फ़ज़ा अब ख़ूबसूरत है कि दर पे यार आया है
मुहब्बत रंग लायी है, दीवाना मुस्कुराया है
फ़लक पर चाँद आया तो, ज़मीं ज़ौ में नहायी थी
तुम्हारा इश्क़ हर जानिब यहाँ इक नूर लाया है
ज़रूरत चाँद को क्या रौशनी की अब रही जानाँ
तुम्हारी रौशनी में चाँद जब ख़ुद ही नहाया है
ज़माना फिर परेशाँ है तुम्हारी रौशनी से क्यूँ
कहीं क्या फिर किसी ने इस से अपना घर जलाया है
अँधेरा ख़ुद ही नाज़िल है फ़लक पर आज या फिर से
तुम्हारी रेशमी ज़ुल्फ़ों ने सूरज को छुपाया है
शराबी से हुए हैं क्यूँ शहर के आज मयखाने
तुम्हारी आँख ने क्या जाम इन सब को पिलाया है
जहाँ को क्या ज़रूरत अब किसी इक और तूफ़ाँ की
अदाओं ने तुम्हारी जब सितम हर ओर ढाया है
बड़ी मग़रूर ख़्वाहिश हो किसी मशहूर शायर की
तुम्हारा ज़िक्र उसकी हर ग़ज़ल में यूँ समाया है
ढली है शाम लेकिन क्यूँ अँधेरा दूर है तुम से
तुम्हारी रौशनी ने क्या अँधेरे को बुझाया है
मुकम्मल हो गई ये ज़िन्दगी जो यार घर आया
उतरकर आसमाँ से चाँद मेरे बाम छाया है
यही आवाज़ आई है सदा दुनिया-ए-माजी से
मुहब्बत ने अदावत को मुहब्बत से मिटाया है
#अमित_अब्र
1222 1222 1222 1222
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