Monday, 2 August 2021

किसी की याद को अब भूल जाना चाहता हूँ मैं

किसी की याद को अब भूल जाना चाहता हूँ मैं

किसी तूफ़ान को अब याद आना चाहता हूँ मैं


पुरानी इक हक़ीक़त अब मुझे जीने नहीं देती

किसी की याद में ख़ुद को मिटाना चाहता हूँ मैं


जलाया है मिरे दिल ने मुझे नाम-ए-मुहब्बत में 

उसे ख़ाक-ए-मुहब्बत में मिलाना चाहता हूँ मैं


रिहाई मौत देती है क़फ़स में ज़िन्दगी गर है 

मुक़द्दस मौत को सो आज़माना चाहता हूँ मैं


जलाता हूँ डुबाता हूँ जिगर अब जो मुहब्बत में

समंदर और सूरज सा फ़साना चाहता हूँ मैं


मुझे काफ़िर समझता है ख़ुदा जिस को मैं कहता हूँ

मकाँ को ही सो मस्जिद अब बनाना चाहता हूँ मैं


मुहब्बत के समंदर ने जलाया है बुझाया है  

मुहब्बत के समंदर को जलाना चाहता हूँ मैं


तमन्ना माह-रू की है मुझे बर्बाद करने की 

सो पर्दा ज़िन्दगी का ख़ुद गिराना चाहता हूँ मैं


मुहब्बत इक हसीं क़ातिल बड़े इस के फ़साने हैं

किसी को क़त्ल होने से बचाना चाहता हूँ मैं


वही ख़्वाहिश वही हैं वलवले पर ग़ैर की ख़ातिर 

रिवायत सो मुहब्बत की भुलाना चाहता हूँ मैं


बहुत रौशन किया दर को तुम्हारे आज तक हम ने 

मुहब्बत अब चराग़-ए-दिल बुझाना चाहता हूँ मैं


#अमित_अब्र








1222  1222  1222  1222

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