दिये पे वो अपना असर चाहता है
अँधेरा मिरे घर बसर चाहता है
रहे रात ही रात क़ायम ज़मीं पे
सितमगर फ़लक बे-सहर चाहता हैै
ख़िज़ाँ चाहती है गुलों पे हुकूमत
बयाबाँ शजर बे-समर चाहता है
सियासत की साज़िश में दुनिया है उलझी
यहाँ कौन किस की ख़बर चाहता है
फ़सादात दैर-ओ-हरम के शहर में
लहू फिर से शायद शहर चाहता है
उदासी भरा एक चेहरा नही कुछ
मुहब्बत भरी इक नज़र चाहता है
#अमित_अब्र
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