Thursday, 30 December 2021

यहाँ सब के बताओ कब हुए अरमान पूरे हैं

यहाँ सबके बताओ कब हुए अरमान पूरे हैं
किसी की रात रौशन है किसी के दिन अँधेरे हैं


बुझा देती है अक्सर रात सूरज को ख़ुमारी में
नहीं हर शाम की तक़दीर में होते सवेरे हैं


न हो आग़ाज़ गर अच्छा न हो अंजाम गर अच्छा
सियासी हुक्मराँ भी फिर न तेरे हैं न मेरे हैं


बताओ तुम तुम्हारे सी कहाँ क़िस्मत हमारी है
तुम्हारे ख़्वाब पूरे हैं हमारे ख़्वाब अधूरे हैं


मुहब्बत जल रही है आज नफ़रत के शरारों से
मुहब्बत के फ़लक पे आग के बादल घनेरे हैं


#अमित_अब्र

Tuesday, 28 December 2021

बाद बिछड़ने के उन से सावन की रुत आई है

बाद बिछड़ने के उन से सावन की रुत आई है
बरस रही है ख़ामोशी भीग रही तन्हाई है

जाते-जाते रुक जाती है जान जिगर से क्यूँ मेरी
क्यूँ क़ैद-ए-मुहब्बत से मुझ को मिलती नहीं रिहाई है

याद तुम्हारी हर दम आई कभी न लेकिन तुम आये
शेर-ओ-ग़ज़ल ग़मगीन हुए ग़मगीं हुई रुबाई है

इश्क़ की ख़ातिर इंसाफ़ की बातें करना है बेकार 
फ़रियाद-ए-बिस्मिल-ए-उल्फ़त की याँ न कहीं सुनवाई है

जी होता है रंजीदा जब देखूँ तस्वीर तुम्हारी
कर के याद पुरानी बातें आँख मिरी भर आई है 

इश्क़ की ख़ातिर सहरा-सहरा भटके जो दीवाने 
दुनिया उन दीवानों को अब तक भूल न पाई है

गुज़िश्तगान-ए-मुहब्बत बतलाये ये राज़-ए-मुहब्बत  
उल्फ़त में दीवानों को मिलती अक्सर रुस्वाई है

एक शहर में पोशीदा देखे दो-दो मंज़र आज
ख़ामोशी है कहीं कहीं पे गूँज रही शहनाई है

तन्हा रहने की आदत डालो ख़ातिर जीने की
हर शाम तुम्हारी तुम से दूर हुई परछाई है

देखूँ जब इस दुनिया को खेल ख़ुदा का समझ न आये 
सच्चे बिखरे-बिखरे हैं झूटों में यकजाई है

सच को सच साबित करने में लगता एक ज़माना
पर झूट शुरू से जाने है होती जो सच्चाई है

#अमित_अब्र

Friday, 24 December 2021

मुहब्बत का हसीं और संदली अंदाज़ है वो

मुहब्बत का हसीं और संदली अंदाज़ है वो

महकती सी मेरी इस ज़िन्दगी का राज़ है वो


है उस के नाम का हर हर्फ़ मेरे नाम में अब  

किताब-ए-ज़ीस्त पे लिक्खा हसीं अल्फ़ाज़ है वो


इबादत है मुहब्बत है मुहब्बत का बयाँ है

जहाँ में इश्क़ के अब इश्क़ का आग़ाज़ है वो


है मुबहम शक्ल उस की होंट भी ख़ामोश लेकिन 

ज़माने में मुहब्बत की बुलंद आवाज़ है वो


मुहब्बत का फ़लक ज़द में है दिलबर की ब-दौलत

कि मेरे इश्क़ के शाहीन की परवाज़ है वो


नज़र जिस पे पड़ी उस की वो ग़म से दूर है अब

कि इशरत के जहाँ में इक बड़ा एज़ाज़ है वो


घटा ज़ुल्फ़ें तो झील आँखें गुलाबों जैसे आरिज़ 

हया ज़ेवर अदा क़ातिल निगाह-ए-नाज़ है वो


ज़माना थम सा जाता है उसे सुनता वो जब है

सदा उस की न हो मानो सुरीला साज़ है वो


ज़माने को नुमायाँ हूँ मगर महफ़ूज हूँ मैं 

कि जिस पे राज़ है मेरा मिरा हमराज़ है वो


#अमित_अब्र 

शाइस्तगी नई है दीवानगी नई है

शाइस्तगी नई है दीवानगी नई है
उल्फ़त से मेरे दिल की वाबस्तगी नई है


छूटी बहार-ए-दुनिया छूटी हसीन महफ़िल
उल्फ़त में आई मुझ में आवारगी नई है


उन की तरह हुआ हूँ तासीर-ए-इश्क़ में मैं
आग़ाज़-ए-इश्क़ में आई सादगी नई है


कुछ देर से मुहब्बत है ना-शनास मुझ से
कुछ देर की हमारी बेगानगी नई है


परवाह इस जहाँ की कितनी करें यहाँ हम
कब इश्क़ से जहाँ की नाराज़गी नई है


#अमित_अब्र

Thursday, 23 December 2021

भरी भीड़ के दरमियाँ से गया

भरी भीड़ के दरमियाँ से गया

हुआ इश्क़ जो मैं यहाँ से गया

ज़मीं क्या फ़लक क्या शब-ओ-रोज़ क्या 
मुहब्बत में मैं इस जहाँ से गया


वो आये मेरी दास्ताँ में तो मैं
ज़माने की हर दास्ताँ से गया


मुहब्बत को करने मैं साबित यहाँ
मुहब्बत के हर इम्तिहाँ से गया


थे पहरे बहुत राह-ए-गुलशन में पर
दर-ए-गुल मैं बच बाग़बाँ से गया


मुहब्बत में जो थे निशाँ मौत के

गुज़र मैं हर इक उस निशाँ से गया

तलाश-ए-मुहब्बत में मैं यार की
ज़मीं आस्माँ कहकशाँ से गया

सनम साथ था जंग-ए-उल्फ़त में सो
जहाँ हार मुझ ना-तवाँ से गया


शजर बे-समर तो फ़लक आतिशी
परिन्दे का मन आशियाँ से गया


उदासी में दिल भी शब-ओ-रोज़ भी
सनम जब से मेरे मकाँ से गया


गुज़र इस जहाँ में हर इक आदमी

गुज़र हर यक़ीन-ओ-गुमाँ से गया 


हुआ क़त्ल मैं प्यार में यार के
मुहब्बत में मैं अपनी जाँ से गया


हुई इंतिहा जो फ़िराक-ए-सनम
गई जान जी हर फ़ुग़ाँ से गया


#अमित_अब्र

सूरज को देख सहरा ग़मगीन हो रहा है

सूरज को देख सहरा ग़मगीन हो रहा है
बेबस पे जुर्म बेहद संगीन हो रहा है


बारूद बन के बादल छाया है आस्माँ में
सैयाद बिन ही घायल शाहीन हो रहा है


है तेग़ किस के हाथों शह-रग कटी है किस की
किस के लहू से मंज़र रंगीन हो रहा है


ख़ामोश क्यूँ है दुनिया ज़ालिम के हर सितम पे
इंसान क्या बला का शौक़ीन हो रहा है


इंसानियत पे हँस कर बेबस को कर के बेबस
इंसान आज अपनी तौहीन हो रहा है


इंसानियत पशेमाँ लाचार क़ायदे हैं
फ़ित्नों से ख़ाक सारा आईन हो रहा है


माहौल काफ़िराना और झूट की इबादत 
दुनिया में आज अफ़सुर्दा दीन हो रहा है


#अमित_अब्र

बिखर कर बँधी ज़ुल्फ़ बादल हुई

बिखर कर बँधी ज़ुल्फ़ बादल हुई
सिमट रात आँखों में काजल हुई 

न थे सामने वो तो सब ठीक था 
मिली आँख तो रूह घायल हुई

मिली थी असीरी मुझे इश्क़ में
मिले वो तो ज़ंज़ीर पायल हुई

ज़मीं से फ़लक से जहाँ से जुदा 
मुहब्बत में मेरे वो पागल हुई 

बयाँ इश्क़ उस ने किया इस तरह 
मुहब्बत भी आह उस की क़ाइल हुई
    
#अमित_अब्र
26-05-2019

तब्दील सहरा में हुए दरिया-ए-उल्फ़त क्यूँ यहाँ

तब्दील सहरा में हुए दरिया-ए-उल्फ़त क्यूँ यहाँ
बेबस जहाँ की आग के आगे मुहब्बत क्यूँ यहाँ


दीवार से दीवार मिलती दर से मिलते आज दर 
दीवार-ओ-दर पे फिर रही फिर आज नफ़रत क्यूँ यहाँ


जब है हमारे ही ज़ेहन में हर मसाइल की सुलझ

फिर बीच में आती ज़माने की अदालत क्यूँ यहाँ


क्या एक इंसानी बदन में आज रहती रूह दो
मुस्कान लब पर और दिल में है अदावत क्यूँ यहाँ


क्यूँ दस्त-बस्ता हम खड़े हैं सामने हर झूट के
लब पर हमारे है नहीं आती सदाक़त क्यूँ यहाँ


कमज़ोर हिम्मत है हुई या शान की आदत गई
बेबस की ख़ातिर अब नहीं होती बग़ावत क्यूँ यहाँ


इक ख़ौफ़ के ही ख़ौफ़ में इंसान अब है जी रहा
है ख़ौफ़ करती फिर रही ऐसी हिमाकत क्यूँ यहाँ


क्या फेर ली आँखें ख़ुदा ने या बला का राज है
नीलाम अस्मत और जिस्मों की तिजारत क्यूँ यहाँ


तूफ़ान में आई जो कश्ती, लाख वादे कर दिये
साहिल पे आकर फिर मुकरने की है फ़ितरत क्यूँ यहाँ


#अमित_अब्र

मगर पूरा जला नहीं पाती

मगर पूरा जला नहीं पाती
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ख़्वाहिश-ए-रिज़्क़ में उठती है 

इक आग पेट में

जिस में 

जलता है जिस्म 

जलता है ख़ूँ 

और

जलती है रग-ए-जाँ

ये आग

जलाती तो है मुझे 

मगर पूरा जला नहीं पाती


ज़िन्दगी है इक सफ़र सहरा का 

इस सफ़र की राह में है 

जलता सूरज

जलती ज़मीं

जलता आसमाँ

और

जलती रेत है 

ज़िन्दगी अपने इस सफ़र में 

जलाती तो है मुझे 

मगर पूरा जला नहीं पाती 


आग में ज़माने की

जल रहीं हैं ख़्वाहिशें 

जल रही है चाहत उम्मीद

ख़्वाब और तक़दीर 

जल रहा है हर शख़्स इस में 

लेकिन 

शायद सब्ज़ सा कुछ अभी बाक़ी है मुझ में

क्यूँकि 

ज़माने की आग 

जलाती तो है मुझे

मगर पूरा जला नहीं पाती 


#अमित_अब्र

Wednesday, 22 December 2021

शमशीर-ए-सितमगर दर-ए-मुफ़्लिस पे चली है

शमशीर-ए-सितमगर दर-ए-मुफ़्लिस पे चली है 

इक आह मुसलसल दिल-ए-मुफ़्लिस से उठी है


फ़रमान-ए-हुकूमत है तबाही लिए फिर भी

ख़ामोश हुए लब हैं सदा दिल में दबी है 


जो आज रही तेग़ बड़ी तेज़ फ़लक पर 

सो आज ज़मीं पे ही ज़मीं लाल जमी है


क्या बात उठी थी दिल-ए-मुज़तर के जिगर में

जो तेज़ कभी थी वो नज़र आज झुकी है

   

गुज़रा न समंदर दर-ए-सहरा से कभी जो

ख़ामोश शजर और ज़मीं रेत हुई है


जो ज़ीस्त करे आज सफ़र शह्र-ए-ख़िज़ाँ में

है रूह बयाबाँ शब-ए-ग़म संग चली है


क्या हाल बताएं दिल-ए-मा'ज़ूर तुझे हम

दिन छोड़ गया हिस्से तिरे रात बची है


है हाल-ए-मकाँ गुज़रे हुए वक़्त का किस्सा 

खिलते थे जहाँ फूल वहाँ क़ब्र बनी है


#अमित_अब्र

Tuesday, 21 December 2021

मुझे इश्क़ में वो सताकर गया

मुझे इश्क़ में वो सताकर गया
मिरे राज़ सबको बताकर गया


जो मंज़िल मिली मुंतज़िर ग़ैर की
मुसाफ़िर मुहब्बत छिपाकर गया


न थी साथ मेरे शहर की हवा
चराग़ों को सो मैं बुझाकर गया


मुहब्बत की दुनिया ये रौशन रहे

मैं जी इश्क़ में सो जलाकर गया


कहानी वो रौशन रही मुद्दतों

मुहब्बत मैं जिसमें निभाकर गया


#अमित_अब्र

बयाबाँ वो दिल का शहर कर गया

बयाबाँ वो दिल का शहर कर गया

मुझे सूखता इक शजर कर गया


अभी तक रहा जो मिरे ख़्वाब में
वो इक दर्द मेरे जिगर कर गया


मिला तो नहीं वो मगर देख कर
जहाँ से मुझे बे-ख़बर कर गया


चला साथ जो काफ़िला याद का
चला भी नहीं और सफ़र कर गया


न टूटी मुहब्बत शब-ओ-रोज़ की  
दिया रात पे यूँ असर कर गया


#अमित_अब्र 

 

मैं तूफ़ान-ए-दरिया से ग़ाफ़िल न था

मैं तूफ़ान-ए-दरिया से ग़ाफ़िल न था
मयस्सर मगर मुझ को साहिल न था


शनासा बहुत थे मगर भीड़ में
मिरे हाथ को हाथ हासिल न था


सफ़र ज़िन्दगी का तो आसान था 

सफ़र के मगर मैं ही क़ाबिल न था


जिसे तुम ने माना गुनहगार है
वो मजबूर था मेरा क़ातिल न था


मुझे क़त्ल इस ज़िन्दगी ने किया
मेरी मौत में कोई शामिल न था


#अमित_अब्र

मुसाफ़िर न वो फिर बुलाया गया

मुसाफ़िर न वो फिर बुलाया गया
सफ़र में मिला था भुलाया गया


मुहब्बत मिटी राह की राह में
निशाँ इश्क़ का भी मिटाया गया


नज़र में रखा था मुझे शौक़ से
मुझे ही नज़र से गिराया गया


शहर ने किसी को किया बेदखल 
शहर में किसी को रुलाया गया


बुझाया किसी ने मुझे इस क़दर
दिया फिर न मुझ से जलाया गया


#अमित_अब्र

कही थी कभी जो कहानी जली

कही थी कभी जो कहानी जली
मेरे साथ मेरी निशानी जली


किसी की दुआ ने सलामत रखा
किसी आह में ज़िन्दगानी जली


ग़ज़ल थी ज़मीं पे मगर आदतन
बहर में नदी की रवानी जली


सँवरकर यहाँ रात की धूप में
किसी के लिये रात-रानी जली


मुहब्बत की ख़ातिर दीवाना जला        
मुहब्बत की ख़ातिर दीवानी जली


उठा था धुँआ आज ख़ुश्बू भरा
कहीं थी कली ज़ाफ़रानी जली


सताये हुए शख़्स की आह में
बदी की सदा हुक्मरानी जली


नया इक शहर जो बसाया गया
बसी एक बस्ती पुरानी जली


न जी से मेरे वो भुलाया गया
जवानी जली, ज़िन्दगानी जली


#अमित_अब्र

मिला वो मुझे यूँ कि फिर न मिला

मिला वो मुझे यूँ कि फिर न मिला

रहा उम्र भर फिर इसी का गिला


नहीं इश्क़ जब साथ मेरे चला 

चला साथ इक दर्द का काफ़िला


शब-ए-वस्ल मुझ को न मुमकिन हुई 

शब-ए-हिज्र का बस रहा सिलसिला


हुआ यार ख़ुर्शीद जब रेत का

नहीं रेत में गुल कभी फिर खिला


मिली थी मुझे राह में रौशनी 

मगर साथ तारीक मेरे चला


#अमित_अब्र

मिरे हाल पर यूँ असर कर गया वो

मिरे हाल पर यूँ असर कर गया वो
मुझे आप से बे-ख़बर कर गया वो


नज़र कुछ न आया फिर उस के इलावा
मुझे नज़्र ऐसी नज़र कर गया वो


मुहब्बत के बादल ने मुझ को भिगोया 
मुझे इश्क़ से तर-ब-तर कर गया वो


मिटी इश्क़ में रूह की तीरगी है
मुझे रौशनी का शजर कर गया वो


वफ़ा का सफ़र यूँ तो आसाँ नहीं था
वफ़ा का सफ़र भी मगर कर गया वो


उसी साथ नींद और सपने गये थे 
मिरी शब को भी दोपहर कर गया वो


मैं अपने ही दिल का बियाबान था पर
मुझे इश्क़ का इक शहर कर गया वो


#अमित_अब्र

बहुत बे-वफ़ा हम बताये गये

बहुत बे-वफ़ा हम बताये गये
मुहब्बत में हम यूँ सताये गये 

मुहब्बत का गुलशन दिखा कर हमें
गुल-ए-इश्क़ हम से छिपाये गये

हमीं थे अभी बज़्म की रौशनी  
जली जो शमा, हम बुझाये गये

मुहब्बत अभी भी याँ रौशन रही
अभी भी यहाँ दिल जलाये गये

असर आह का था न जिन पे हुआ 
वही दिल यहाँ खट-खटाये गये

#अमित_अब्र

नमी का किन आँखों में आना हुआ

नमी का किन आँखों में आना हुआ
किसी के लिए कब ज़माना हुआ


ज़रूरी नही तुम जहाँ के लिए
तुम्हारा फ़साना पुराना हुआ


मुकम्मल ज़मीं अब हुई रेत सी
यहाँ संग का आशियाना हुआ


शहर अब ज़ियादा ज़रूरी हुए
नया गाँव भी क़ैदखाना हुआ


शजर अब हुए हैं यहाँ बे-समर
परिंदों, तुम्हारा ठिकाना हुआ


#अमित_अब्र

है रस्म-ओ-रिवायात का कोहराम ज़ियादा

है रस्म-ओ-रिवायात का कोहराम ज़ियादा
माज़ी पे धरे जाते हैं इल्ज़ाम ज़ियादा

सब मुफ़्लिस-ओ-मज़लूम तिरे दर पे हैं या-रब 
है दर पे तिरे दाख़िले का दाम ज़ियादा

दिन भर तो गुज़रता है वज़ा-दार ही मेरा 
आज़ुर्दा-सी लगती है मुझे शाम ज़ियादा

जो छोड़ गया मुझ को उसी माह-जबीं से
चर्चे में है मेरा दिल-ए-नाकाम ज़ियादा

शर्मिन्दा है हर शख़्स रह-ए-शौक़ में क्यूँकर 
क्यूँ नाम मुहब्बत का है बदनाम ज़ियादा

-अमित सिंह 
26-08-2018(14-12-2022)

अंदाज़-ए-ख़िज़ाँ देख के मायूस फ़ज़ा है

अंदाज़-ए-ख़िज़ाँ देख के मायूस फ़ज़ा है 

मायूस शजर और असीरी में सबा है  


मग़रूर हुआ ज़ुल्म तो मजबूर बढ़े हैं 

हालात-ए-जहाँ देख के मायूस ख़ुदा है


वाक़िफ़ है गुनहगार गुनाहों की सज़ा से

किरदार मगर बन के वो पर्दे में छिपा है


तक़रीर-ए-सितमगर में बहुत ज़िक्र है किस का 
शमशीर हुई सुर्ख़, लहू किस का बहा है


कुछ अहल-ए-वफ़ा याँ गुल-ए-उल्फ़त जो खिलाये
सो आप जफ़ा आज यहाँ ख़ुद से ख़फ़ा है


क़िस्सा दिल-ए-मुज़्तर का असरदार रहा था
कोहराम यहाँ इक सर-ए-बाज़ार उठा है


अब ख़्वाहिश-ए-उल्फ़त दिल-ए-मजरूह करे क्यूँ
है हाल-ए-मुहब्बत वो कि मा'ज़ूर वफ़ा है


#अमित_अब्र

मुहब्बत के मरासिम से फ़ज़ा में रौशनाई है

मुहब्बत के मरासिम से फ़ज़ा में रौशनाई है
मुहब्बत के मरासिम से हँसी भी मुस्कुराई है


मुहब्बत के मरासिम को कभी बे-जान मत करना 
इसी के ही बदौलत इस जहाँ में जान आई है


ज़माना आज भी है इश्क़ के मक़्दूर से ग़ाफ़िल
मुहब्बत ने हमेशा जीत हर मुश्किल पे पाई है


शहीदान-ए-मुहब्बत गर तुम्हारे रहनुमा हैं तो
यकीं मानो तुम्हारे साथ दुनिया है ख़ुदाई है


अदावत भूलकर देखो किसी शायर की नज़रों से 

ग़ज़ल है ज़िन्दगी यारों मुहब्बत की रुबाई है


मुक़ाबिल में हमारे है हमारी ही मुहब्बत जो
हराना हार है तो जीत जाना बे-वफ़ाई है


हक़ीक़त में मुहब्बत भी बयानी है बराबर की

कहीं बादल कहीं पे ख़ुद ज़मीं बादल पे छाई है


#अमित_अब्र

Saturday, 18 December 2021

फ़लक पे वो अपना असर कर गया

फ़लक पे वो अपना असर कर गया
मिरी शाम को वो सहर कर गया


जहाँ के सितम से न वो टूटकर
मुहब्बत मिरी मो'तबर कर गया


हुआ इश्क़ रुख़सत जो घर से मिरे
मकाँ को मिरे खंडहर कर गया


बयाँ कर रही थी नज़र आरज़ू 

कहा कुछ नहीं पर ख़बर कर गया


मिली जो उसे ज़ीस्त मेरे बिना
मिरी मौत मैं कार-गर कर गया


#अमित_अब्र

तिरी याद मुझ को सताती रही

तिरी याद मुझ को सताती रही

मुझे चाँदनी भी जलाती रही


तुझे भूल जाये इसी आस में

नज़र ख़्वाब तेरे भुलाती रही 


बयाबाँ हुआ इश्क़ जब यार बिन 

बयाबानी दिल में समाती रही


दिल अपना ही दुश्मन हुआ इश्क़ में

गया यार तो जान जाती रही


थी ख़्वाबों की कोशिश हँसाने की पर

हक़ीक़त हमेशा रुलाती रही


#अमित_अब्र

ज़िन्दगी कभी हँसकर मेरे घर नहीं आती

ज़िन्दगी कभी हँसकर मेरे घर नहीं आती
ज़िन्दा तो हूँ पर मुझ में जाँ नज़र नहीं आती


चाँद तो वही मेरे बाम रोज़ आता है

रौशनी वही लेकिन मेरे दर नहीं आती 


फ़र्क याँ नहीं शायद मौत से हमारी जो
ये ख़बर कभी बनकर इक ख़बर नहीं आती


भीड़ से शनासाई है मगर न जाने क्यूँ
याँ नज़र कोई सूरत मो'तबर नहीं आती


रात ही सफ़र करती बस्तियों में हर दम क्यूँ

क्यूँ कभी दर-ए-बस्ती तक सहर नहीं आती


#अमित_अब्र 

यार जो ख़्वाब हुआ जाता है

यार जो ख़्वाब हुआ जाता है

दिल ये बे-ताब हुआ जाता है  


रंज में था दरिया साहिब जो

क़तरा सैलाब हुआ जाता है


इश्क़ डूबा सर-ए-महफ़िल यारों

हुस्न गिर्दाब हुआ जाता है


आह-ए-मुफ़लिस ने जलाया मुझ को  

अश्क़ तेज़ाब हुआ जाता है


दौर-ए-उल्फ़त में हक़ीक़त था जो

शख़्स वो ख़्वाब हुआ जाता है

 

कौन सी मौज ख़िज़ाँ में आई

दश्त शादाब हुआ जाता है


शख़्स जो एक बहुत हासिल था 

अब वो नायाब हुआ जाता है


देख कर के दिल-ए-बिस्मिल का ग़म

आँखों में आब हुआ जाता है


छोड़ते बीच सफ़र जब अपने 

रस्ता फिर ख़्वाब हुआ जाता है


खुश हुई रात अमावस की है 

जुग्नू महताब हुआ जाता है


डूब कर रंग-ए-मुहब्बत में दिल 

आज सुरख़ाब हुआ जाता है


#अमित_अब्र

20-6-2016



निगाहों से अपनी रिहाई न दे

निगाहों से अपनी रिहाई न दे

मुझे तू ग़म-ए-आशनाई न दे


बिखर जाऊँगा राह में हिज्र की

ख़ुदा इश्क़ में तू जुदाई न दे


ज़माना जो कर दे जुदा यार से

इलाही हमें वो ख़ुदाई न दे


अँधेरा लिए जो यहाँ फिर रहा

उसे राह कोई दिखाई न दे


दो आवाज़ ऐसी नई ज़ीस्त को

सदा मौत की फिर सुनाई न दे


#अमित_अब्र

बर्बाद हम हुए हैं, अंजाम इश्क़ का है

बर्बाद हम हुए हैं, अंजाम इश्क़ का है
ज़ख़्मी हुआ जिगर ये ईनाम इश्क़ का है


बेकार उन की ख़ातिर रुसवा हुए जहाँ में
हम पे लगा बला का इल्ज़ाम इश्क़ का है


हर रंज की शिफ़ा हूँ कहकर गई मुहब्बत
बीमार-ए-हिज्र हूँ अब ये काम इश्क़ का है


शमशीर-ए-अहल-ए-दुनिया हम पे खिंची हुई है

बाज़ार-ए-इश्क़ में सिर अब दाम इश्क़ का है


है वस्ल एक पल का तो हिज्र उम्र भर को
बदनाम इस जहाँ में सो नाम इश्क़ का है


क्या काम कर गया है ग़मगीन इक फ़साना
इक नामवर यहाँ अब गुमनाम इश्क़ का है


चेहरा छुपा रहे हैं कूचा-ए-यार में भी
दुनिया में अक्स मेरा बदनाम इश्क़ का है


इक दर्द-ए-दिल मुहब्बत में मुंतज़िर मिलेगा
ऐ आशिकों सुनो ये पैग़ाम इश्क़ का है


मय-ख़्वार हूँ मगर फिर भी होश में रहा हूँ
मद-होश कर गया जो वो जाम इश्क़ का है


महरूम ज़िन्दगी है इक दर्द-ए-दिल से शायद
चर्चा सो देखिए सुब्ह-ओ-शाम इश्क़ का है


पूछो न हाल अपना ऐ अब्र इस जहाँ से 
हिस्से नहीं तुम्हारे आराम इश्क़ का है


#अमित_अब्र

Thursday, 16 December 2021

शहर में रहा वो न घर में रहा

शहर में रहा वो न घर में रहा
गुनहगार पैहम सफ़र में रहा


मुझे छोड़ कर वो यहाँ से गया
मगर मैं उसी के असर में रहा


झुकाये रहा था यहाँ जो नज़र
उसी शख़्स की मैं नज़र में रहा


सफ़ीना हमारा न फिर बढ़ सका
भँवर ही भँवर था बहर में रहा


मुहब्बत हमारी मिटायी गई
फ़साना मगर ये ख़बर में रहा


#अमित_अब्र

इक बात पर ज़मीं से अब दूर आसमाँ है

इक बात पर ज़मीं से अब दूर आसमाँ है
है पास वो मगर इक दीवार दरमियाँ है


मालूम है उसे भी ये राज़-ए-दिल हमारा
उस के बग़ैर सूना सारा मिरा जहाँ है 


नाराज़गी नई है उल्फ़त की दास्ताँ में

आया नया कहानी में हिज्र का निशाँ है


क्या हाल-ए-दिल सुनायें, जाने के बाद उन के 
बर्बाद है मुहब्बत, बर्बाद दास्ताँ है


बेज़ार एक दिल की ख़्वाहिश फ़क़त यही है
दिल का सुकूँ कहाँ है, ग़मख़्वार वो कहाँ है


जब से गयी मुहब्बत बेज़ार हो जहाँ से 
ख़ामोश ज़िन्दगी है, ख़ामोश आशियाँ है 


दीवार जागती है अब रात के पहर में
अब याद मे तुम्हारी जर्जर हुआ मकाँ है 


#अमित_अब्र

हुई मह से जब आशनाई मिरी

हुई मह से जब आशनाई मिरी

हुई फिर न शब से रिहाई मिरी


नुमायाँ था वो पर न मिलना हुआ 

कि उस तक नहीं थी रसाई मिरी


अभी था जला मैं अभी बुझ गया

अभी थी ज़ेहन में वो आई मिरी


जहाँ में जो बदनाम-ए-उल्फ़त हुए

तो तस्वीर उस ने जलाई मिरी


मिटाया जहाँ ने मुझे कि उसे

न भायी थी दिल की लगाई मिरी


सदाक़त कहा तो मिटाये गये

सज़ा बन गई लब-कुशाई मिरी


जहाँ में सदाक़त की जो बात की

हँसी बातिलों ने उड़ाई मिरी


#अमित_अब्र

अब तुम नहीं तुम्हारा बस ख़्वाब रह गया है

अब तुम नहीं तुम्हारा बस ख़्वाब रह गया है
दिल एक इस जहाँ में बेताब रह गया है 


तुम जो गये मकाँ से हो कर ख़फ़ा हमारे
दीवार पे उदासी, चुप बाब रह गया है 


यादों भरी तुम्हारी शमशीर चीरती है
दिल बे-लहू तो आँखों में आब रह गया है


तामीर तो हुआ पर जाने के बाद तेरे
बेज़ार सो मकाँ का हर ख़्वाब रह गया है 


मानिन्द-ए-मौज था मैं जब पास था तुम्हारे

जो दूर हूँ तो मुझ में गिर्दाब रह गया है 


तुम तो चले गये हो सब छोड़ कर के लेकिन 

यादों का एक मुझ में सैलाब रह गया है 


नफ़रत भरी फ़ज़ा में ये बात सोचता हूँ
दिल का चमन कोई क्या शादाब रह गया है 


बाक़ी नहीं मरासिम जब कोई साथ उस के 

क्यूँ दर्द एक दिल में नायाब रह गया है 


बे-नूर ज़िन्दगी है तेरे बिना मुहब्बत

बे-रंग मेरे दिल का सुर्ख़ाब रह गया है 


चुप-चाप बुझ रहा हूँ मैं याद में तुम्हारी
दिल में भी अब न वो आब-ओ-ताब रह गया है 


#अमित_अब्र

06-07-2017

Wednesday, 15 December 2021

जहाँ में मुहब्बत पनपती रही

जहाँ में मुहब्बत पनपती रही
मिरे दर से लेकिन मुकरती रही


तिरी याद में हम बिखरते रहे
ख़ुदाई मगर ये सवँरती रही


ग़म-ए-हिज्र में लब तो हँसते रहे
जुदाई प’ जी में सिसकती रही


थे दिन जो मिलन के महकते रहे
मगर हिज्र की शब सुलगती रही


नहीं 'अब्र' की आस शायद उसे
ज़मीं प्यास में जो झुलसती रही


#अमित_अब्र

मिरी नब्ज़ यूँ याँ दुखाई गई

मिरी नब्ज़ यूँ याँ दुखाई गई 
ग़ज़ल मुझ से मेरी न गाई गई

न था मुंतज़िर कोई जिस पे मिरा     
वही राह मुझ को दिखाई गई

बदन ताजिरी में सजा कर यहाँ 
मिरी रूह हर पल सताई गई

सफ़र रात का फिर न आगे बढ़ा
क़दम-दर-क़दम लौ बुझाई गई

बहर रेत का ये नहीं और कुछ
ज़मीं धूप में जो जलाई गई

#अमित_अब्र 
28-09-2016

बिखरने पे गुल के चमन रो रहा है

बिखरने पे गुल के चमन रो रहा है

हमें देख लड़ते वतन रो रहा है 

फ़ना हो रहे जिस्म बारूद में अब
लिपटकर बदन से बदन रो रहा है


चला शब्दबेधी वजह के बिना जो
कहीं आज फिर इक श्रवन रो रहा है


निकलता नहीं चश्म से आब लेकिन
बयाबाँ वतन देख मन रो रहा है


अभी तक रहा जो दुखी ये हिमालय
धरा रो रही है भुवन रो रहा है 


-डॉ. अमित कुमार सिंह 'अब्र'

तिरी जीत में ख़ुद को हारे गये

तिरी जीत में ख़ुद को हारे गये

तिरे ख़्वाब में ख़्वाब सारे गये


ज़मीं क्या, फ़लक क्या, ये दुनिया गई

गये तुम तो सारे सहारे गये


नहीं साथ तेरा जो मुमकिन हुआ

तो हम उम्र तन्हा गुज़ारे गये 


धड़क भी उठे संग शायद कभी 

इसी आस में बुत सँवारे गये


तलाश-ए-मुहब्बत रही उम्र भर

इबादत में उल्फ़त की मारे गये


सहर फिर न आई तुम्हारे बिना 

अँधेरों में हम दिन गुज़ारे गये


#अमित_अब्र

जिस की ख़ुशी की ख़ातिर दुनिया से मैं लड़ा हूँ

जिस की ख़ुशी की ख़ातिर दुनिया से मैं लड़ा हूँ
है साथ वो नहीं तो ख़ुद आप से जुदा हूँ

रूदाद-ए-इश्क़ में है किरदार मेरा उलझा
उलझी हुई मुहब्बत का एक माजरा हूँ

जब से हुआ वो रुख़सत बिखरा मिरा जहाँ है
टूटे हुए मकाँ का टूटा हुआ ख़ुदा हूँ

दरिया-ए-दर्द-ए-दुनिया से क्या गिला करूँ जब
महबूब से बिछड़ कर ख़ुद दर्द हो चुका हूँ

जाना यहाँ से उस का इस बात का सबब है 
कल तक बयान-ए-महफ़िल था आज गुमशुदा हूँ

ताबीर एक वो था हर ख़्वाब की हमारे
है वो नहीं यहाँ तो हर ख़्वाब से ख़फ़ा हूँ

जो साथ अब सफ़र में वो हमसफ़र नहीं है
है साथ कारवाँ पर तन्हा ही मैं चला हूँ

उड़ कर पहुँच रही है जो ख़ाक उस के दर तक 
रब की मेहर कि मैं भी उस ख़ाक में मिला हूँ

तारीक देख मेरी तारीख़ बन गया है  
मैं बाद रौशनी के ज़िन्दा यहाँ रहा हूँ

#अमित_अब्र

Tuesday, 14 December 2021

ग़म-ए-हिज्र में रात सारी रही

ग़म-ए-हिज्र में रात सारी रही

शब-ए-ग़म की हर शाम भारी रही


मरासिम अगरचे न उस से रहा
मगर घर में इक सोगवारी रही


मुसव्विर रहा जो क़फ़स में कहीं
अधूरी ही तस्वीर प्यारी रही


मुसाफ़िर नहीं जो रहा साथ में
सफ़र में उसी की शुमारी रही


मुआविन जो मेरा कहीं और था
मुझे हार मिलती क़रारी रही


कहीं धूप में दिन जलाया गया
कहीं सर्द से रात हारी रही


कभी भी नहीं वो दिखाई दिया     
कहानी सराबी हमारी रही


#अमित_अब्र


दिलों से दिलों को मिलाने चला

दिलों से दिलों को मिलाने चला
अलम इस जहाँ के मिटाने चला


मुहब्बत जो ठहरी इबादत तो मैं
ख़ुदाओं को सारे मनाने चला


गुल-ए-इश्क़ से जो ज़मीं भर गई
उफ़ुक पे गुलिस्ताँ खिलाने चला


लिये फिर रहा है जो काँटे यहाँ
उसे राह-ए-गुलशन दिखाने चला


मिरे ख़ूँ का प्यासा फ़साना हुआ
मैं किरदार अपना मिटाने चला


#अमित_अब्र



Friday, 10 December 2021

चीख रही है मानवता, मानव सारे मौन हुए

चीख रही है मानवता, मानव सारे मौन हुए
हे नृप ! बतलाओ मानवता के क़ातिल आख़िर कौन हुए

बाँध सब्र का टूट रहा, अब रणभेरी इक गूँजेगी
राम नहीं अब सीता ही रावण को ज़िन्दा फूँकेगी

द्रुपद दुलारी माधव को, कब तक आवाज़ लगायेगी
बहुत हुआ अब खुद ही वो, कौरव का वंश मिटायेगी

भारत की ऐ वीर नारियों, आगे बढ़कर हुंकार भरो 
छोड़ो नर से आस न्याय की, स्वयं अपना उद्धार करो

टूट पड़ो काले गोरों पर, बन कर तुम लक्ष्मीबाई 
कलयुग के रक्तबीज को, काटो बन कर काली माई

धरती जिस दिन फुंफकारेगी, आसमान थर्रायेगा
दिग्गज सारे डोलेंगे, जब शीशा पत्थर से टकरायेगा

देर हुई इंसाफ़ में तो फिर रक्तपात ऐसा होगा
धरती होगी सनी लहू में, चेहरों पर लाल लिखा होगा

-डा.अमित कुमार सिंह 'अब्र'

Thursday, 9 December 2021

शेर

1.
हँसती इस दुनिया को बेबस-ओ-बे-हिस लिखकर चला गया 
ख़ुशियाँ भी हैं ग़मगीन यहाँ 'आनिस' लिखकर चला गया

2.
पूरी हो हर तमन्ना हर ख़्वाब हो मुकम्मल
हर आरज़ू तुम्हारी हो आरज़ू ख़ुदा की

3.
अब भीगती नहीं हैं आँखें किसी भी सूरत 
रोया कभी बहुत था जाने के बा'द उस के

4.
मुद्दत से हो रहा हूँ क़िस्तों में क़त्ल यारो
इक इंतिज़ार पूरा मरने नहीं है देता

5.
पहुँच गया जो मंज़िल तक बन गया वो तारा आँखों का
बीच भँवर जो उलझ गई उस मौज को दुनिया क्या जाने

6.
छोटा था जो फ़साना अब है तवील तुम से
रूदाद कुछ न थी बिन किरदार के तुम्हारे 

7.
मुहब्बत सा मुक़दमा दूसरा देखा नहीं हम ने
निगाहें जुर्म करतीं हैं भुगतना दिल को पड़ता है

8.
हुस्न करता है ज़ेहन में अब तो गर्दिश यार का  
तेज़ होती है ये धड़कन जब वो आये ख़्वाब में

9.
ऐ ख़ुदा अब तू ही कर तारीफ़ मेरे यार की
हर्फ़ मेरे जल गये सब बर्क़-ए-हुस्न-ए-यार में 

10.
क़ातिल निगाहें तेरी मशहूर हो रही हैं
कर जायेंगी किसी दिन ये क़त्ल याँ किसी को

11.
बहुत चाहता हूँ न देखूँ मगर दिल 
अदा पे उसी की फ़िदा हो रहा है

12.
करती अगर है दुनिया जो इश्क़ इश्क़ से तो 
आसान हिज्र क्यूँ है मुश्किल विसाल क्यूँ है

13.
जीना है तो जी तू इक ग़म-ज़दे की ख़ातिर
लाचार गर हुआ खुश तो खुश हुआ ख़ुदा है

14.
यूँ ही नहीं हुए हैं रौशन दिये वतन के 
कल थे जले हज़ारों इस रौशनी की ख़ातिर 

15.
मैं चल रहा हूँ लेकिन वो पल रुका हुआ है
जब वो मुझे मिला और मिल कर बिछड़ गया था 

16.
हो जायेंगे दूर सारे बस यार साथ होगा 
सोचा कभी न हम ने उल्फ़त की इस सिफ़त को

17.
ज़ख़्म-ए-फ़िराक़ तो है इक मौत के बराबर 
मरता है इक परिन्दा मर जाए यार जिस का

18.
इश्क़ हो नाकाम तो दे हुस्न पर सौ तोहमतें 
हार कर अब लोग देते दाग़ हैं बे-दाग़ को

19.
आदतन हुस्न ही था अभी तक मगर 
अब अदा यार की क़त्ल हम को करे

20.
न अब है वस्ल की चाहत न अब है हिज्र का डर
मुहब्बत अब भला कैसे सतायेगी मुझे तू

21.
रुख़सार होंट गेसू नाराज़ सब हुए हैं 
जब डूब कर तुम्हारी आँखों में रह गया हूँ

22.
ठहरा हुआ समंदर कब काम का रहा है
बहती हुई नदी से बुझती है प्यास सब की

23.
औरत है नाम याँ पे इक और ज़िन्दगी का
घुटती बहुत है लेकिन मिलती है मुस्कुरा कर 

24.
जल्वा-ए-हुस्न-ए-दिलबर की बात हम करें क्या
ख़ुद रब ग़ुरूर में है कारीगरी पे अपनी

25.
साँसें ठहर गई हैं धड़कन भी थम गई है 
जब दस्त-ए-यार आकर शानों पे रुक गये हैं

26.
वस्ल की आग जब भी जली रात भर 
रात बन कर धुआँ फिर उड़ी रात भर

27.
एहसास-ए-ग़म नहीं तुम ग़मगीन को कराओ
बँध कर न एक दर से ख़ुशियाँ सदा रहीं हैं

28.
पढ़ता हूँ जब कभी भी चेहरे को तेरे मैं तो 
आते नज़र हैं सारे अल्फ़ाज़ उल्फ़तों के

29.
सच झूट और फिर इक बेबस सी ज़िन्दगी है
कैसे बताएँ उलझी किस मोड़ पे मुहब्बत

30.
न कीजे फ़र्क लड़की में बहू-बेटी बता कर के 
रहे चाहे जहाँ भी फूल खुश्बू ही बिखेरेगा

31.
बेचैन ही रहा मैं फिर शाम-ए-ज़िन्दगी तक 
फ़ारिग़ किया न उस ने पूरी तरह से मुझ को

32.
वही था नज़र में जिगर में ज़ेहन में
यही बात लेकिन लबों तक न आई

33.
दर्द भी दर्द की दवा भी है
इश्क़ ही मर्ज़ भी शिफ़ा भी है

34.
ज़िन्दगी ज़िन्दगी थी साथ उस के
ख़ाक जीना हुआ बिना उस के

35.
तारीफ़ उस ख़ुदा की कैसे करूँ बताओ 
दे कर के ग़म बताई क़ीमत ख़ुशी की जिस ने

36.
बे-शक़ मुख़ालिफ़त हो मुद्दे पे यारों लेकिन 
लाज़िम है नर्म लहजा अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू में 

37.
है ज़ुल्फ़ खुल गई या गजरा बिखर गया है 
उठ्ठी कहाँ से ख़ुश्बू मदहोश करने वाली

38.
गेसू खुले हैं उन के या घिर रही घटाएँ 
किस बात पे फ़लक यूँ सरशार हो रहा है 

39.
मैं लौटने लगा था जब हार मान कर के
अपने ही थे कि मेरी हिम्मत बढ़ा रहे थे

40.
चल चाल चाहे जितनी इतना मगर समझ ले
ऐ इश्क़ तेरी बातों में हम न आने वाले 

41.
उन के ही दम से चलती है काएनात सारी
इक नाम राम से है रौशन जहान सारा

42.
विधि का विधान है ये या है रिवाज़-ए-दुनिया
आसान क्यूँ है नफ़रत मुश्किल है क्यूँ मुहब्बत

43.
यूँ ही नहीं हुआ ये मुल्क सुर्ख़-रू यारो
क़ुर्बां हुए कई तब आई ये रौशनी है

44.
यूँ ही नहीं मुहब्बत रौशन रही जहाँ में
आशिक़ कई जले तब आई ये रौशनी है

45.
प्रभु राम की कृपा से रौशन हो घर सभी का 
दीपावली की ढेरों शुभकामनाएँ सब को

46.
किसी के ख़्याल में हम ख़्याल सारे भूल बैठे हैं 
मुहब्बत में हम अपना हाल प्यारे भूल बैठे हैं 

47.
नश्शा विसाल का है इक दौड़ता लहू में 
देखूँ कभी अगर सरशारी में यार को मैं

48.
पैग़ाम ईद का है अर्श-ए-बरीं पे उभरा
बिन कर्बला के कर तू इस्लाम फिर से ज़िन्दा 

49.
क्यूँ फिर रहे फ़सादी बेख़ौफ़ हर शहर में 
क्या हो गई बहुत ही बे-जान है हुकूमत

50.
देख कर उस के शिकम और नाफ़ झीने पैरहन में   
जान जाती है हमारी काश वो ये जान जाती