तीरगी है, रात है, महताब काले माह में है
ज़िन्दगी तेरा सफ़र अब इक अँधेरी राह में है
ज़िन्दगी किस को सुनाऊँ आज मैं अफ़्साना तेरा
ज़िन्दगी तू ही बता अब कौन तेरी चाह में है
सर झुकाए जो रही मक़्तल में उस के सामने तू
ज़िन्दगी, क़ातिल तिरा सो आज सज्दा-गाह में है
हाल-ए-दिल अब क्या सुनायें इस ज़माने को मिरे दिल
शेर मेरा जब नहीं इन महफ़िलों की वाह में है
ऐ मुहब्बत थी तिरे ही नाम की इक आरज़ू सो
नाम-ए-उल्फ़त दिल में है तो नाम-ए-दिलबर आह में है
ख़्वाब में दिल-ख़्वाह के तस्वीर मेरी कैसे उभरे
ग़ैर का चेहरा ही अब जब चाहत-ए-दिल-ख़्वाह में है
आज आये जो नज़र वो ग़ैर की आग़ोश में तो
आज मेरी ही तबाही की ख़बर अफ़्वाह में है
#अमित_अब्र
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