बर्बाद हम हुए हैं, अंजाम इश्क़ का है
ज़ख़्मी हुआ जिगर ये ईनाम इश्क़ का है
बेकार उन की ख़ातिर रुसवा हुए जहाँ में
हम पे लगा बला का इल्ज़ाम इश्क़ का है
हर रंज की शिफ़ा हूँ कहकर गई मुहब्बत
बीमार-ए-हिज्र हूँ अब ये काम इश्क़ का है
शमशीर-ए-अहल-ए-दुनिया हम पे खिंची हुई है
बाज़ार-ए-इश्क़ में सिर अब दाम इश्क़ का है
है वस्ल एक पल का तो हिज्र उम्र भर को
बदनाम इस जहाँ में सो नाम इश्क़ का है
क्या काम कर गया है ग़मगीन इक फ़साना
इक नामवर यहाँ अब गुमनाम इश्क़ का है
चेहरा छुपा रहे हैं कूचा-ए-यार में भी
दुनिया में अक्स मेरा बदनाम इश्क़ का है
इक दर्द-ए-दिल मुहब्बत में मुंतज़िर मिलेगा
ऐ आशिकों सुनो ये पैग़ाम इश्क़ का है
मय-ख़्वार हूँ मगर फिर भी होश में रहा हूँ
मद-होश कर गया जो वो जाम इश्क़ का है
महरूम ज़िन्दगी है इक दर्द-ए-दिल से शायद
चर्चा सो देखिए सुब्ह-ओ-शाम इश्क़ का है
पूछो न हाल अपना ऐ अब्र इस जहाँ से
हिस्से नहीं तुम्हारे आराम इश्क़ का है
#अमित_अब्र
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