रोया तब, जब जारी हिजरत का फ़रमान हुआ
अदा से चलना, अदा से रुकना, संग में रक़्स-ए-अबरू
बिन ख़ंज़र क़ातिल मेरा महफ़िल का वो मेहमान हुआ
जाने क्या थी मजबूरी, बीच सफ़र वो छोड़ गया
उस बिन मेरी दुनिया बंजर, जीवन रेगिस्तान हुआ
#अमित_अब्र
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