Wednesday, 30 June 2021

दिलबर की जफ़ाओं से परेशान हुआ इश्क़

दिलबर की जफ़ाओं से परेशान हुआ इश्क़
तौहीन-ए-वफ़ा देख पशेमान हुआ इश्क़ 

माँगी थी शब-ए-वस्ल मिली शाम-ए-जुदाई
इस फ़ितरत-ए-माशूक़ से हैरान हुआ इश्क़ 

जाते हो किधर राह-ए-मुहब्बत के सिवा आप 
इस सर्द रवैये से तो बे-जान हुआ इश्क़ 

क्या हाल सुनायें दिल-ए-बिस्मिल का किसी को 
कब इस दिल-ए-बिस्मिल पे मेहरबान हुआ इश्क 

पल भर की ख़ुशी पा के मिले ग़म के ज़माने 
पल भर के लिए ही मिरा मेहमान हुआ इश्क़ 

-अमित सिंह

221 1221 1221 122+1

हमारे नाम पर होना अभी कोहराम बाक़ी है

हमारे नाम पर होना अभी कोहराम बाक़ी है
ज़माने में हमें होना अभी बदनाम बाक़ी है


ख़ता जो की नहीं हम ने कभी भी भूल कर यारों
हमारे नाम पर लगना वही इल्ज़ाम बाक़ी है


वफ़ा मक़्दूर तक तो की मगर महरूम है उस से
मुहब्बत के जहाँ में इक दिल-ए-ना-काम बाक़ी है


मुहब्बत की मसाफ़त में मराहिल आज मक़्तल हैं
वफ़ादारी के बदले मौत का ईनाम बाक़ी है


डुबोया शाम ने हर रोज़ सूरज को समंदर में
सितारों तक पहुँचना शाम का पैग़ाम बाक़ी है


बहुत बेज़ार गुज़रे दिन, बहुत बेज़ार गुज़री शब
गुज़रती ज़िन्दगी में ज़िन्दगी की शाम बाक़ी है


मिटाया वक़्त ने मुझ को मगर ज़ाहिर अभी भी हूँ
अभी कुछ और भी शायद मिरा अंजाम बाक़ी है


#अमित_अब्र


1222  1222  1222  1222

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मक़्दूर=सामर्थ्य, शक्ति,
मराहिल=मंज़िलें,
मक़तल=जहाँ फाँसी दी जाती है,
बेज़ार=नाराज़,
शब=रात,

Sunday, 27 June 2021

क़दम दर क़दम है क़यामत फ़ज़ा में

क़दम दर क़दम है क़यामत फ़ज़ा में 
बला इक घुली है हवा बन हवा में  

नज़र भी कहीं क़ातिल आता नहीं है
जहाँ जल रहा आज कैसी जफ़ा में 

बला कर रही है ज़माने को ख़ंडर
शहर हो गया है बयाबाँ बला में 

तबाही है यूँ कि पता भी नहीं है 
न जाने गई जान कितनी वबा में 

जो ग़ाफ़िल हो उस से तो है मौत निश्चित 
बला का है अंदाज़ उस की अदा में 

ख़ुदा बेख़बर या कि भगवान् रूठा
असर क्यूँ न आया वबा की शिफ़ा में 

बने जान पर तो कर अपनी हिफ़ाज़त 
उलझ मत सियासत के तू मुद्दआ में 

अगर साँस लूँ तो रही रुक ये धड़कन   
घुली मौत है आज मानो सबा में 

हैं दर बन्द सारे हुए क्यूँ ख़ुदा के
असर अब न बाक़ी रहा क्या दुआ में 

न हो ठीक घर आज लौटे अगरचे 
कसर इक न छोड़ी इलाज-ओ-दवा में 

मुहब्बत भी बीमार पे बेअसर है
कमी रह गई कोई शायद वफ़ा में 

हुई पस्त चारागरी आज मेरी
बला ऐसी गर्दिश करे है फ़ज़ा में 

जो है वक़्त-ए-मुश्किल तो कर तू यक़ीं फिर 
शिफ़ा में दवा में दुआ में ख़ुदा में 

#अमित_अब्र

122  122  122  122  

Monday, 7 June 2021

पूछिये 'अब्र' से कि क्या है इश्क़

पूछिये 'अब्र' से कि क्या है इश्क़ 

दिल-ए-बीमार की शिफ़ा है इश्क़ 


मसअला देखने में है लेकिन 

ख़ूबसूरत मुआमला है इश्क़ 


और ज़्यादा दलील क्या दें हम

दिल-ए-आशिक़ का मुद्दआ है इश्क़


हार कर भी न हारती उल्फ़त 

एक हारे का हौसला है इश्क़ 


अर्श से फ़र्श तक हुआ ज़ाहिर 

रब के मानिन्द याँ रहा है इश्क़


#अमित_अब्र