मुश्किलों में बयान रहता है
सामने जब जहान रहता है
कब रहे तीर और कमाँ डर में
ख़ौफ़ में तो निशान रहता है
कब रही बर्क़-ए-आस्माँ डर में
ख़ौफ़ में तो मकान रहता है
बेटियाँ जब बड़ी हो जाती हैं
ख़ौफ़ में ख़ानदान रहता है
बीच अमीरी ग़रीबी के मीज़ान
कब यहाँ पे समान रहता है
मुफ़्लिसी में क़दम क़दम पर याँ
इक कड़ा इम्तिहान रहता है
है उसी का ये आस्माँ सारा
हाथ जिस के कमान रहता है
होती है जब यहाँ ज़मीं बंजर
रंज में आसमान रहता है
पास आ कर भी उन से दूरी है
कौन इस दरमियान रहता है
इश्क़ पे है यक़ीं प दिल का क्या
दिल पर अब तो गुमान रहता है
#अमित_अब्र
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