Tuesday, 31 August 2021

तीरगी है, रात है, महताब काले माह में है

तीरगी है, रात है, महताब काले माह में है
ज़िन्दगी तेरा सफ़र अब इक अँधेरी राह में है

ज़िन्दगी किस को सुनाऊँ आज मैं अफ़्साना तेरा
ज़िन्दगी तू ही बता अब कौन तेरी चाह में है 

सर झुकाए जो रही मक़्तल में उस के सामने तू  
ज़िन्दगी, क़ातिल तिरा सो आज सज्दा-गाह में है 

हाल-ए-दिल अब क्या सुनायें इस ज़माने को मिरे दिल 
शेर मेरा जब नहीं इन महफ़िलों की वाह में है

ऐ मुहब्बत थी तिरे ही नाम की इक आरज़ू सो
नाम-ए-उल्फ़त दिल में है तो नाम-ए-दिलबर आह में है 

ख़्वाब में दिल-ख़्वाह के तस्वीर मेरी कैसे उभरे
ग़ैर का चेहरा ही अब जब चाहत-ए-दिल-ख़्वाह में है 
 
आज आये जो नज़र वो ग़ैर की आग़ोश में तो
आज मेरी ही तबाही की ख़बर अफ़्वाह में है

#अमित_अब्र








Monday, 16 August 2021

मुश्किल सफ़र हमारा आसान हो रहा है

मुश्किल सफ़र हमारा आसान हो रहा है
मंज़िल भी आएगी इत्मीनान हो रहा है

हर-सू मिली सफ़र में ख़ाक-ए-वतन की ख़ुश्बू
गर्द-ओ-ग़ुबार भी सो जी-जान हो रहा है

कल तक था जो मुक़य्यद घर में किसी की ख़ातिर
आँगन का आज मेरे सामान हो रहा है

मुतलक़ हुई है पूरी ख़्वाहिश हमारे दिल की
आबाद मेरे जी का अरमान हो रहा है

करने को अब मुकम्मल हर ख़्वाब ज़िन्दगी के
ता'मीर इक नया हिन्दुस्तान हो रहा है

#अमित_अब्र


221  2122  221  2122

Friday, 13 August 2021

दिल को फिर आराम आया जब इश्क़ से हम आज़ाद हुए

दिल को फिर आराम आया जब इश्क़ से हम आज़ाद हुए
उल्फ़त ने बरबाद किया बिन उल्फ़त आबाद हुए

रो रो सारी रात कटी ग़म में सारा दिन गुज़रा
गई जो बीमारी-ए-दिल अय्याम हमारे शाद हुए 

दिल का कहना माना फिर, फिर से राह-ए-मुहब्बत ली
उल्फ़त ने थोड़ा ही किया बाक़ी ख़ुद बरबाद हुए

रुख़सत मेरे दर से हुआ था हँस कर केवल वो लेकिन
जाने कितने फ़ित्ने घर में फिर थे उस के बा'द हुए 

इस दुनिया से था सब कुछ मेरा मेरे साथ गया 
एक दफ़ा जो याँ से गये फिर किस को हम याद हुए

मंज़िल उस को थी हासिल चलना जिसने जारी रक्खा
सफ़र अधूरा जो छोड़े बा'द में वो ना-शाद हुए

जिस्म जलाकर हम ने अपने जला दिये अँधियारे  
तोड़ असीरी ज़ुल्मत की ज़ुल्मत से आज़ाद हुए

बात हक़ीक़त की जो की दुनिया फिर नाराज़ हुई 
मुझे मिटाने को नायाब तरीक़े ईजाद हुए

राह-ए-नफ़रत में इक मक़्तल हो गई दुनिया सारी
इंसाँ ही इंसाँ के हैं अब क़ातिल-ओ-सय्याद हुए

दीवानों ने जुनूँ दिखा कर, फिर था इश्क़ जताया
शीरीं की ख़ातिर फिर, पर्वत काटा फ़रहाद हुए

कैसा काबा और कलीसा, कैसे दैर-ओ-हरम फिर 
जब दिल में उन के न उतरे तो बे-जाँ सब फ़रियाद हुए

भूले हँसना हम जो हँस कर कूचे से वो गुज़रा
दिल उलझा जब दिल से, 'अब्र' अपना आप फ़साद हुए

#अमित_अब्र

Thursday, 12 August 2021

फ़ज़ा अब खूबसूरत है कि दर पे यार आया है


फ़ज़ा अब ख़ूबसूरत है कि दर पे यार आया है
मुहब्बत रंग लायी है, दीवाना मुस्कुराया है


फ़लक पर चाँद आया तो, ज़मीं ज़ौ में नहायी थी
तुम्हारा इश्क़ हर जानिब यहाँ इक नूर लाया है


ज़रूरत चाँद को क्या रौशनी की अब रही जानाँ
तुम्हारी रौशनी में चाँद जब ख़ुद ही नहाया है


ज़माना फिर परेशाँ है तुम्हारी रौशनी से क्यूँ
कहीं क्या फिर किसी ने इस से अपना घर जलाया है


अँधेरा ख़ुद ही नाज़िल है फ़लक पर आज या फिर से
तुम्हारी रेशमी ज़ुल्फ़ों ने सूरज को छुपाया है


शराबी से हुए हैं क्यूँ शहर के आज मयखाने
तुम्हारी आँख ने क्या जाम इन सब को पिलाया है


जहाँ को क्या ज़रूरत अब किसी इक और तूफ़ाँ की
अदाओं ने तुम्हारी जब सितम हर ओर ढाया है


बड़ी मग़रूर ख़्वाहिश हो किसी मशहूर शायर की
तुम्हारा ज़िक्र उसकी हर ग़ज़ल में यूँ समाया है


ढली है शाम लेकिन क्यूँ अँधेरा दूर है तुम से
तुम्हारी रौशनी ने क्या अँधेरे को बुझाया है


मुकम्मल हो गई ये ज़िन्दगी जो यार घर आया
उतरकर आसमाँ से चाँद मेरे बाम छाया है


यही आवाज़ आई है सदा दुनिया-ए-माजी से
मुहब्बत ने अदावत को मुहब्बत से मिटाया है


#अमित_अब्र


1222  1222  1222  1222

Monday, 2 August 2021

किसी की याद को अब भूल जाना चाहता हूँ मैं

किसी की याद को अब भूल जाना चाहता हूँ मैं

किसी तूफ़ान को अब याद आना चाहता हूँ मैं


पुरानी इक हक़ीक़त अब मुझे जीने नहीं देती

किसी की याद में ख़ुद को मिटाना चाहता हूँ मैं


जलाया है मिरे दिल ने मुझे नाम-ए-मुहब्बत में 

उसे ख़ाक-ए-मुहब्बत में मिलाना चाहता हूँ मैं


रिहाई मौत देती है क़फ़स में ज़िन्दगी गर है 

मुक़द्दस मौत को सो आज़माना चाहता हूँ मैं


जलाता हूँ डुबाता हूँ जिगर अब जो मुहब्बत में

समंदर और सूरज सा फ़साना चाहता हूँ मैं


मुझे काफ़िर समझता है ख़ुदा जिस को मैं कहता हूँ

मकाँ को ही सो मस्जिद अब बनाना चाहता हूँ मैं


मुहब्बत के समंदर ने जलाया है बुझाया है  

मुहब्बत के समंदर को जलाना चाहता हूँ मैं


तमन्ना माह-रू की है मुझे बर्बाद करने की 

सो पर्दा ज़िन्दगी का ख़ुद गिराना चाहता हूँ मैं


मुहब्बत इक हसीं क़ातिल बड़े इस के फ़साने हैं

किसी को क़त्ल होने से बचाना चाहता हूँ मैं


वही ख़्वाहिश वही हैं वलवले पर ग़ैर की ख़ातिर 

रिवायत सो मुहब्बत की भुलाना चाहता हूँ मैं


बहुत रौशन किया दर को तुम्हारे आज तक हम ने 

मुहब्बत अब चराग़-ए-दिल बुझाना चाहता हूँ मैं


#अमित_अब्र








1222  1222  1222  1222