Friday, 15 November 2019

बाद तुम्हारे मेरी कहानी

बाद तुम्हारे मेरी कहानी 
प्यासा सहरा और वीरानी

उल्फ़त की है यही निशानी
माँगें तुम से हर क़ुर्बानी
 
उन बिन बस है ग़म और अज़ाब  
उन बिन है ग़मगीन जवानी 

रक़ीब हुआ है मुंसिफ़ सो अब  
उल्फ़त चाहत सब बे-मा'नी

भँवर में आई कश्ती मेरी
दरिया ने जब की मनमानी 

है मंज़िल राह-ए-मुहब्बत की
ऊँचा कोह* या गहरा पानी

*पर्वत 

उल्फ़त को तुम सहल न जानो
एक सफ़र ये रेगिस्तानी

 
#अमित_अब्र 

22    22    22     22


Thursday, 14 November 2019

उल्फ़त में उल्फ़त की ख़ातिर उल्फ़त पे हम ने वारी दुनिया

उल्फ़त में उल्फ़त की ख़ातिर उल्फ़त पे हम ने वारी दुनिया
हासिल उल्फ़त हुई नहीं भूल गई हम को सारी दुनिया

तेरी ख़ातिर दुनिया छोड़ी पर साथ तुम्हारा पा न सके
कूचे में तेरे सो हम ने तन्हा आज गुज़ारी दुनिया

रौशन दिल था, रौशन थी दुनिया भी लेकिन बाद तुम्हारे
आयी दिल में वीरानी और बिखर गई हमारी दुनिया

दीदार-ए-यार हुआ नहीं तो थे चश्म-ए-तर जब लौटे दर से
आज़ार-ए-ग़म-ए-फ़ुर्क़त से हो गई दिल की मेरे भारी दुनिया

अपनों ने छोड़ा तनहा आई जब है मुश्किल जीवन में
गिला करे क्या ग़ैरों की जब अपनों से ही हारी दुनिया

झूट की फ़ितरत, नफ़रत और अदावत दुनिया की तक़दीर हुए
इस दौर-ए-रंजिश में आज हुई रंज-ओ-ग़म की मारी दुनिया

ईमान, मुहब्बत,इमदाद की आदत, क्यूँ हो इन से दूर हुए
ये ही ख़ू* तेरे तो दुनिया को बनाते हैं प्यारी दुनिया

*आदत


बर्बाद किये क्यूँ दुनिया को हो तुम नाम-ए-मजहब में जब कि

नाम-ए-मजहब में ही ख़ुद तुम ने थी कभी सँवारी दुनिया


#अमित_अब्र


Sunday, 10 November 2019

मेरी मुहब्बत

मेरी मुहब्बत 
एक हक़ीक़त 

उनकी उल्फ़त 
बस एक फ़ितरत

सच्ची उल्फ़त 
मेरी चाहत 

मेरी हसरत
अच्छी सोहबत  

आज मुहब्बत 
एक बग़ावत

गुल-ए-मुहब्बत 
माँगे हिफ़ाज़त

कह न सदाक़त
बिना इजाज़त

हमारी हिम्मत 
वतन की ताकत 

बला-ओ-आफ़त
अना की आदत

दिलों की नफ़रत 
वजह-ए-अदावत

ग़ज़ल की रंगत 
रंग-ए-उल्फ़त 

#अमित_अब्र 



आज मुहब्बत 
एक बग़ावत

कह न सदाकत
बिना इजाज़त

मेरी मुहब्बत 
एक हक़ीक़त 

उल्फ़त उनकी
बस इक फ़ितरत

चाहत मेरी
सच्ची उल्फ़त 

हसरत मेरी
अच्छी सोहबत  

उल्फ़त के गुल 
माँगें हिफ़ाज़त 

हिम्मत हमारी  
वतन की ताकत 

आदत अना की 
बला-ओ-आफ़त

नफ़रत दिलों की  
वजह-ए-अदावत

रंगत ग़ज़ल की  
रंग-ए-उल्फ़त

#अमित_अब्र

Friday, 8 November 2019

क़ैद-ए-बे-हुनर से कब आज़ाद हुनरमंद हुए

क़ैद-ए-बे-हुनर से कब आज़ाद हुनरमंद हुए
हो कर हुनरमंद कब आबाद हुनरमंद हुए

कभी न उन को रास आई दुनिया उल्फ़त की
इश्क़ में पड़ अक्सर बरबाद हुनरमंद हुए 

सरमाये की हुकूमत से ना-शाद हुनर है 
सरमाये से न कभी शाद हुनरमंद हुए 

पड़ी ज़रूरत जब जारी उन की ख़ोज हुई 
बे-सबब कहाँ किसी को याद हुनरमंद हुए 

उन को भूले हम जिन का काम, काम आया
रुस्वा-ए-हुनर से ना-शाद हुनरमंद हुए 

क़ैद-ए-ताइर ख़ातिर बदले सारे पैंतरे 
सीख नये हुनर अब सय्याद हुनरमंद हुए 

जब भी यहाँ फ़साद हुए दुनिया ये तक्सीम हुई
तोड़ने में राब्ता फ़साद हुनरमंद हुए 

खिला न पाये हम उल्फ़त का गुल एक यहाँ 
इतना नफ़रतों के उस्ताद हुनरमंद हुए 

दर्द ख़रीदे है हुकूमत, वास्ते हुकूमत के
हैं आज सियासी इमदाद हुनरमंद हुए

आख़िर फ़रियाद ने दिलाई क़ैद से रिहाई 
आख़िर में हासिल-ए-फ़रियाद हुनरमंद हुए 

बचाने में निशानी आज ज़मीदोज़ मकाँ की
अक्सर हैं संग-ए-बुनियाद हुनरमंद हुए 

फिर भी सँभाल लेते हैं ख़ुद को फ़िराक़ में वो
पीने में अश्क़ दिल-ए-नाशाद हुनरमंद हुए  


#अमित_अब्र