Tuesday, 31 August 2021
तीरगी है, रात है, महताब काले माह में है
Monday, 16 August 2021
मुश्किल सफ़र हमारा आसान हो रहा है
मुश्किल सफ़र हमारा आसान हो रहा है
मंज़िल भी आएगी इत्मीनान हो रहा है
हर-सू मिली सफ़र में ख़ाक-ए-वतन की ख़ुश्बू
गर्द-ओ-ग़ुबार भी सो जी-जान हो रहा है
कल तक था जो मुक़य्यद घर में किसी की ख़ातिर
आँगन का आज मेरे सामान हो रहा है
मुतलक़ हुई है पूरी ख़्वाहिश हमारे दिल की
आबाद मेरे जी का अरमान हो रहा है
करने को अब मुकम्मल हर ख़्वाब ज़िन्दगी के
ता'मीर इक नया हिन्दुस्तान हो रहा है
#अमित_अब्र
221 2122 221 2122
Friday, 13 August 2021
दिल को फिर आराम आया जब इश्क़ से हम आज़ाद हुए
Thursday, 12 August 2021
फ़ज़ा अब खूबसूरत है कि दर पे यार आया है
फ़ज़ा अब ख़ूबसूरत है कि दर पे यार आया है
मुहब्बत रंग लायी है, दीवाना मुस्कुराया है
फ़लक पर चाँद आया तो, ज़मीं ज़ौ में नहायी थी
तुम्हारा इश्क़ हर जानिब यहाँ इक नूर लाया है
ज़रूरत चाँद को क्या रौशनी की अब रही जानाँ
तुम्हारी रौशनी में चाँद जब ख़ुद ही नहाया है
ज़माना फिर परेशाँ है तुम्हारी रौशनी से क्यूँ
कहीं क्या फिर किसी ने इस से अपना घर जलाया है
अँधेरा ख़ुद ही नाज़िल है फ़लक पर आज या फिर से
तुम्हारी रेशमी ज़ुल्फ़ों ने सूरज को छुपाया है
शराबी से हुए हैं क्यूँ शहर के आज मयखाने
तुम्हारी आँख ने क्या जाम इन सब को पिलाया है
जहाँ को क्या ज़रूरत अब किसी इक और तूफ़ाँ की
अदाओं ने तुम्हारी जब सितम हर ओर ढाया है
बड़ी मग़रूर ख़्वाहिश हो किसी मशहूर शायर की
तुम्हारा ज़िक्र उसकी हर ग़ज़ल में यूँ समाया है
ढली है शाम लेकिन क्यूँ अँधेरा दूर है तुम से
तुम्हारी रौशनी ने क्या अँधेरे को बुझाया है
मुकम्मल हो गई ये ज़िन्दगी जो यार घर आया
उतरकर आसमाँ से चाँद मेरे बाम छाया है
यही आवाज़ आई है सदा दुनिया-ए-माजी से
मुहब्बत ने अदावत को मुहब्बत से मिटाया है
#अमित_अब्र
1222 1222 1222 1222
Monday, 2 August 2021
किसी की याद को अब भूल जाना चाहता हूँ मैं
किसी की याद को अब भूल जाना चाहता हूँ मैं
किसी तूफ़ान को अब याद आना चाहता हूँ मैं
पुरानी इक हक़ीक़त अब मुझे जीने नहीं देती
किसी की याद में ख़ुद को मिटाना चाहता हूँ मैं
जलाया है मिरे दिल ने मुझे नाम-ए-मुहब्बत में
उसे ख़ाक-ए-मुहब्बत में मिलाना चाहता हूँ मैं
रिहाई मौत देती है क़फ़स में ज़िन्दगी गर है
मुक़द्दस मौत को सो आज़माना चाहता हूँ मैं
जलाता हूँ डुबाता हूँ जिगर अब जो मुहब्बत में
समंदर और सूरज सा फ़साना चाहता हूँ मैं
मुझे काफ़िर समझता है ख़ुदा जिस को मैं कहता हूँ
मकाँ को ही सो मस्जिद अब बनाना चाहता हूँ मैं
मुहब्बत के समंदर ने जलाया है बुझाया है
मुहब्बत के समंदर को जलाना चाहता हूँ मैं
तमन्ना माह-रू की है मुझे बर्बाद करने की
सो पर्दा ज़िन्दगी का ख़ुद गिराना चाहता हूँ मैं
मुहब्बत इक हसीं क़ातिल बड़े इस के फ़साने हैं
किसी को क़त्ल होने से बचाना चाहता हूँ मैं
वही ख़्वाहिश वही हैं वलवले पर ग़ैर की ख़ातिर
रिवायत सो मुहब्बत की भुलाना चाहता हूँ मैं
बहुत रौशन किया दर को तुम्हारे आज तक हम ने
मुहब्बत अब चराग़-ए-दिल बुझाना चाहता हूँ मैं
#अमित_अब्र
1222 1222 1222 1222