Friday, 25 May 2018

दिये पे वो अपना असर चाहता है

दिये पे वो अपना असर चाहता है
अँधेरा मिरे घर बसर चाहता है

रहे रात ही रात क़ायम ज़मीं पे
सितमगर फ़लक बे-सहर चाहता हैै

ख़िज़ाँ चाहती है गुलों पे हुकूमत
बयाबाँ शजर बे-समर चाहता है

सियासत की साज़िश में दुनिया है उलझी
यहाँ कौन किस की ख़बर चाहता है

फ़सादात दैर-ओ-हरम के शहर में
लहू फिर से शायद शहर चाहता है

उदासी भरा एक चेहरा नही कुछ
मुहब्बत भरी इक नज़र चाहता है

#अमित_अब्र


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