दिल को फिर आराम आया जब इश्क़ से हम आज़ाद हुए
उल्फ़त ने बरबाद किया बिन उल्फ़त आबाद हुए
रो रो सारी रात कटी ग़म में सारा दिन गुज़रा
गई जो बीमारी-ए-दिल अय्याम हमारे शाद हुए
दिल का कहना माना फिर, फिर से राह-ए-मुहब्बत ली
उल्फ़त ने थोड़ा ही किया बाक़ी ख़ुद बरबाद हुए
रुख़सत मेरे दर से हुआ था हँस कर केवल वो लेकिन
जाने कितने फ़ित्ने घर में फिर थे उस के बा'द हुए
इस दुनिया से था सब कुछ मेरा मेरे साथ गया
एक दफ़ा जो याँ से गये फिर किस को हम याद हुए
मंज़िल उस को थी हासिल चलना जिसने जारी रक्खा
सफ़र अधूरा जो छोड़े बा'द में वो ना-शाद हुए
जिस्म जलाकर हम ने अपने जला दिये अँधियारे
तोड़ असीरी ज़ुल्मत की ज़ुल्मत से आज़ाद हुए
बात हक़ीक़त की जो की दुनिया फिर नाराज़ हुई
मुझे मिटाने को नायाब तरीक़े ईजाद हुए
राह-ए-नफ़रत में इक मक़्तल हो गई दुनिया सारी
इंसाँ ही इंसाँ के हैं अब क़ातिल-ओ-सय्याद हुए
दीवानों ने जुनूँ दिखा कर, फिर था इश्क़ जताया
शीरीं की ख़ातिर फिर, पर्वत काटा फ़रहाद हुए
कैसा काबा और कलीसा, कैसे दैर-ओ-हरम फिर
जब दिल में उन के न उतरे तो बे-जाँ सब फ़रियाद हुए
भूले हँसना हम जो हँस कर कूचे से वो गुज़रा
दिल उलझा जब दिल से, 'अब्र' अपना आप फ़साद हुए
#अमित_अब्र
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