Monday, 12 October 2020

ज़िन्दगी इक सवाल मुश्किल है

ज़िन्दगी इक सवाल मुश्किल है
दर्द की देख-भाल मुश्किल है 

फिर से महबूब लौट आयेगा 
फिर से होगा कमाल मुश्किल है

इश्क़ ग़मगीन है कि अब इस में
हिज्र आसाँ विसाल मुश्किल है 

हो गया दिल असीर-ए-उल्फ़त तो
दिल का होना बहाल मुश्किल है

हो न अपना ख़याल मुमकिन है
हो न उन का ख़याल मुश्किल है

आ गई जो उरूज पे इक बार
फिर अना का ज़वाल मुश्किल है

लाख कोशिश करूँ मगर मिलनी
मीर की अब मिसाल मुश्किल है

#अमित_अब्र 

कर गया हिज्र फ़ासला इतना
दिल-ए-नादाँ विसाल मुश्किल है 


Tuesday, 6 October 2020

मुश्किलों में बयान रहता है

मुश्किलों में बयान रहता है
सामने जब जहान रहता है

कब रहे तीर और कमाँ डर में
ख़ौफ़ में तो निशान रहता है

कब रही बर्क़-ए-आस्माँ डर में 
ख़ौफ़ में तो मकान रहता है

बेटियाँ जब बड़ी हो जाती हैं
ख़ौफ़ में ख़ानदान रहता है

बीच अमीरी ग़रीबी के मीज़ान
कब यहाँ पे समान रहता है

मुफ़्लिसी में क़दम क़दम पर याँ
इक कड़ा इम्तिहान रहता है

है उसी का ये आस्माँ सारा
हाथ जिस के कमान रहता है

होती है जब यहाँ ज़मीं बंजर
रंज में आसमान रहता है

पास आ कर भी उन से दूरी है
कौन इस दरमियान रहता है

इश्क़ पे है यक़ीं प दिल का क्या
दिल पर अब तो गुमान रहता है

#अमित_अब्र 

Tuesday, 22 September 2020

मुहब्बत का ज़माने में जुदा अंदाज़ रखना

मुहब्बत का ज़माने में जुदा अंदाज़ रखना
किसी भी हाल क़ाएम इश्क़ का ए'ज़ाज़ रखना

सितमगर के सितम सहना मगर उल्फ़त की ख़ातिर 
हमेशा दफ़्न सीने में सनम के राज़ रखना

फ़लक पे इश्क़ के क़ाएम रहे रुत्बा तुम्हारा
फ़लक पे इश्क़ के शाहीन सी परवाज़ रखना

जहाँ की चाह गर्दिश में रहे उल्फ़त हमेशा
पर उल्फ़त की जहाँ में तुम बुलन्द आवाज़ रखना

कटेगें पर हर इक कोशिश में ऐ शाहीन-ए-उल्फ़त 
मगर हर हाल जारी कोशिश-ए-परवाज़ रखना

शहीदान-ए-मुहब्बत भी करेंगे नाज़ तुम पर
लिहाज़-ए-इश्क़ की ख़ातिर दिल-ए-जाँ-बाज़ रखना

ज़माना लाख ना-ख़ुश हो मगर गर यार खुश तो
न भाये इश्क़ में फिर हाल-ए-दिल ना-साज़ रखना

मुहब्बत ख़ुश रहे हर हाल ज़िम्मा है तुम्हारा
नहीं अच्छा मुहब्बत को कभी नाराज़ रखना 

न तड़पे रूह मेरी बाद मेरे, इल्तिजा है
मैं मर जाऊँ तो ज़िन्दा तुम मिरे अल्फ़ाज़ रखना

#अमित_अब्र

Thursday, 6 August 2020

हर इक दौर ज़िन्दगी में लाती है मुफ़्लिसी

हर इक दौर ज़िन्दगी में लाती है मुफ़्लिसी
हर इक रंग-ए-ज़िन्दगी दिखाती है मुफ़्लिसी 

दिये बस्तियों के याँ बुझाती है मुफ़्लिसी
ढहे को फिर और भी ढहाती है मुफ़्लिसी

कभी बे-सबब तबाह करती ग़रीब को
कभी आदतन तबाही लाती है मुफ़्लिसी

कभी भूक में जले कभी धूप में जले
क़दम-दर-क़दम जिगर जलाती है मुफ़्लिसी

कहे आप मुफ़्लिसी का मारा किसी से क्या 
कहे कुछ बग़ैर मार जाती है मुफ़्लिसी

जिला कर मुझे यहाँ जला कर मुझे यहाँ
मिरी ख़ाक ख़ाक में मिलाती है मुफ़्लिसी

सुकूँ है कहाँ समझ न आया मुझे मगर
अमीरी को देख मुस्कुराती है मुफ़्लिसी

जो दरिया-ए-बेबसी में डूबे वज़ूद तो
किनारे उमीद के डुबाती है मुफ़्लिसी

ख़ुदा मुफ़्लिसी मिटा या मुफ़्लिस को दे मिटा
किसी और को कहाँ सताती है मुफ़्लिसी

#अमित_अब्र

Monday, 27 July 2020

जो तुम हो यहाँ तो यहाँ ज़िन्दगी है

जो तुम हो यहाँ तो यहाँ ज़िन्दगी है
तुम्हारे बिना फिर कहाँ ज़िन्दगी है

ब-दौलत तुम्हारे थी जीने की हिम्मत
तुम्हारे बिना ना-तवाँ ज़िन्दगी है

न पूछो मिरा हाल-ए-दिल बा'द उन के
ग़म-ए-हिज्र करती बयाँ ज़िन्दगी है

सुबह शाम दिन दोपहर इक ख़मोशी
हुई यार बिन बे-ज़बाँ ज़िन्दगी है

मुनाफ़े में थी ज़िन्दगी साथ तेरे
नहीं साथ तू तो ज़ियाँ ज़िन्दगी है

हुआ हासिल-ए-इश्क़ मुझ को कहूँ क्या
फ़क़त अब ग़मों में निहाँ ज़िन्दगी है

जिगर आप ख़ंडर हुआ बा'द तेरे
वीरानी भरा इक मकाँ ज़िन्दगी है

मुहब्बत अदावत बग़ावत अदालत
बस इन के रही दरमियाँ ज़िन्दगी है

फ़साने अलम के तो किरदार ग़मगीं
अज़ाबों की इक दास्ताँ ज़िन्दगी है

सफ़र एक है धूल का धूल में ये
ग़ुबारों का इक कारवाँ ज़िन्दगी है

गुज़रता हूँ यादों के सहरा से जब तो
बिना आग होती धुआँ ज़िन्दगी है

#अमित_अब्र

122  122  122  122

Saturday, 11 July 2020

हो मुक़ाबिल की मुहब्बत हो हक़ीक़त या कि ख़्वाबी

हो मुक़ाबिल की मुहब्बत हो हक़ीक़त या कि ख़्वाबी
हुस्न गर हो चाँद सा तो इश्क़ भी हो आफ़ताबी

फ़र्क रंगत में न कर तू तो ख़ुदा भी साथ होगा
रात से गर प्यार है तो यार होगा माहताबी 

अहल-ए-दुनिया की नज़र में एक मयख़ाना हुआ वो
नैन उस के हैं बनाए आज दुनिया को शराबी

तिश्नगी तेरी करेगी फ़ैसला इस बात का अब
आब हो जाएगा सहरा या रहेगा वो सराबी

दौर-ए-हाज़िर की तबाही का सबब है बद-गुमानी
यार ने तोड़ा भरोसा आई रिश्ते में ख़राबी

#अमित_अब्र

Saturday, 4 July 2020

मिसाल-ए-जमाल इक यहाँ रह रहा है

मिसाल-ए-जमाल इक यहाँ रह रहा है
मकाँ ज़ब्त का अब मिरा ढह रहा है

लबों से टपकते हैं अशआ'र उस के
हँसे भी तो मानो ग़ज़ल कह रहा है

रवानी अदाओं में लहरों के जैसी
चले वो तो मानो बहर बह रहा है

हसीं यार की हर अदा में उलझ कर
गहे दिल गहे जाँ जिगर गह रहा है

हुए क़ातिलाना जो अंदाज़ उस के  
सितम जाने कितने ये दिल सह रहा है

#अमित_अब्र 

रौशन हुआ फ़लक तो महकी हुई ज़मीं है

रौशन हुआ फ़लक तो महकी हुई ज़मीं है
मज़दूर ही के दम से दुनिया हुई हसीं है 

तब्दील कर रहा जो ज़ुल्मत को रौशनी में 
क़िस्मत उसी की देखो रौशन हुई नहीं है

हँसते मकान सारे मज़दूर की बदौलत 
मज़दूर की बदौलत मसरूर हर मकीं है

जलते हैं घर में चूल्हे रोटी तभी है पकती
जलती है जब कहीं पे मज़दूर की जबीं है

हर हाल हाल अपना रखता निहाँ वो सब से
किस बात की खुशी है किस बात की ग़मीं है

वादा किया अगर तो पूरा भी वो करेगा
मेहनत-कशी पे उस की पूरा मुझे यक़ीं है 

एहसास-ए-कमतरी क्यूँ मायूस को कराते
बँध कर न एक दर से कमियाँ सदा रहीं हैं

मरती है ख़ूबसूरत पे याँ तमाम दुनिया
जो है न ख़ूबसूरत वो किस का दिल-नशीं है

मज़दूर भी बनेगा इक दिन यहाँ पे मालिक
ईमान-ओ-सब्र का फल मिलता सदा यहीं है

सुन दास्तान उस की रोता जिगर है मेरा
परिवार है कहीं तो मज़दूर ख़ुद कहीं है

मज़दूर चलते चलते आ कर रुका जहाँ पे
तक़दीर-ए-मुल्क भी फिर आ कर रुकी वहीं है

#अमित_अब्र

Tuesday, 9 June 2020

कैसी हुई ख़ता किस नाराज़गी के मारे

कैसी हुई ख़ता किस नाराज़गी के मारे 
आते नहीं हैं क्यूँ वो आग़ोश में हमारे 

बेकार फिर हैं लगते दुनिया के सब सहारे
ऐ यार बा'द तेरे किस को ये दिल पुकारे

इक मौज-ए-वस्ल उठती दरिया-ए-दिल में मेरे
देखूँ कभी जो उन को दरिया के उस किनारे

हँसते हुए हमारे दर आते कभी थे जब तुम
हँसता जहान मेरा खिलते थे चाँद तारे

होते हो दूर तुम तो होती है बे-क़रारी
तुम ही बताओ कैसे दिल अपना दिन गुज़ारे

कहने को जी रहा हूँ इक ज़िन्दगी मुकम्मल 
पर है सफ़र अधूरा ऐ यार बिन तुम्हारे 

मैं चल रहा हूँ तन्हा रस्तों पे ज़िन्दगी के
बीते नहीं है शब दिन गुज़रे नहीं गुज़ारे

तुम ने किया अकेला तो सोचे दिल हमारा 
किस के लिए हम अपनी दुनिया जहान हारे

#अमित_अब्र

Saturday, 23 May 2020

मैं मैं न रहा

मैं मैं न रहा

उसे चाहा नहीं था मैंने
उसे पूजा था मैंने
कहते हैं इश्क़ को रब
सो की थी हम ने
बंदगी उस की
एहसास उसे जब हुआ
तो जगा गया 
इक उम्मीद 
और शुरू हुआ इक सिलसिला 
इंतिज़ार का जो चला मुद्दतों लेकिन 
फिर आई नज़र ना-उम्मीदी
और मार गई आधा मुझे
लेकिन इक भरोसा 
रब पे
बंदगी पे
अपनी चाहत की सदाक़त पे
सो रहा बरक़रार 
वो सिलसिला इंतिज़ार का 
और जारी रहा
और जारी ही रहा लेकिन 
ये पता भी न चला कि 
वो तवील इंतिज़ार 
कब मार गया पूरा मुझे 
और न बाक़ी रह गई थी 
कोई उम्मीद कोई इंतिज़ार 
फिर देखा जो ख़ुद को तो आया समझ
कि
मैं मैं न रहा
मैं मैं न रहा

#अमित_अब्र 

Monday, 11 May 2020

है इश्क़ इलाज-ए-नफ़रत दुनिया से फ़ाज़िल कहता है

है इश्क़ इलाज-ए-नफ़रत दुनिया से फ़ाज़िल कहता है
आसान नहीं पर ना-मुमकिन भी नहीं क़ाबिल कहता है 

राह-ए-मुहब्बत आसान नहीं इस मुश्किल दुनिया में 
दीवाने ही नहीं दीवानों का मुस्तकबिल कहता है 

मिलेगा चैन-ओ-सुकून तुम को आगोश में हमारे 
ग़मगीं मौज-ए-वफ़ा से उल्फ़त का साहिल कहता है

उल्फ़त में है तन्हाई रुस्वाई और जुदाई 
उल्फ़त के दीवानों से उल्फ़त का हासिल कहता है

मिट जायेगा नाम-ओ-निशान-ए-उल्फ़त लाख कहो पर
आबाद रहेगी दुनिया-ए-मुहब्बत दिल कहता है

#अमित_अब्र

22  22  22  22  22  22  22=28



Thursday, 2 April 2020

हर ओर अब सफ़र इक आसेब कर रहा है

हर ओर अब सफ़र इक आसेब कर रहा है
दुनिया सहम रही है इंसान डर रहा है

ख़ामोश आस्माँ तो, सहमी सी है ज़मीं ये
इक हश्र देख घर-घर, घर आज कर रहा है 

ऐसा क़हर है बरपा धरती पे आस्माँ से 
जिस सम्त देखिये सन्नाटा पसर रहा है 

बेख़ौफ़ है बला या है वक़्त आज बेबस 
आसेब जी रहा तो इंसान मर रहा है 

वीरानगी शहर में छाई वबा के चलते
सुनसान एक मेरे दीवार-ओ-दर रहा है 

ज़ुल्मत उरूज पर तो सूरज ज़वाल पर अब
बिन रौशनी के अब जी सारा शहर रहा है

क्या ख़ूब वक़्त ने याँ बदली है आज करवट
बे-ख़ौफ़ हैं परिन्दें, सय्याद डर रहा है

चुपचाप मौत आई जो राह-ए-ज़िन्दगी में 
धड़कन सिमट रही डर ज़ेहन में भर रहा है

क्या शाम क्या सहर क्या दिन रात दोपहर अब
ज़ुल्म-ए-वबा में सन्नाटा हर पहर रहा है 

सूने पड़े शहर हैं तूफ़ान में बला के 
उजड़ा हुआ चमन तो वीराँ शजर रहा है 

नाकाम हर शिफ़ा है बीमार पे उदासी 
मायूस हैं मरासिम ग़मगीन घर रहा है

नाकाम हर शिफ़ा तो बीमार पे उदासी 
मायूस हैं मरासिम हो यास घर रहा है

चारागरों की कोशिश बेकार हो रही है 
ख़ूँ-ख़ार वार हम पे आसेब कर रहा है 

#अमित_अब्र 

221  2122  221  2122

Tuesday, 17 March 2020

कहानी नही हूँ, तहरीर हूँ मैं

कहानी नही हूँ, तहरीर हूँ मैं 
शहर की मुकम्मल तस्वीर हूँ मैं

बयाँ कर रही है दीवार मुझ को
सुनो, पत्थरों की तक़रीर हूँ मैं

नज़र में मिरी अब हैं क़ैद आँसू
ग़म-ए-ज़िन्दगी की तफ़्सीर हूँ मैं

किया ज़ुल्मतों ने बे-नूर इतना 
शमा इक यहां बे-तनवीर* हूँ मैं 
(without light)

मेरी जिंदगी क्यूं ग़मगीन की है
ख़ुदा क्या तुम्हारी तक़्सीर* हूँ मैं 
(fault)

करो यूं न इतना बे-ज़ार मुझ को
किसी की खुशी की तदबीर हूँ मैं

बनाओ न मुझ को दीवार टूटी
सँवरते मकां की तक़दीर हूँ मैं

न कोई हुआ याँ मुझ से दुखी है 
मगर ग़र हुआ तो तकफ़ीर* हूँ मैं  
(who can be called काफ़िर)

मिटा दो मुझे ये कहकर शहर से
शहर मे शहर की तहक़ीर* हूँ मैं 
(insult)

रखे हो मुझे तुम महफ़ूज़ ऐसे 
लगे कोई हर्फ़-ए-तकबीर हूँ मैं
         
मेरी ये रिदा ही मेरा कफ़न है 
नही मुफ़्लिसी की तशहीर* हूँ मैं 
(publicity)

किसी के ग़मों ने ज़िन्दा रखा है 
किसी के अलम की तसख़ीर* हूँ मैं 
(जीत)

ग़ज़ल पाक है अब जिन आँसुओं से    
वही अश्क़, आब-ए-ततहीर* हूँ मैं 
(water of purification)

#अमित_अब्र

122  122  22  122

Friday, 6 March 2020

मालिक मिरे ! दिलों को बे-शर्त तू मिला दे

मालिक मिरे ! दिलों को बे-शर्त तू मिला दे
हैं दूरियाँ अगर तो, तू दूरियाँ मिटा दे 

नाकाम कर उन्हें रब, जो हैं हुए फ़सादी
हैं जो ख़िलाफ़-ए-ज़ुल्म, उन का हौसला बढ़ा दे

हो जाए ख़ाक जिस में, हर नफ़रत इस जहाँ की
भगवान् ! आग ऐसी दुनिया में तू जला दे

शाबाशियाँ उन्हें दे, जो लड़ रहे बला से 
रब ! जीत का उन्हें जज़्बा और तू ज़रा दे

क़ातिल हुई सियासत, सब जानते हैं लेकिन 
है कौन जो हुकूमत को, आज आइना दे

मैदान-ए-जंग-ए-उल्फ़त में, इश्क़ ही की ख़ातिर
तू बे-लहू बदन को, हिम्मत मिरे ख़ुदा दे

इंसान नेकियों से, फिर दूर हो रहा है 
करना दिलों को फिर से, तू नेकियाँ सिखा दे 

नादिम हुआ ख़ुदा है, इंसाँ की देख फ़ितरत 
कैसे बता हमें वो, खुशियों भरी दुआ दे

कश्ती फँसी भँवर में, नाराज़ नाख़ुदा है  
हो पार नाव मेरी, ठोकर ख़ुदा लगा दे

है आख़िरी तमन्ना, ऐ रब जहाँ की ख़ातिर 
कर रौशनी दिलों में, सब नफ़रतें बुझा दे

बेख़ौफ़ चल रहा हूँ, ले कर मशाल-ए-उल्फ़त
रब आज राह-ए-उल्फ़त में, दीप तू जला दे

#अमित_अब्र 

221  2122  221  2122








Monday, 2 March 2020

इक आग उठ रही है, सब ख़ाक हो रहा है

इक आग उठ रही है, सब ख़ाक हो रहा है
जागी हुई बला है, इंसान सो रहा है

कोई मुझे बता दे, है कौन जो दिलों में 
नफ़रत सहित अदावत के बीज बो रहा है 

हैं बा-वज़ूद उस के जारी यहाँ पे फ़ित्ने
नाकाम देख ख़ुद को आईन रो रहा है

क्यूँ फिर रहे हैं बातिल, बेख़ौफ़ इस शहर में 
क्यूँ जीत झूट की, क्यूँ सच का यक़ीन खो रहा है

है काम ये ख़ुदा का जो काम कर रहा हूँ 
रब आज ज़ालिमों के इल्ज़ाम ढो रहा है

फ़ित्ने हुए सियासी पर नाम रब का आया 
बदनाम नाम-ए-मजहब यूँ आज हो रहा है

गुल क़त्ल हो रहे तो गुलशन सना लहू में  
कोई दिल-ए-फ़ज़ा में ख़ंज़र चुभो रहा है  

सोचा नहीं कभी पर किरदार-ए-उंस ही अब
धागे में इश्क़ के याँ नफ़रत पिरो रहा है 

बिखरे हुए लहू का है ख़ौफ़ हर दिशा में 
है कौन जो वतन को ख़ूँ में डुबो रहा है 

ख़ामोश है यहाँ जो, इंसाफ़ की सदा पे
मेरी नज़र में क़ातिल वो शख़्स हो रहा है

#अमित_अब्र 

221  2122  221  2122

Monday, 10 February 2020

रंग-ए-शफ़क़ वो, वो शाम का आफ़ताब लगता है

रंग-ए-शफ़क़ वो, वो शाम का आफ़ताब लगता है
सितारों भरी रात में खिला माहताब लगता है 

रंग-ए-शफ़क़ = शाम की लालिमा का रंग
आफ़ताब =सूरज 
माहताब =चाँद


दुनिया के गुलशन में वो भरता है रंग इस क़दर
कभी मुसव्विर-ए-जहाँ, कभी सुर्ख़ाब लगता है

मुसव्विर-ए-जहाँ =painter of world
सुर्ख़ाब = a colorful bird


जुल्फ़ घटा तो झील आँखें हैं रुख़्सार गुलाबी
अदाओं से तो अपनी वो लाजवाब लगता है

रुख़्सार = cheek


पाकर एक नज़र उस की इश्क़ डूब है जाता
दरिया-ए-इश्क़ में वो हुस्न का गिर्दाब लगता है 

गिर्दाब = भँवर


यूँ तो हसीं बहुत हैं दुनिया में यारों लेकिन 
यार हमारा आप हसीनों का ख़्वाब लगता है

पड़ते हैं अंजुमन में जब जब हसीं क़दम उन के
मंज़र-ए-महफ़िल तब तब दिलकश-ओ-नायाब लगता है 

अंजुमन =महफ़िल 
नायाब = rare


तस्वीर-ए-यार देखूँ जो सुर्ख़ जोड़े में तो फिर 
दिल-ए-नादाँ बे-बस-ओ-बे-क़रार-ओ-बे-ताब लगता है 


#अमित_अब्र

22      22          22  22         22   22       2

Thursday, 6 February 2020

मुहब्बत में दिल ग़म-ज़दा हो रहा है

मुहब्बत में दिल ग़म-ज़दा हो रहा है
मिरा यार मुझ से जुदा हो रहा है

सज़ा-ए-मुहब्बत हुई फिर मुक़र्रर
यही काम याँ तयशुदा हो रहा है 

तमन्ना-ए-उल्फ़त उठे दिल में कैसे 
सनम ही मिरा जब ख़फ़ा हो रहा है 

अब उस से मुलाक़ात मुमकिन हो कैसे 
मुहब्बत में जब वो ख़ुदा हो रहा है 

नुमायाँ भले हूँ ज़माने को लेकिन 
दिल उल्फ़त में अब गुम-शुदा हो रहा है 

मुझे देख कर भी नहीं देखता जो
वही शख़्स याँ क्यूँ मिरा हो रहा है 

मुक़द्दर में था या ख़ता कुछ हुई थी
ग़म उल्फ़त की क्यूँ इब़्तिदा हो रहा है

जिसे तू नहीं जानता है मिरे दिल
बता क्यूँ उसी पे फ़िदा हो रहा है 

मिटा हूँ मुहब्बत में सो नाम मेरा 
जहाँ में मिसाल-ए-वफ़ा हो रहा है 

#अमित_अब्र
122     122    122   122




Tuesday, 4 February 2020

इश्क़ ज़बान-ए-ख़ुदा है यारों

इश्क़ ज़बान-ए-ख़ुदा है यारों
इश्क़ की राह वफ़ा है यारों 

फिर इश्क़ भी होगा आप ख़फ़ा 
गर हम-नफ़स ख़फ़ा है यारों

तब अश्क़ है इक पुर-दर्द आब
गर यार बे-वफ़ा है यारों 

नफ़रत भरे इस जहाँ की ख़ातिर 
फ़क़त इश्क़ ही भला है यारों 

गर हिज्र है तो होगा वस्ल भी 
ये इश्क़ का क़ायदा है यारों 

बाद हज़ारों कोशिश-ए-दुनिया 
हुस्न कब इश्क़ से जुदा है यारों 

दरिया-ए-दुनिया के भँवर का
बस ख़ुदा ही नाख़ुदा है यारों 

तन्हा समझ रहे हो जिसे, वो
उल्फ़त में गुम-शुदा है यारों 

जानिब-ए-ख़ुदा से इस ज़िन्दगी में 
एक मुहब्बत ही तयशुदा है यारों 

#अमित_अब्र


22       22        22      22=16






Saturday, 1 February 2020

ज़िन्दगी सफ़र तेरा मुश्किलों भरा क्यूँ है

ज़िन्दगी सफ़र तेरा मुश्किलों भरा क्यूँ है
रास्ते कठिन तो मंज़िल ख़फ़ा-ख़फ़ा क्यूँ है

राह पे वफ़ा की चलती रही हमेशा तू
ज़िन्दगी, मुहब्बत फ़िर तुझ से बे-वफ़ा क्यूँ है

याद-ए-यार ही क्या नासूर बन गई दिल में
ज़ख़्म पर हमारे अब बे-असर दवा क्यूँ है

बाद अब तुम्हारे मुफ़्लिस हुआ मुक़द्दर क्यूँ
बाद अब तुम्हारे ये ज़िन्दगी क़ज़ा क्यूँ है

रौशनी दिया तूने जान भी दिया लेकिन
ऐ दिये ! ख़िलाफ़ अब भी तेरे ये हवा क्यूँ है

क़ैद-ए-याद है या है मुंतज़िर किसी की तू
ज़ीस्त तुझ को तन्हाई का हुआ नशा क्यूँ है

बात कुछ तो तुझ में थी ज़िन्दगी, बता वर्ना
मौत, मौत पे तेरी आज ग़मज़दा क्यूँ है

ज़िन्दगी गुनहगारों में गिनी गई मेरी
ऐ ख़ुदा बता मुझ को इश्क़ याँ ख़ता क्यूँ है

छोड़ कर गये जब तुम तो वजह समझ आई
बाम-ओ-दर पे मायूसी, रंज में फ़ज़ा क्यूँ है

मौत की तमन्ना क्यूँ आरज़ू न जीने की
बाद अब तुम्हारे ये ज़िन्दगी सज़ा क्यूँ है

#अमित_अब्र

212     1222      212    1222



Friday, 17 January 2020

इश्क़ उल्फ़त भरी इक नज़र है मियाँ

इश्क़ उल्फ़त भरी इक नज़र है मियाँ
इश्क़ उन की अदा का क़हर है मियाँ

मो'जज़ा कुछ नहीं, बात इतनी सी है
इश्क़ उन की नज़र का असर है मियाँ

क्या सुबह शाम क्या रात दिन दोपहर
याँ सफ़र इश्क़ का हर पहर है मियाँ

वस्ल या हिज्र या इक सफ़र रेत का
इश्क़ ग़म या ख़ुशी या शरर है मियाँ

मौत से रू-ब-रू होती है ज़िन्दगी
इश्क़ तो मौत से बे-ख़बर है मियाँ

ज़ुल्म के बीच जारी रहा इश्क़ है
इश्क़ पे ज़ुल्म याँ बे-असर है मियाँ

राह पे इश्क़ की चलना ही इश्क़ है
इश्क़ मंज़िल नहीं है, सफ़र है मियाँ

#अमित_अब्र
212       212    212     212 




Wednesday, 15 January 2020

दिलबर की याद में बे-चैन मेरा दिल है

दिलबर की याद में बे-चैन मेरा दिल है
सज़ा-ए-उल्फ़त है या वफ़ा का हासिल है

डूबे तो ठीक थे, निकले तो जल उठे हैं
दरिया-ए-इश्क़ का आतिश-मिज़ाज साहिल है

उल्फ़त की दास्ताँ सुन आया यक़ीन ये
राह-ए-मुहब्बत दिलबर बग़ैर मुश्किल है

नज़र-अंदाज़ हुआ जो निगाह-ए-यार से, तो
दुुनिया ही नहीं, दिल आप से भी ग़ाफ़िल है

मुजरिम बता दिया है क्या यार ने मुझे      
जो नाम पे मेरे बे-ज़ुबान महफ़िल है

सहरा से जो गुज़रे तो ख़याल-ए-क़ैस आया
उस दिल-ए-बिस्मिल का दिल आज भी क़ाइल है

बरसों रहा सफ़र में कौन उस की ख़ातिर
मिलने को आज उस से बे-क़रार मंज़िल है

#अमित_अब्र

22   22    22    22     22    2=22

    

Wednesday, 8 January 2020

हो तुम तो दुनिया की शान-ओ-मान है मुहब्बत

हो तुम तो दुनिया की शान-ओ-मान है मुहब्बत 
जो तुम नहीं तो बिस्मिल-ओ-बे-जान है मुहब्बत

वो जाँ-ब-लब था लेकिन आया सदा पे मेरी
कैसे कहूँ ख़ुदा ना-फ़रमान है मुहब्बत

बन्द करूँ आँखें तो उभरता है अक्स-ए-यार 
ख़्वाबों पे मेरे मेहरबान है मुहब्बत

आना शब के किसी पहर था प शब गुज़र गई है
क्या हुआ, इस बात से परेशान है मुहब्बत

जी उट्ठे फिर से हम मिलने के बा'द उन से
कैसे कहें बताओ बे-जान है मुहब्बत 

आग पे पड़े है चलना दौरान-ए-सफ़र-ए-इश्क़ 
आग पे चलने का इक फ़रमान है मुहब्बत 

नफ़रत भरी दिलों में, है उल्फ़त फ़क़त लबों पे 
इस हाल-ए-मुहब्बत पे पशेमान है मुहब्बत 

नाराज़गी से तेरे है दिल में बयाबानी
बिना तबस्सुम तेरे बयाबान है मुहब्बत 

नफ़रत की तेग़ से घायल हुआ है, फिर भी
उस बिस्मिल के जी का अरमान है मुहब्बत 

ख़ंज़र उतर रहा है सीने में बदले उल्फ़त 
मंज़र ये देख कर लहू-लुहान है मुहब्बत 

बिना तुम्हारे मानो रंजीदा शायर के
ग़मगीं ग़ज़लों का इक दीवान है मुहब्बत

चराग़-ए-दिल की हो गयी है लौ जो थोड़ी धीमी 
तो हो गई बहुत ही हलकान है मुहब्बत 
 
आवाज़ ही न दी उल्फ़त को दिल ने वर्ना 
इस दिल की सदा से कब अंजान है मुहब्बत 

पर्वा न कर किसी की कर तू यक़ीं कि हम पे 
उस रब का ख़ूबसूरत एहसान है मुहब्बत 

#अमित_अब्र

22   22   22   22   22   22  


Sunday, 5 January 2020

कर के रुस्वा मुझ को, वो भी पछताया होगा

कर के रुस्वा मुझ को, वो भी पछताया होगा
छुप कर ही सही, जनाज़े में मिरे आया होगा 

आया होगा ज़िक्र मिरा, जब ज़िक्र-ए-मुहब्बत में
हाल-ए-दिल अपना वो, ब-मुश्किल सब से छुपाया होगा

दूर हुए जो दस्तूर-ए-दुनिया की ब-दौलत हम
फिर नींद न आई हम को, वो भी न सो पाया होगा

हो के ग़ैर का तस्वीर हमारी जलायी होगी
यादों से मगर अपनी हम को न भुलाया होगा

ख़्वाब तो आते होंगे मेरे अक्सर उस को
ताबीरों ने भी पता मेरा उस को बताया होगा

अर्ज़-ए-दुनिया पे मुहब्बत के लिए, वो हिज्र में भी
दर्द भरे दिल से, गीत उल्फ़त के गाया होगा

गुज़र गया होगा दर्द-ए-दिल, जब हद से अपने
फिर दिल, हाल-ए-दिल पे अपने मुस्काया होगा

#अमित_अब्र

22          22      22      22   22    22  2 =26